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21वीं सदी का पूंजीवाद है इलॉन मस्क!

सवाल है कौन इलॉन मस्क के पूंजीवाद से मुकाबला कर सकता है? क्या चीन का अनुशासित साम्यवादी पूंजीवाद? क्या रूस के पुतिन का निरंकुशी स्टेट पूंजीवाद? क्या भारत के अंबानी-अदानियों की दुकानदारी का क्रोनी पूंजीवाद? क्या खाड़ी-अरब देशों के पेट्रोडॉलर का पूंजीवाद? या यूरोपीय संघ का भला-सौम्य पूंजीवाद?

मेरा दो टूक मत है कि मुकाबला तो दूर इस नए पूंजीवाद के आगे कोई खड़ा भी नही हो सकता। इसलिए क्योंकि इलॉन मस्क अमेरिका की उस असल पूंजीवादी घुट्टी की पैदाइश हैं, जिसमें व्यक्ति की उड़ान सर्वोच्च है और बाकी सब तामझाम है। सही है अमेरिका स्वयंभू महाबली है। राष्ट्र-राज्य का उसका तंत्र शक्तिशाली है। जैसे दुनिया के लिए वह महाशक्ति है, वैसे सरकार, संसद, राष्ट्रपति, गवर्नर, मेयर सभी वहा शक्तिशाली हैं। लेकिन सभी एक-दूसरे पर चेक-बैलेंस में गुँथे हुए। मतलब होगा डोनाल्ड ट्रंप दुनिया के लिए दादा या महाबली। मगर वह वॉशिंगटन के एक केनेडी सेंटर के नाम में अपना नाम भी नहीं जोड़ सकता। जबरदस्ती की तो उसे स्थानीय फेडरल अदालत मिटवा देगी। दुनिया भर में लगाए उनके टैरिफ को सुप्रीम कोर्ट अवैधानिक घोषित कर देगी।

सो अमेरिका में कोई बड़ा नहीं और सब बड़े! अमेरिका में सब उड़ सकते हैं। मंगल, चंद्रमा, अंतरिक्ष में अपने बैलून और सैटेलाइट स्थापित कर सकते हैं। ओलंपिक जीत सकते हैं। पर सच्ची प्रतिस्पर्धा और उस चेक-बैलेंस में, जो मनुष्य की भय, भूख, भक्ति और अहंकार पर अंकुश के लिए जरूरी है।

तभी सोचें, अमेरिका के सौ-दो सौ या ढाई सौ वर्षों के पूंजीवादी इतिहास पर? कितने करोड़पति, अरबपति आए-गए होंगे। पचास साल पहले मैं रॉकफेलर, फोर्ड आदि नाम सुनता था। एटीएंडटी, सिटीबैंक, आईबीएम, कोका-कोला जैसे कॉरपोरेट की गाथाएँ थीं। बाद में माइक्रोसॉफ्ट, बिल गेट्स, स्टीव जॉब्स जैसे लोगों की कीर्तियाँ थीं। लेकिन आज कौन है? पूंजीपति आते-जाते रहते है। और नए आईडिया, नई खुराफात, नई उड़ान के नए पक्षी अपनी तकनीक, अपने उत्पाद का वैश्विक धमाल बना कर रिटायर होते जाते है। इसी की निरंतरता में दुनिया बदली। तभी मानव सभ्यता अब अंतरिक्ष में बस्ती बनाने के मोड़ पर है।

अमेरिका को पुरुषार्थ और पूंजी दौड़ाते हैं तो वजह सिर्फ और सिर्फ एक है कि वहाँ हर व्यक्ति के लिए अवसर है। वेयक्तिक जीवन को वह मौका है, जो गैराज में भी कोई धुनी व्यक्ति कंप्यूटर का ऑपरेटिंग सिस्टम बना बैठता है, तो दक्षिण अफ्रीका से आए इलॉन मस्क जैसे पुरुषार्थी मंगल ग्रह में बस्ती बसाने के ख्याल बना बैठते हैं।

इसलिए अंतरिक्ष की और मौजूदा उड़ान आज उस पूंजीवाद की जिंदादिली से है। यों भारत में पूंजीवाद एक घृणित शब्द है। इसकी जायज वजह है। आखिर भारत का जनजीवन सदियों से उन ब्याजखोर साहूकारों, मुनाफाखोर बनियों का मारा रहा है, जिनकी धनपशुता हजार-पाँच सौ साल पहले भी भीषण थी और आज भी भयावह है। ढाई सौ-पाँच सौ साल पहले के शाहजहाँ के दरबार के व्यापारियों, बैंकरों या ईस्ट इंडिया कंपनी का भारत में शासन बनवाने वाले जगत सेठों की धनपशुता, पशुगत भूख, लालच और लूट में जो समरूपता थी, वह भारत का इतिहासजन्य कटु सत्य है।

