दुनिया के सभ्य व लोकतांत्रिक देशों की तर्ज पर भारत में भी हर सेक्टर के विनियमन के लिए संस्थाएं बनाई गई हैं। बैंकिंग से लेकर बीमा और खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता सुनिश्चित करने से लेकर दवाओं की गुणवत्ता की निगरानी करने वाली संस्थाएं हैं। विमानन सेक्टर को रेगुलेट करने वाली संस्था है तो शेयर बाजार की निगरानी करने वाली संस्था भी है। उच्च शिक्षा को विनियमित करने वाली संस्था है तो देश भर में परीक्षा का आयोजन करने वाली संस्था भी है। सड़क परिवहन से लेकर रेलवे के परिचालन तक की एजेंसियां बनी हैं। व्यापार में स्वतंत्र व निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित करने के लिए एजेंसी बनी है। उपभोक्ताओं के संरक्षण के लिए सिर्फ एजेंसी नहीं है, बल्कि अदालतें भी हैं।
आप नागरिक जीवन से जुड़े किसी भी काम के बारे में सोचें और फिर गूगल में सर्च करें तो आपको उस काम से जुड़ी सरकारी एजेंसी का पता चल जाएगा। सवाल है कि जब इतनी नियामक संस्थाएं हैं तो नागरिक सेवाएं नियमित और बेहतर क्यों नहीं हैं? जब इतनी एजेंसियां जनता के पैसे से ही काम कर रही हैं तो फिर जनता उन्हीं सेवाओं को लेकर इतनी परेशान क्यों है? इसका एकमात्र जवाब है कि संस्थाओं की कोई जवाबदेही नहीं है।
ऐसा लगता है कि सरकार और सारी सरकारी संस्थाओं व नियामक एजेंसियों के संचालन के लिए देश के नागरिक टैक्स तो भरते हैं लेकिन अपने काम के लिए भगवान भरोसे रहते हैं। यह अपवाद ही होता है कि किसी एजेंसी ने नागरिक की किसी समस्या का समाधान किया। जब ऐसा होता है तो उसकी खबर बनती है। अक्सर अखबारों में या इन दिनों तो सोशल मीडिया में खबर आती है कि किसी ट्रेन यात्री ने ट्रेन की बोगी में गंदगी होने या पानी नहीं होने की शिकायत सोशल मीडिया में की और रेल मंत्री को टैग किया तो तुरंत कार्रवाई हो गई।
यह असल में पीआर एक्सरसाइज है। अगर सभ्य देश वाली व्यवस्था होती तो बोगी में गंदगी नहीं होती या पानी नहीं समाप्त हो गया होता। व्यवस्था ठीक तरीके से काम नहीं करती है तो उसके बारे में धारणा बनवाने के लिए ऐसी पीआर एक्सराइज की जाती है।
अगर सरकारी नियामक एजेंसियों की बात करें तो एक के बाद एक सारी एजेंसियां समान रूप से अक्षम या विफल दिखाई देंगी। भारत में बीमा सेक्टर को विनियमित करने के लिए इरेडा यानी इंश्योरेंस रेगुलेटरी एंड डेवलपमेंट ऑथोरिटी का गठन किया गया है। लेकिन भारत में बीमा सेक्टर में जैसी गड़बड़ी है वैसी दुनिया के किसी देश में नहीं होगी। इरेडा को लगातार शिकायतें मिल रही हैं लेकिन वह कोई कार्रवाई नहीं करती है। इरेडा को पता है और उसकी रिपोर्ट में बताया गया है कि बीमा एजेंट मिससेलिंग कर रहे हैं यानी झूठ बोल कर लोगों को बीमा बेच रहे हैं परंतु वह कोई प्रभावी कार्रवाई नही कर पाती है।
