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नाथवानी की झारखंड वापसी का मतलब

मुकेश अंबानी की कंपनी रिलायंस समूह के ग्रुप प्रेसिडेंट परिमल नाथवानी के बेटे धनराज परिमल नाथवानी को जब अखिलेश यादव ने समाजवादी पार्टी का राज्यसभा उम्मीदवार बनाया तब नए सिरे से परिमल नाथवानी के नाम की भी चर्चा शुरू हुई। पिछले छह साल तक वे आंध्र प्रदेश से जगन मोहन रेड्डी की पार्टी वाईएसआर कांग्रेस समर्थित राज्यसभा सांसद थे। इसलिए दिल्ली या उत्तर भारत में उनकी चर्चा थोड़ी कम थी। परिमल नाथवानी छह साल के बाद अब फिर से वापस लौटे हैं। पहले वे खुद झारखंड से राज्यसभा सांसद बने और उसके बाद बेटे को उत्तर प्रदेश से उच्च सदन में भेजने का इंतजाम किया है।

दोनों के उच्च सदन जाने का जो रास्ता चुना गया उसमें दिन रात का फर्क है। परिमल नाथवानी खुद निर्दलीय सांसद हैं।

तकनीकी रूप से उनको भारतीय जनता पार्टी समर्थित कहा जाता है लेकिन असल में वे भाजपा के ही सांसद हैं। झारखंड से भाजपा समर्थित सांसद होने का मतलब होता कि उनके पास चुनाव जीतने के लिए आवश्यक 28 मतों में से 20 या उससे ज्यादा मत थे और भाजपा ने बाहर से उनको समर्थन देकर चुनाव जिताया। लेकिन ऐसा नहीं है। उनके पास अपने इंतजाम से सिर्फ पांच विधायक थे, जिनके दम पर वे नामांकन भी नहीं कर सकते थे। भाजपा उनकी प्रस्तावक बनी और भाजपा ने अपने 21 व एनडीए के तीन सहयोगी विधायकों के वोट दिला करके उनको उच्च सदन में पहुंचाया। इसलिए वे भाजपा के सांसद ही कहे जाएंगे, तकनीकी स्थिति चाहे जो हो, जबकि वे अपने बेटे को भाजपा की धुर विरोधी और उत्तर प्रदेश में भाजपा से सत्ता छीनने के लिए लड़ रही समाजवादी पार्टी से राज्यसभा सांसद बनाने का फैसला किया है। ऐसा नहीं है कि पिता, पुत्र में मतभेद हैं और दोनों ने अलग अलग रास्ता चुना है। यह विशुद्ध रूप से कॉरपोरेट और राजनीति के नेक्सस की एक बेशर्म तस्वीर है।

बहरहाल, परिमल नाथवानी पहले 12 साल तक झारखंड से राज्यसभा सांसद रहे थे। वे गुजरात के रहने वाले हैं लेकिन 2008 से 2020 तक झारखंड से सांसद रहे। उसके बाद आंध्र प्रदेश चले गए, जहां से 2026 जून तक सांसद रहे। अब फिर वे झारखंड से सांसद चुने गए हैं। जैसे ही उन्होंने तय किया कि वे फिर से झारखंड से लड़ेंगे वैसे ही तय हो गया था कि एक सीट एनडीए के खाते में जाएगी। इसके बावजूद सत्तारूढ़ महागठबंधन ने दो उम्मीदवार मैदान में उतारे। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की पार्टी झारखंड मुक्ति मोर्चा ने दलित समाज के बैद्यनाथ राम को उतारा तो कांग्रेस ने प्रणब झा को टिकट दिया। आंकड़ों के हिसाब से देखें तो संख्या बल महागठबंधन के पक्ष में था। एक सीट जीतने के लिए 28 वोट की जरुरत थी और सरकार के पास 56 विधायकों का समर्थन था।

अगर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन कमान अपने हाथ में रखते। सहयोगी पार्टियों के साथ तालमेल करके चलते तो दोनों सीटें जीत सकते थे। उनकी पार्टी के जानकार नेताओं का कहना है कि उन्होंने कांग्रेस से कहा था कि वह दोनों सीटें उनको लड़ने दे तो वे दोनों सीटें निकाल लेंगे। लेकिन कांग्रेस तैयार नहीं हुई। यह भी खबर है कि पहले परिमल नाथवानी की जेएमएम की टिकट से लड़ने की बात हुई थी। लेकिन वे दूसरा उम्मीदवार नहीं बनना चाहते थे। बहरहाल, महागठबंधन में समीकरण बिगड़ा और जेएमएम व कांग्रेस ने अलग अलग उम्मीदवार घोषित किए और नाथवानी निर्दलीय लड़ने पहुंचे।

