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भाजपा फंसी!

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भाजपा फंस गई है। तय मानें 400 पार की सुनामी तो दूर भाजपा की आंधी और हवा भी नहीं है। यदि पहले चरण की 102 सीटों पर हुए मतदान के प्रतिशत व भाजपा के अभेद प्रदेशों में हुई वोटिंग तथा जातीय समीकरणों की फीडबैक को पूरे चुनाव का सैंपल आधार मानें तो लोगों में भाजपा को जिताने का वह जोश कतई नहीं है, जिससे बड़ी जीत की हवा समझ आए। उलटे उन सीटों पर भाजपा को हराने की मौन हलचल है, जहां बड़ी संख्या में भाजपा विरोधी परंपरागत वोट हैं। इसलिए 400 पार की सुनामी तो दूर सामान्य बहुमत के लिए भी अगले छह चरणों में भाजपा को बहुत पसीना बहाना होगा।

102 सीटों पर 65.5 प्रतिशत (जो 2019 के 70 प्रतिशत मतदान से कोई साढ़े चार प्रतिशत कम है) वोटिंग का आंकड़ा भाजपा के लिए खतरे की घंटी है। पहला अर्थ है इस चुनाव में कुल मतदान कम रहेगा। मतलब 2014 और 2019 में मतदान की बढ़ती संख्या के साथ नरेंद्र मोदी का जो ग्राफ उछलता था, वह ट्रेंड इस चुनाव में गिरता हुआ है। 2014 में अच्छे दिन की हवा के मोदी चेहरे से भाजपा का ग्राफ 66.44 प्रतिशत मतदान रिकार्ड का था। उससे भाजपा को 282 सीटें मिलीं। फिर 2019 में पुलवामा-बालाकोट पर पैदा जुनून से छप्पन इंची छाती की मोदी आंधी से कुछ और ज्यादा मतदान (67.40 प्रतिशत) हुआ। उसके कारण भाजपा ने 303 सीटें जीतीं।

अब माहौल फीका है। मौन और ठंडा चुनाव है। तभी पिछले दो चुनावों में मतदान के बढ़ते ट्रेंड और उसी अनुपात में चढ़ते मोदी ग्राफ को पहले चरण में झटका है। और नोट करें इस प्रमुख तथ्य को कि चुनाव आयोग के 102 सीटों के जारी 65.5 प्रतिशत मतदान के आंकड़े का इतना होना भी तमिलनाडु, उत्तर पूर्व के राज्यों और बंगाल की कुल 57 सीटों में अपेक्षाकृत अधिक मतदान (65 प्रतिशत से अधिक) होने से है। अन्यथा उत्तराखंड, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश (याकि भाजपा के अभेदी प्रदेश) की सीटों में मतदान 55 प्रतिशत के औसत पर ही हुआ है।

जैसे राजस्थान की 12 लोकसभा की सीटों पर हुए पहले चरण के मतदान में श्रीगंगानगर में 65.64 (2019 के मुकाबले कोई 10 प्रतिशत कम), जयपुर में 62.8 (छह प्रतिशत कम), चुरू में 63 (तीन प्रतिशत कम), अलवर में  59.8 (कोई सात प्रतिशत कम) नागौर में 57 (पांच प्रतिशत कम), बीकानेर में 53.9( पांच प्रतिशत कम), सीकर में 57.3 (आठ प्रतिशत कम), जयपुर ग्रामीण में 56.6 (नौ प्रतिशत कम), दौसा, 55.2(छह प्रतिशत कम), भरतपुर में 52.7 (छह प्रतिशत कम), झुंझुनूमें 52.3 (दस प्रतिशत कम), करौली-धौलपुर में 49.3 (छह प्रतिशत कम) मतदान हुआ है। ऐसा ही लगभग उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र का मामला है।