इरेडा के पास रिपोर्ट है कि निजी स्वास्थ्य बीमा कंपनियां 40 फीसदी तक क्लेम रिजेक्ट कर रही हैं या बीमा की रकम के मुकाबले बहुत कम भुगतान कर रही हैं। लेकिन वह कुछ नहीं कर रहा है या कर पा रहा है। जीवन बीमा में भी निजी कंपनियों का दावा भुगतान का रिकॉर्ड बहुत खराब है। निजी कंपनियों ने जीवन बीमा और स्वास्थ्य बीमा के प्रीमियम पर एजेंट का कमीशन चार गुना बढ़ा दिया है, जिससे एजेंट मिससेलिंग ज्यादा करने लगे हैं और ग्राहकों का लाभ कम हुआ है। पर इरेडा को इसकी परवाह नहीं है। नागरिकों से ऊपर बीमा कंपनियों का हित है।
ऐसे ही विमानन सेक्टर को विनियमित करने के लिए नागरिक विमानन महानिदेशालय यानी डीजीसीए बना है। लेकिन विमानों का परिचालन विमानन मंत्रालय या डीजीसीए के हिसाब से नहीं होता है, बल्कि विमानन कंपनियों के हिसाब से होता है। भारत में विमानन कंपनियां मनमाना किराया तय करने के लिए स्वतंत्र हैं। ईंधन की किल्लत हुई थी तब सरकार ने इसे नियंत्रित करने का प्रयास किया था। हालांकि तब भी कंपनियां अपने हिसाब से काम करती थीं। लेकिन अब तो पाबंदी भी हटा दी गई है। एक हजार किलोमीटर की यात्रा का किराया भारत में कंपनियां 50 हजार रुपए से ज्यादा तक वसूलती हैं।
प्रयागराज में महाकुंभ के समय पांच सौ किलोमीटर की यात्रा के लिए भी 50 हजार रुपए से ज्यादा वसूले गए। विमानन कंपनियां मनमाना किराया वसूलती हैं और घटिया से घटिया सुविधा देती हैं। किराए की बात हो रही है तो बता दें कि सरकार ने विमानन कंपनियों से कहा था कि वे 60 फीसदी सीटें फ्री रखें और बिना पैसे के टिकट के साथ सीट बुक करें। लेकिन कंपनियों ने इसे मानने से इनकार कर दिया। बाद में सरकार को सरकुलर वापस लेना पड़ा। स्थिति यह है कि विमानन कंपनियां लगभग सारी सीटें अलग से बेचती हैं या टिकट के अलावा अलग से पैसे लेती हैं। अगर चार लोगों का परिवार यात्रा कर रहा है और सोचे कि बिना पैसे दिए सीट हासिल करें तो यह नामुमकिन होगा। अगर सीट मिल भी गई तो पूरा परिवार विमान में अलग अलग बैठा मिलेगा।
विमान यात्री उनकी मर्जी के मोहताज होते हैं। एक घंटे तक की देरी को तो विमानन कंपनियां देरी भी नहीं मानती हैं और न इसके लिए खेद जताती हैं। भारत सरकार के एक मंत्री हैं शिवराज सिंह चौहान कुछ समय पहले एक विमान में टूटी कुर्सी पर बैठ कर आए थे। सोशल मीडिया में शिकायत भी की थी लेकिन हुआ कुछ नहीं। असल में पिछले 12 साल में एक एक करके विमानन कंपनियां बंद होती गईं और सरकार ने दो कंपनियों की मोनोपोली बन जाने दी। उसके बाद सरकार के हाथ में करने को कुछ नहीं रह गया है।