कोई आश्चर्य नहीं जो उसी मर्केंटाइली, लोभी प्रवृत्ति को अंबानी और अडानी अपने क्रोनी पूंजीवाद से भारत का भविष्य बिगाडते हुए हैं। भारत को दुनिया का बाजार बना दे रहे है।  हम भारत के हिंदू उस दुर्भाग्य, उस कलियुगी श्राप के मारे हुए हैं कि ज्यों-ज्यों कोई अमीर, अरबपति, खरबपति बनता है, वह और भूखा होता जाता है। भारत में पैसा पुरुषार्थ-ज्ञान-विज्ञान की पूंजी नहीं बनता, बल्कि उस धंधे-मुनाफे-दुकानदारी को फैलाने व भ्रष्टाचार बढ़ाने का वह नशा बनता है, जिसकी अंत परिणती शोषण और लूट है।

ऐसा अमेरिका में नहीं है। अमेरिकी पूंजीवाद की वृत्ति में पहले कुछ नया करना है। पहले रिसर्च और शोध है। कॉलेज की पढ़ाई छोड़कर गैराज में बंद होकर कंप्यूटर की भाषा लिखने का है।  मशीन में भी बुद्धि बनाने का पागलपन है। फिर पूंजी है। जोखिम पहले है। पंख फैलाकर उड़ना पहले है। जान ले कि उड़कर खोजना और पाना ही मनुष्य-वृत्ति का वह पहला बीज है, जिससे अफ्रीका की गुफाओं से निकले मनुष्य ने पृथ्वी को नापा। वह समय भी जोखिम, दुस्साहस और खोज का था। मनुष्य के दिमाग की फितरत का था। वेयक्तिक धुन में पृथ्वी को पैदल खोजना था।

वैसे ही 21वीं सदी के भाग्यवान (अर्थात स्वतंत्रचेता, फितरती मनुष्य) इलॉन मस्क का मामला है। भारत में मस्क के इस पागलपन को समझने वाले बहुत कम होंगे कि वे मंगल ग्रह पर बस्ती के विचार से दुनिया को पगला दे रहे हैं। और इसके आईडिया में शेयर बाजार में शेयर भी बेच दिए। उन्होंने एक-दो दशक में ही पूंजीवाद को अनंत में फैला दिया। कार बनाने वाली कंपनी अंतरिक्ष में उड़ने लगी। रॉकेट बनाने वाली कंपनी भू-राजनीतिक शक्ति हो गई। इंटरनेट, ऊर्जा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अंतरिक्ष और संचार के हाई-टेक सिस्टम भी एक व्यक्ति की व्यावसायिक परिधि में है। सोचे, भारत के अडानी-अंबानी मोदी सरकार के रहमोकरम से उछलते हुए हैं। वहीं अमेरिकी कंपनियों पर अब उलटे अमेरिकी सरकार और ट्रंप प्रशासन आश्रित हैं।

इलॉन मस्क यदि आज कई देशों की जीडीपी से बड़े खरबपति हैं, तो वे ज्ञान, विज्ञान और तकनीकी क्षमता में भी भारत जैसे देशों से कई गुना आगे हैं। पहली बार सरकारें पीछे हैं और इलॉन मस्क जैसे उद्यमी आगे। इन पूंजीपतियों से राष्ट्र, सरकार, समाज और सभ्यता (पृथ्वी के सभी होमो सेपियन भी) को नेतृत्व मिल रहा है। इक्कीसवीं सदी का मस्क मॉडल कंपनियों को उनके वादों से तौल रहा है। मस्क की स्पेसएक्स उदाहरण है। अरबों डॉलर के घाटे के बावजूद निवेशकों ने स्पेसएक्स को ऐसी कीमत दी, जो कंपनी कई स्थापित और लाभ कमाने वाली कंपनियों से आगे निकल गई। वजह बैलेंस शीट नहीं थी। कारण मंगल ग्रह था, कृत्रिम बुद्धिमत्ता थी, अंतरिक्ष की प्लानिंग थी और वह भविष्य था, जिसे मस्क भरोसे के साथ बेचते हैं। कह सकते है पुराने पूंजीवाद में निवेशक कंपनी खरीदते थे। नए पूंजीवाद में वे ऐसे उद्मियों की कहानी भी खरीद रहे है जो नामुमकिन को मुमकिन कर देते हैं।

सो मस्क के मुकाबले में सरकारे नहीं है, उनके प्रतिस्पर्धी हैं। यों इतिहास में पूंजी और सत्ता का घालमेल रहा है तो संघर्ष भी रहा है। पर अब वह समय है जब पूंजी और पूंजीपति का अंतरिक्ष में प्रवेश है। इसलिए राष्ट्र-विशेष की सार्वभौमता का मामला फीका हो जाता है। मस्क का पूंजीवाद बाजार और कल-कारखानों से हटकर कल्पनाओं में यदि फुदक रहा है तो जोखिम, एडवेंचर वाले मनुष्य भी अंतरिक्ष के सफर के ख्यालों में है।