जबकि भाजपा के इन इलाकों में 2014 और 2019 में वोटिंग का प्रतिशत और भाजपा का वोट प्रतिशत लगातार बढ़ा था। इसलिए बुनियादी सवाल है कि अब की बार 400 पार और राम मंदिर की मोदी आंधी के रहते लोगों में जोश से मतदान बढ़ना था या घटना? दूसरी बात भला यह कैसे जो ममता बनर्जी, तमलिनाडु में स्टालिन या उत्तर पूर्व के राज्यों के विपक्षी क्षत्रपों ने अपनी ताकत और साधन से मतदान में गिरावट नहीं होने दी वहीं भाजपा अपने राज्यों राजस्थान, मध्यप्रदेश, यूपी, उत्तराखंड में भी वोट बढ़वाने या यथास्थिति बनाए रखने में नाकामयाब है? क्या यह इस बात का प्रमाण नहीं है कि भाजपा प्रदेशों के मतदाताओं में मोदी के चेहरे, मोदी द्वारा खड़े किए गए निराकार उम्मीदवारों या सीटिंग भाजपा सांसदों के खिलाफ मोहभंग वगुस्से की मनोदशा है?

तभी इस संयोग पर गौर करें कि जो मोदी व भाजपा के घोर विरोधी प्रदेश है वहां स्टालिन या ममता बनर्जी अपने वोटों को मोबिलाइज करने में कामयाब रहे या वहां मतदान का उत्साह कुछ ही कम है, जबकि जिन राज्यों में मोदी-शाह और भाजपा-संघ मशीनरी का दबदबा, संगठन के अत्यधिक ताकतवर होने की बात है वहां लोगों में वोट डालने का उत्साह नहीं है। एक और हैरानी की बात। नरेंद्र मोदी-अमित शाह तमिलनाडु को लेकर बड़ी फूं-फां कर रहे थे। इनके द्वारा (बीएल संतोष भी) चुने एक अन्नामलाई के कोयंबटूर से जीतने और चेन्नई दक्षिण व रामनाथपुरम से भाजपा की जीत की भारी हवाबाजी थी लेकिन इन तीनों सीटों पर तमिलनाडु के औसत से भी कम मतदान हुआ है। तभी मतदान के बाद अन्नामलाई का यह हल्ला समझ आने वाला था कि मतदाता लिस्ट में उनके एक लाख वोट नहीं!

मतलब स्टालिन ने भाजपा की दाल नहीं गलने दी वहीं ममता बनर्जी ने उत्तर पश्चिम बंगाल की भाजपा की पुरानी सीटों पर भी कांटे की टक्कर बनाई। तभी तो 78 से 82 प्रतिशत के बीच पोलिंग। एक और संयोग मध्य प्रदेश में भाजपा का हल्ला था कि छिंदवाड़ा में भाजपा ताकत झोंक कर कमलनाथ के बेटे को हरा देगी। लेकिन दिलचस्प तथ्य जो उस सीट पर प्रदेश में सर्वाधिक मतदान (79 प्रतिशत) हुआ। वहीं बगल की भाजपा की मजबूत गढ़ वाली सीधी सीट में सर्वाधिक कम (55 प्रतिशत) वोट हुआ। और इन लोकसभा सीट में नीचे विधानसभा इलाकों में यह ट्रेंड है कि भाजपा के इलाके में कम वोट वही कांग्रेसी इलाकों में अधिक मतदान।

तो राष्ट्रीय स्तर, प्रदेश स्तर, प्रदेश में लोकसभा सीट और लोकसभा सीट के नीचे विधानसभा वार मतदान के आंकड़ों से साफ लगता है कि भाजपा के अपने इलाकों में मतदान कम है। मतदाता उदासीन है। भाजपा संगठन और वोट में बेरूखी, निराशा है।

तभी मेरा मानना है पहले चरण की 102 सीटों में 2019 में भाजपा ने 40 सीटें जीती थीं। मगर इस चुनाव में यह संख्या कम होगी। भाजपा की आठ-दस सीटें भी घटी तो यह बड़ी बात होगी।

