ओह, रामावतारजी! उम्र इक्यासी वर्ष की है, पर आदत वही- दिन में चैन तब तक नहीं पड़ता, जब तक कुछ शेयर खरीद न लें और बेच न दें। पर सुबह शेयर बाज़ार खुलने से लेकर बंद होने तक उनका दिल-दिमाग झूलता रहता है। वे शास्त्री, इंदिरा और देसाई के समय चार टर्म के सांसद आरआर मुरारका के साथ रहते हुए लुटियंस दिल्ली की धड़कनों के चितेरे थे। फिर देवगौड़ा के प्रधानमंत्री रहते वे उनके सब कुछ थे। देवगौड़ा के समय मैंने उन पर गपशप कॉलम में बहुत लिखा भी था। मेरा मानना था कि धीरूभाई अंबानी के बालू, कोलकाता के मारवाड़ियों के अमर सिंह, फिर टोनी, दीपक तलवार से लेकर लुटियंस दिल्ली के कैबिनेट सचिवों, प्रधानमंत्री कार्यालय और मनमोहन सिंह के समय अहमद पटेल जैसे चेहरे प्रधानमंत्री को “हैंडल” करते थे। उस पूरी जमात में रामावतार अलग होते हुए भी अंदरखाने की जानकारी के मामले में बिल्कुल अलग थे।
भारत में कभी राजनीति और लोकतंत्र में मर्द और जिंदादिल लोगों की जीवंत राजनीति थी। तब नेहरू भी झुकते थे, इंदिरा भी झुकती थीं, वाजपेयी और मनमोहन सिंह भी झुकते थे। अब वक्त नरेंद्र मोदी का है। सब कुछ एक ही हाथ में। वह एक सिंगल विंडो सिस्टम, जिसमें अडानी, अंबानी सहित सभी खरबपतियों की सीधी एक्सेस। और हर वह काम गारंटीशुदा, जो अडानी कहेंगे, अंबानी करेंगे या अमित शाह के ज़रिये पहुंचेगा।
ये अमीर प्रधानमंत्री मोदी के कथित गुजरात मॉडल और विकसित भारत के टेंटुए हैं। इन टेंटुओं ने, या कहें इनके गॉडफादर प्रधानमंत्री ने, भारत और भारत के पूंजी बाज़ार को सन् 2026 में उस दशा में पहुंचा दिया है, जिसका सबसे एक सटीक रूपक टीबी का मरीज है। मतलब शरीर हट्टा-कट्टा दिख रहा है। आंकड़े तेज़ अर्थव्यवस्था, जीडीपी, खरबपति कंपनियों के मुनाफ़ों के। विदेशी मुद्रा भंडार भारी। सरकार महाबली। मगर शेयर बाज़ार का चेहरा पीला। वजन घटता हुआ। अर्थव्यवस्था मानों गल रही हो। शेयर बाज़ार दो कदम संभलता, तभी फिर खांसी का दौरा। सेंसेक्स लुढ़का, रुपया गिरा। विदेशी निवेशक यानी एफआईआई शेयर बेच कर भाग रहे हैं। तभी कच्चा तेल चढ़ा तो खांसी में हांफता शेयर बाज़ार। अमेरिका में बॉन्ड यील्ड बढ़ी तो अचानक बुखार। ईरान-अमेरिका ने आंखें दिखाईं तो फिर शरीर कांपता हुआ। सोचिए, ऐसी लगातार दशा वाले शेयर बाज़ार को क्या टीबी का मरीज नहीं माना जाएगा?
तभी पचास-साठ साल से शेयर बाज़ार खेल रहे रामावतारजी का फोन आता है, तो मैं फोन देख कर सोचता हूं, आज क्या कहना है? वे मुझे लुटियंस दिल्ली सहित अर्थव्यवस्था और खासकर शेयर बाज़ार का भी मानों भविष्यवक्ता समझते हैं। इसलिए क्योंकि वे ‘जनसत्ता’ के समय से ‘गपशप’ कॉलम पढ़ते हुए उसमें से सियासत, अर्थव्यवस्था और शेयर बाज़ार के बीज बीनकर अपने हुनर में आजमाते रहे हैं। पिछले दो-तीन वर्षों से अपने टाइमपास में वे मेरा लिखा और ज़्यादा पढ़ने लगे हैं।
मैंने ‘नया इंडिया’ में ही लिखा था कि लोग भले कहें कि रूस कुछ दिनों में यूक्रेन को खा जाएगा, या यह कि ट्रंप-नेतन्याहू दो-तीन दिनों में खामेनेई राज को खत्म कर वेनेजुएला की तरह ईरान को काबू में ले लेंगे, मगर होना उलटा है। यह ऐसी लड़ाई बनेगी, जिससे भारत की पहले से बदहाल अर्थव्यवस्था पर पेट्रोल छिड़कने जैसा असर होगा।
वही हो रहा है। तभी रामावतारजी आए दिन पूछते हैं- क्या होगा? मैं जवाब देता हूं, “होने को है क्या, जो होगा?” पर उन्हें कितना ही समझाऊं, वे न तो शेयर बाज़ार से ध्यान हटा पाते हैं, न ही कोलकाता, चेन्नई, मुंबई आदि से व्यापार-कारोबार के हाल जाने बिना सोते होंगे।
सोचिए, भारत के ऐसे कितने करोड़ निवेशकों की निगाहें शेयर बाज़ार पर टिकी रहती होंगी? शुक्रवार, 11 सितंबर को सेंसेक्स सात सौ अंक से अधिक लुढ़का। कुछ ही देर में शेयरधारकों की करीब पांच लाख करोड़ रुपए की संपत्ति कागज़ पर उड़ गई। ब्रेंट क्रूड 108 डॉलर प्रति बैरल के पार था। रुपया करीब 95.5 रुपए प्रति डॉलर। 10 साल की भारतीय सरकारी बॉन्ड यील्ड सात प्रतिशत के पार। सोलह प्रमुख सेक्टरों में पंद्रह लाल और सेंसेक्स-निफ्टी लगातार पांचवें सप्ताह की गिरावट की ओर।
