यों सवाल बेमानी है। इसलिए क्योंकि मोटामोटी घर-घर वोट चोरी का मामला पहुंच चुका है। बावजूद इसके चुनाव आयोग और ज्ञानेश कुमार के कारण राज्यों से गड़बड़ियों की जितनी तरह की, जैसी खबरें आई हैं, उससे सचमुच यह पल्ले नहीं पड़ता है कि मोदी-शाह आखिर कितने दशक और चुनाव जीतते जाने, दिल्ली के शासक बने रहने का रोडमैप बनाए हुए हैं? मैं नहीं मानता कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह अपना बुरा समय आया मान रहे हैं। उनमें अभी भी समय को मनमाफिक मोड़ने का अहंकार है।
तभी तो भारत का प्रधानमंत्री विधान परिषदों की मामूली 28 सीटों के चुनाव नतीजों पर तुरंत टिप्पणी करने दौड़ पड़ता है। विधान परिषद के मामूली चुनाव हुए और नतीजे आते ही नरेंद्र मोदी ने लिखा—“Guess how many seats Congress won?” बाद में नागपुर की एक सीट कांग्रेस ने जीती, तो शुरुआती “एक भी सीट नहीं” वाली खबर अंतिम नतीजा नहीं रही।
कांग्रेस को चिढ़ाने की इतनी जल्दी क्यों? इसलिए कि चुनाव अब चुनाव भर नहीं है। हर चुनाव से नरेंद्र मोदी को अपने अजेय होने के प्रमाण देने हैं। इसलिए हर विपक्षी हार विपक्ष के सवालों को झूठा साबित करने का मौका। कांग्रेस कहती है कागज के मतपत्रों से चुनाव कराओ तो जवाब है- लो, विधान परिषद के चुनाव बैलेट पेपर से हुए, बताएं कांग्रेस कितनी सीट जीती? मानो मतदाता सूची, SIR, Form 6, ECINet, EVM पर लगे आरोपों और विधान परिषद का सीमित निर्वाचन सब एक ही सवाल हों।
जबकि पिछले एक महीने में सवाल दूसरे थे। खुद दो चुनाव आयुक्तों- सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी, की फाइलों पर आपत्तियों की खबरें अभी भी प्रामाणिक मानी जा रही हैं। तभी सवाल उठा कि तीन सदस्यीय आयोग में फैसले कैसे हो रहे हैं? Form 6 में declaration किसने और किस अधिकार से जोड़ा? ECINet में electoral-roll database का “gradual centralisation” क्यों हो रहा है? जमीन पर कानून से अधिकार पाए ERO को पूरा access क्यों नहीं है? मतदाता सूची में नाम जोड़ने-हटाने की digital credentials किस-किसके पास हैं? विपक्ष ने इन्हीं सवालों को “वोट चोरी” बनाया। आरोप अपनी जगह, मगर सवाल तो चुनाव आयोग के अपने कागजों से भी निकले थे।
प्रधानमंत्री ने इनका क्या जवाब दिया?
22 अक्टूबर को मोदी बोले तो कांग्रेस के लिए “noise” था। राहुल गांधी पर “failed product” को बार-बार launch करने का तंज था। कांग्रेस “parasite” थी। “दिमागी नक्सलों” ने कांग्रेस की सोचने की क्षमता खत्म कर दी थी। दुनिया “new order” की तलाश में है और कुछ लोग भारत में “disorder” पैदा करना चाहते हैं। यहां तक कहा कि कांग्रेस इतना “noise” पैदा करती है कि सरकार की कमियां बताने वाले ईमानदार आलोचकों की आवाज भी उसमें दब जाती है।
यानी सवाल था- मतदाता सूची के डेटाबेस का नियंत्रण किसके पास है?
जवाब- कांग्रेस ‘शोर’ करती है।
सवाल था- Form 6 किसने बदला?
जवाब- नाकाम उत्पाद (failed product- राहुल के लिए)।
सवाल था- दो चुनाव आयुक्तों को बार-बार फाइल पर आपत्ति क्यों लिखनी पड़ी?
जवाब- दिमागी नक्सल और परजीवी (parasite)।
और इस सप्ताह मतपत्र से हुए विधान परिषद चुनाव में कांग्रेस हारी तो प्रधानमंत्री का सवाल- बताओ कितनी सीटें जीतीं?
उनकी देखादेखी मुख्यमंत्री और नेता सभी अपने-अपने हुंकारे मारने लगे। और बुधवार को तो भाजपा के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन खुद दिल्ली की सड़क पर उतर गए। मैंने कभी नहीं सुना। स्वतंत्र भारत की राजनीति में ऐसा कोई दूसरा उदाहरण मुझे याद नहीं है कि विपक्ष सरकार-विरोधी रैली की तैयारी करे और सत्तासीन पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष उसके जवाब में चांदनी चौक के व्यापारियों के बीच जुलूस निकाले, “लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ।” भाजपा ने इसे विपक्ष के “वोट चोरी” और एसआईआर विरोधी अभियान का जवाब बनाया। ऐसी पदयात्राएं पांच नवंबर तक देश के दूसरे हिस्सों में भी करने की योजना है।
गौर करें, नारा किसका है, “लोकतंत्र बचाओ”!
जबकि सत्ता में नरेंद्र मोदी हैं। गृह मंत्रालय अमित शाह के पास है। संसद में एनडीए का बहुमत। दिल्ली में भाजपा की सरकार। चुनाव आयोग पर विपक्ष का आरोप है कि वह सत्ता के साथ है। और लोकतंत्र बचाने सड़क पर कौन निकला हुआ है? सत्तारूढ़ भाजपा! और इसी के बूते 2029 में पक्की जीत होने का अहंकार भी है।
सोचें, याद करें ऐसी सत्ता (इंदिरा से लेकर वाजपेयी, डॉ. मनमोहन सिंह तक) कब हुई, जिसे अपने भविष्य पर इतना भरोसा हुआ, जितना मोदी, शाह, नितिन नबीन को है। 2029 में जीतेंगे हमीं!
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