भारत में खाने पानी की वस्तुओं की गुणवत्ता पर नजर रखने के लिए एफएसएसएआई यानी फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड ऑथोरिटी ऑफ इंडिया नाम की एक संस्था है। इसके कामकाज में गड़बड़ियों को लेकर सोशल मीडिया में कई सालों से अभियान चल रहा है। लेकिन कामकाज में सुधार की बजाय एजेंसी सोशल मीडिया हैंडल्स को कानूनी नोटिस भेजती रहती है। हकीकत यह है कि देश में खाने पीने की कोई भी चीज सुरक्षित नहीं है। पहले खुली या कच्ची चीजों में मिलावट की खबर आती है। लेकिन अब पैकेज्ड वस्तुओं की मिलावट ज्यादा चर्चा में है। शैंम्पू और यूरिया की मिलावट से दूध बन रहा है, बाजार में 50 फीसदी तक पनीर व खोया मिलावटी मिल रहा है, मसालों में गोबर की मिलावट पकड़ी जा रही है, फल व सब्जियों पर मात्रा से ज्यादा कीटनाशक की मात्रा मिल रही है, उनमें इंजेक्शन लगाने और रंग चढ़ा कर बेचने की खबरें भी बरसों से चल रही हैं।
नागरिकों के स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाने वाली चीजों की मिलावट खाने पीने की चीजों में हो रही है और लोगों की सेहत पर इसका असर भी दिख रहा है लेकिन इसे नियमित करने के लिए बनी संस्था की कोई जवाबदेही नहीं है। पैकेज्ड वस्तुओं की मात्रा का मामला अलग है। कंपनियां मनमाने तरीके से पैकेट के आकार घटाती हैं या उनमें वस्तुओं की मात्रा कम करती हैं। खाने पीने की एक्सपायर्ड वस्तुएं बाजार में धड़ल्ले से चल रही हैं। व्यवस्थित तरीके से यह काम होता है। बड़ी कंपनियों की एक्सपायर्ड हो चुकी वस्तुओं को लेबल बदल कर वापस बाजार में उतार दिया जा रहा है। एकाध मामले पकड़े जाते हैं बाकी वस्तुएं लोग खा पी रहे हैं।
यही हाल भारत में ड्रग कंट्रोल ऑथोरिटी का है। देश में आए दिन नकली दवाएं पकड़ी जा रही हैं। कैंसर जैसी बीमारी के इलाज में इस्तेमाल होने वाली नकली दवाएं बनती और बिकती हैं। दवा नकली हो या असली अनाप शनाप कीमत पर बिकती है। लेबल बदल कर सौ रुपए की दवा हजार, दो हजार रुपए में बेची जाती है। यह सिर्फ दवाओं के मामले में नहीं होता है। इस्तेमाल हो चुके सीरिंज और फंगस लगे सेलाइन वाटर मरीजों को चढ़ाए जाने की खबरें भी आए दिन आती हैं। मेडिकल उपकरणों के मामले में भी ऐसा ही होता है। लेकिन एटीट्यूड वही है कि सब चलता है। लोग भी कहते हैं कि इतना बड़ा देश है, इतनी बड़ी आबादी है तो कहां कहां नजर रखी जाएगी।
एक देश, एक परीक्षा के नाम पर नेशनल टेस्टिंग एजेंसी का गठन किया गया। लेकिन परीक्षा कराने का इस एजेंसी का रिकॉर्ड कैसा है यह किसी से छिपा नहीं है। इसी साल नीट यूजी की परीक्षा के पेपर लीक हो गए औऱ परीक्षा रद्द हो गई। सरकार ने सिर्फ दोबारा परीक्षा कराई। लेकिन किसी की जवाबदेही तय नहीं हुई है। सोचें, दो साल पहले 2024 में भी पेपर लीक हुए थे। इस साल फिर हो गए। उसके बाद महाराष्ट्र में शिक्षक पात्रता परीक्षा के पेपर लीक हुए। उत्तर प्रदेश में पुलिस भर्ती परीक्षा के पेपर लीक हुए। हर बार ऐसी घटना के बाद एकाध लोगों को तबादले हो जाते हैं और सब कुछ पहले जैसा चलता रहता है। कभी भी जवाबदेही तय करके शिक्षा व परीक्षा से जुड़ी बुनियादी समस्याओं को दूर करने का प्रयास नहीं किया जाता है।
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