बीमारी पुरानी है। दो जनवरी 2026 को सेंसेक्स 85,762 पर बंद हुआ था। भारतीय कंपनियों का कुल बाज़ार मूल्य करीब 481 लाख करोड़ रुपए था। आज सेंसेक्स 74 हजार के आसपास है। यानी नौ महीने में सूचकांक के शरीर से ग्यारह हजार से अधिक अंक उतर चुके हैं। इस साल सेंसेक्स मोटे तौर पर बारह प्रतिशत नीचे है। जनवरी में ही करीब 16 लाख करोड़ रुपए का बाज़ार पूंजीकरण साफ़ हो गया था। मार्च में अमेरिका-ईरान की लड़ाई की मिसाइलों का असली धुआं मुंबई के दलाल स्ट्रीट में दिखा है। मार्च में विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयरों से 12 अरब डॉलर से अधिक निकाल लिए। रुपए में इक्विटी से निकासी करीब 1.18 लाख करोड़ रुपए रही। अकेले मार्च में निफ्टी करीब 11 प्रतिशत टूटा और बीएसई में सूचीबद्ध कंपनियों की बाज़ार पूंजी करीब 51 लाख करोड़ रुपए घट गई।
मतलब इस युद्ध ने बीमारी पैदा नहीं की। उसने भारत की अर्थव्यवस्था की गली-सड़ी दशा का एक्स-रे निकालकर सामने रख दिया। इस एक्स-रे में सबसे गौरतलब बात विदेशी पैसा है। वित्त वर्ष 2025-26 में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की भारतीय शेयरों में हिस्सेदारी घटकर 15.8 प्रतिशत रह गई। सत्रह साल का न्यूनतम! एनएसई के अपने अध्ययन के अनुसार वित्त वर्ष 2026 में विदेशी इक्विटी निकासी करीब 19.6 अरब डॉलर थी। इस कैलेंडर वर्ष में अगस्त के अंत तक 2026 की कुल विदेशी बिक्री 24.6 अरब डॉलर थी।
सोचिए, मोदीजी भारत के बढ़ने का नगाड़ा बजा रहे हैं, जबकि विदेशी फंड मैनेजर भारत को गलता हुआ मानकर पैसा दूसरे देशों में ले जा रहे हैं। पैसा भारत से निकलकर केवल अमेरिका के सुरक्षित बॉन्ड में नहीं गया। वह एशिया की दूसरी अर्थव्यवस्थाओं में भी गया। एआई और सेमीकंडक्टर की दौड़ में ताइवान और दक्षिण कोरिया विदेशी पूंजी के लिए अधिक आकर्षक बने। MSCI Emerging Markets Index में भारत का वजन, जो 2024 के मध्य में करीब 20 प्रतिशत था, मई 2026 तक 11 प्रतिशत रह गया था। उधर ताइवान करीब 26 प्रतिशत और दक्षिण कोरिया करीब 23 प्रतिशत पर थे। नौ जून तक MSCI India डॉलर में वर्ष की शुरुआत से 14.4 प्रतिशत नीचे था और विदेशी इक्विटी निकासी करीब 30 अरब डॉलर बताई गई। अब तो इंडोनेशिया भी भारत से ऊपर है!
वजह केवल खाड़ी की लड़ाई नहीं है। दरअसल युद्ध ने भारत की सभी कमजोरियों को एक साथ खोल दिया है। मतलब तेल आयात पर निर्भरता, रुपया, विदेशी पूंजी की ज़रूरत, महंगे शेयर और कॉरपोरेट कमाई को लेकर संशय। जब विदेशी फंड मैनेजर को डॉलर में करीब पांच प्रतिशत का अपेक्षाकृत सुरक्षित रिटर्न दिखे, तो वह भला भारत का महंगा शेयर खरीदकर रुपए के गिरने का जोखिम क्यों ले?
और पता है, भारत का शेयर बाज़ार फिर भी चल रहा है, तो वजह हिंदुस्तानी घर-परिवार हैं (जैसे रामावतार परिवार की नई पीढ़ी), जिनसे उसे लगातार खून मिल रहा है। सेंसेक्स को भारत का वेतनभोगी वर्ग बचाए हुए है। हर महीने तनख्वाह आती है। बैंक से ऑटो-डेबिट होता है। नौजवानों के SIP के हजार, पांच हजार, दस हजार रुपए म्यूचुअल फंड में जाते हैं। अगस्त में यह रिकॉर्ड 32,297 करोड़ रुपए था। तभी बाज़ार धड़ाम से मरता नहीं है। उसे भारतीय मध्यवर्ग हर महीने ग्लूकोज़ चढ़ाता है। एक ओर विदेशी खून (पैसा) निकालते हैं, वही दूसरी ओर देसी बचतकर्ता और नौकरीपेशा वर्ग ग्लूकोज़ चढ़ाता है। और मोदीजी घोषणा करते हैं कि खाड़ी के संकट के बावजूद हम कितने चंगे हैं!
सो, फर्जी “विकसित भारत” की आर्थिक झांकी क्या हुई? विदेशी फंड मैनेजर भारत को मरियल अर्थव्यवस्था मान रहे हैं, जबकि लुढ़कते शेयर बाज़ार को संभाले हुए बेचारा नौकरीपेशा मध्यवर्ग है। पता नहीं इनमें से कितने मोदी राज का 17 सितंबर को दीया जलाएंगे?
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