यह हकीकत है कि भाजपा अपने दम पर उनको नहीं जीता सकती थी। क्योंकि भाजपा के अपने 21 विधायकों के अलावा आजसू, लोजपा और जदयू के तीन विधायक थे। अगर जेकेएलएम के विधायक जयराम महतो भी साथ आते तब भी आंकड़ा 25 पहुंच रहा था, जबकि जीतने के लिए 28 वोट की जरुरत थी। भाजपा और अन्य विपक्षी पार्टियों के 25 विधायकों को छोड़ दें तो सरकार के पास 56 का समर्थन था। फिर भी वोटिंग हुई औऱ नतीजे आए तो जेएमएम को 30 वोट मिले और कांग्रेस को सिर्फ 21 वोट मिले। बाकी पांच वोट परिमल नाथवानी को चले गए। नतीजे के बाद सभी पार्टियों ने दावा किया कि उन्होंने पार्टी लाइन के हिसाब से वोट किया है। लेकिन कांग्रेस ने उसी समय स्पष्ट कर दिया कि लालू प्रसाद की पार्टी राजद के चार विधायकों ने क्रॉस वोटिंग की है। लेफ्ट के दो विधायकों के भी क्रॉस वोटिंग करने की खबर आई। उनकी मदद से परिमल नाथवानी चुनाव जीत गए।

बताया जा रहा है कि लालू प्रसाद की पार्टी राजद को मैनेज करने का काम सीधे मुंबई से हुआ।

अंबानी परिवार ने अपनी कंपनी के ग्रुप प्रेसिडेंट के लिए राजद से बात की और तेजस्वी यादव खुशी खुशी राजी हो गए। ध्यान रहे मुकेश अंबानी के बेटे अनंत अंबानी की शादी में लालू प्रसाद, राबड़ी देवी, मीसा भारती, तेजस्वी यादव सहित परिवार के करीब एक दर्जन सदस्य शामिल हुए थे। विशेष विमान से पूरा परिवार शादी में गया था। बहरहाल, यह मामला सिर्फ तेजस्वी यादव या राजद का नहीं है। अगर हेमंत सोरेन चाहते तो कांग्रेस जीत सकती थी। उस समय यह भी खबर आई थी कि अंबानी समूह ने मुख्यमंत्री को भी मैनेज किया।

आंकड़ों के विश्लेषण से भी लगता है कि सब मिलीभगत थी। पहला सवाल तो तभी खड़ा हुआ जब हेमंत सोरेन के उम्मीदवार को 30 वोट मिले। जब जीत का आंकड़ा 28 का था और इतना नजदीकी मुकाबला था तो दो अतिरिक्त वोट उनको क्यों ट्रांसफर हुआ? ध्यान रहे नाथवानी को 29 वोट मिले थे। बताने वाले बताते हैं कि यह सीएम के यहां से ही तय हुआ था कि नाथवानी से एक वोट ज्यादा जेएमएम उम्मीदवार को आना चाहिए। यानी खेल पहले से फिक्स था। कांग्रेस उम्मीदवार का हारना पहले से तय था। अगर हेमंत चाहते तो न राजद में टूट होती और न उनके अतिरिक्त वोट जेएमएम उम्मीदवार को जाते। आराम से दोनों सीटें महागठबंधन जीतता। इस कहानी का लब्बोलुआब यह है कि नाथवानी को भले भाजपा ने राज्यसभा भेजा लेकिन उनकी जीत के लिए अंबानी समूह ने झारखंड मुक्ति मोर्चा और राजद दोनों को मैनेज किया। यह भी ध्यान रखने की जरुरत है कि झारखंड में अडानी समूह का बड़ा इंटरेस्ट है। गोड्डा में उसका पावर प्लांट है, जहां से 16 सौ मेगावाट बिजली बांग्लादेश जाती है। सो, अंबानी समूह का भी झारखंड में इंटरेस्ट लेना समझ में आता है।

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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