पहले कंपनियाँ बाजार में उतर शेयर बेचती थीं, फिर धीरे-धीरे साम्राज्य बनाती थीं। मस्क का क्रम उलटा था। उन्होंने पहले साम्राज्य बनाया, फिर बाजार में उतारा। रॉकेट, उपग्रह, इंटरनेट, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डेटा सेंटर, इलेक्ट्रिक वाहन—सब एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। परिणामतः वे कई उद्योगों के चौकीदार हैं। कभी स्टैंडर्ड ऑयल, जनरल इलेक्ट्रिक और आईबीएम जैसी अमेरिकी कंपनियों का वैश्विक रुतबा था। लेकिन वे फिर भी देश की आधारभूत संरचना में समाई हुई थीं। जबकि मस्क और उनके समवर्ती उभरी एआई कंपनियाँ क्या करती हुई हैं? ये मनुष्य की बुद्धि, संचार, अंतरिक्ष और ऊर्जा सभी में माईबाप वाली हैसियत बनाते हुए फैल रही है।

इनसे बहुत जल्द दुनिया के देश और सभ्यताएँ चलती हुई होंगी। अमेरिका उस पूंजीवाद में प्रवेश कर चुका है, जिसमें राज्य और निजी पूंजी एक-दूसरे पर निर्भर हो गए हैं। मस्क की स्पेसएक्स मात्र एक निजी कंपनी नहीं है। वह नासा के प्रक्षेपण करती है। अमेरिकी रक्षा प्रतिष्ठान की जरूरतों को पूरा करती है। युद्धक्षेत्रों में स्टारलिंक का संचार उपलब्ध कराता है। उसके नियंत्रण में अंतरिक्ष में सक्रिय उपग्रहों का बड़ा हिस्सा है। तभी पूंजीवाद और राष्ट्र-संप्रभुता पहली बार एक-दूसरे की सीमाओं को धुंधला कर रहे हैं।

इसीलिए इलॉन मस्क, जेफ बेजोस, मार्क ज़ुकरबर्ग आदि की प्रतिस्पर्धा का मसला छोटा है। असल बात एक लोकतांत्रिक राष्ट्र-राज्य बनाम निजी पूंजी के उस नए साम्राज्य का है, जिसकी शक्ति बाजार पूंजीकरण, तकनीकी नियंत्रण, वैश्विक नेटवर्क और अंतरिक्ष मिशनों में निहित है। भला इससे कौन मुकाबला कर सकता है?

चीन तो कतई नहीं। इसलिए क्योंकि अमेरिका का अतीत, वर्तमान और भविष्य स्वतंत्र उद्यम की बदौलत है। उसी से वह बना और ढला है। जबकि चीन में उलटा है। चीन की व्यवस्था में उद्यम, जोखिम और पुरुषार्थ सब राज्य की परियोजना का हिस्सा हैं। इसमें जब भी कोई व्यक्ति स्वयं एक शक्ति केंद्र बनता है, तो कम्युनिस्ट पार्टी उसे उसकी औकात बता देती है। उद्योगपति जैक मा का अनुभव ताजा ही है।

इसलिए चीन पूंजीवाद की पूंजी, ऊर्जा, ज्ञान-विज्ञान, तकनीक और उद्यम सब चाहता है, लेकिन स्वतंत्रचेता उद्यमी नहीं। उसे पूंजीवादी विकास के रोबोट चाहिए, लेकिन स्वतंत्र बुद्धि वाले लोग नहीं।

इसलिए प्रतिस्पर्धा में एक अखाड़ा जोखिम और भविष्य के वादों पर खरबों डॉलर झोंकने की तासीर वाला है। तभी अमेरिकी लोग मंगल ग्रह, कृत्रिम बुद्धिमत्ता. चिप और क्वांटम कंप्यूटिंग के शेयरों पर लपक रहे हैं। वहीं चीन की चिंता कारखानों की बैलेंस शीट और फैक्ट्रियों की असेंबली लाइनें हैं। उसे दुनिया के बाजार में अपना माल बेचना है। मुनाफा कमानै है। अमीरी का रुतबा बनाना है।

अमेरिका विचार पैदा करता है, दिमाग पैदा करता है, दिमाग बनाता है, दिमाग खोलता है, जबकि चीन दिमाग को बंद कर लोगों को रोबोट बनाकर फैक्ट्रियों में उत्पादन बढ़ाता है। अमेरिका पूंजी जुटाता है, चीन उत्पादन जुटाता है। अमेरिका जोखिम खरीदता है, चीन क्षमता बनाता है। अमेरिका का सपना मंगल ग्रह है वही चीन की प्राथमिकता औद्योगिक पार्क और नए-नए बाजार तलाशना है।

सो मानव सभ्यता में जीत तो उसी की होनी है, जो दिमाग दौड़ाए, साहस से उड़े, नई तकनीकी क्रांतियों को संभव बनाए। इतना ही नहीं भविष्य की कल्पनाओं को अरबों डॉलर की पूंजी में भी बदल डाले। इसलिए नोट रखिए, होमो सेपियन्स के सपनों के वित्तीय साहस का माद्दा केवल न्यूयॉर्क के शेयर बाजार में है, तो दिमाग दौड़ाने का जज्बा भी अमेरिकी सिलिकॉन वैली में है।

इसलिए 21वीं सदी अनिवार्यतः इलॉन मस्क की है! पूंजीवाद के नए स्पेस संस्करण की है।

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By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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