ऐसा आगे के चरणों में भी होना है। मैं नहीं मानता कि इसका अर्थ भाजपा का राजस्थान, मध्य प्रदेश, यूपी याकि उत्तर भारत में सूपड़ा साफ है। कतई नहीं। इसलिए क्योंकि राजस्थान की 25 सीटों में भाजपा की 2019 की जीत 25 से 46 प्रतिशत के वोटों के अंतर से थी। मतलब दो, तीन, चार लाख वोटों के अंतरों से भाजपा ने सीटें जीती थी। तो हिसाब से समर्थकों की बेरूखी के बावजूद भक्तों का इतना वोट तो है जो भाजपा उम्मीदवार वापिस 50 हजार या एक लाख वोटों से जीते।

मगर फिर लोकल गणित, जातीय समीकरण. उम्मीदवारों के प्रति नाराजगी और औसत मतदाता की बेरूखी का पेंच है। मोदी का चेहरा और जादू खत्म दिख रहा है तभी उत्तर भारत की सीटों पर भी मतदान जातीय और लोकल फीलिंग से होते हुए है। इसके ठोस संकेत हैं। मोदी ने अनजानी महिला उम्मीदवारों को उतारने का प्रयोग किया है। स्थापित नेताओं, बूथ और जमीनी जोड़-तोड़ वाले नेताओं के टिकट काटे हैं। नतीजतन भाजपा और संघ की लोकल मशीनरी में जोश नहीं है।

तभी राजस्थान के श्रीगंगानगर, करौली या चुरू, झूंझनू (मतलब मेवाड़ की सात-आठ सीटों, ब्राह्मण-बनियों के रूतबे वाली सीटों को छोड़) सभी सीटों पर भाजपा की विपक्षी उम्मीदवारों से कांटे की लड़ाई है। राजस्थान में चुनाव कांग्रेस नहीं लड़ रही है। लोग लड़ रहे हैं, जातियां लड़ रही हैं। वही भाजपा के ब्राह्मण-बनिया-राजपूत-जाट बूथ प्रबंधक टीम मतदान के दिन या तो गायब थी या खानापूर्ति करते हुए थे। हां, मैं नहीं मानता कि राजपूत गुस्से में मुसलमान के साथ विपक्ष को वोट दें। लेकिन राजपूत कार्यकर्ताओं के कई बूथों पर नहीं बैठने या वोट नहीं डालने की चर्चा है। उधर गुर्जर टैक्टिकल वोट करते हुए तो जाट और मीणा भी उम्मीदवार की जात के अनुसार वोट करते हुए।

इस ग्राउंड रियलिटी में भाजपा राजस्थान में चार-पांच सीटें भी हारती है तो उत्तर भारत की वह अनहोनी होगी जो यूपी, मध्य प्रदेश, बिहार, झारखंड, हरियाणा, दिल्ली सभी और रिपीट हो सकती है। मतलब 2014 की आंधी, तब के उत्साही रिकार्ड 66.44 प्रतिशत मतदान से भाजपा को जो 282 सीटें (साथ ही 31.3 प्रतिशत वोट) मिली थी उस आंकड़े में छेद होता लगता है। यह चुनाव भाजपा के लिए 2019 के चुनाव का रिपीट नहीं हैबल्कि उससे पहले के 2014 के नतीजे को बचाने में भी लाले वाला है।

लब्बोलुआब लोकसभा चुनाव बिना मोदी हवा के है। नए वोट और खासकर नौजवानों में नरेंद्र मोदी को लेकर वह जज्बा कतई नहीं है जो 2014 और 2019 के चुनाव पहले बना था। भाजपा को परंपरागत वोट और पॉवर तथा भक्ति से पैदा हुए वोट ही मिलेंगे। और ये हवा-आंधी के लिए पर्याप्त नहीं हैं, यह पहले चरण के मतदान से जाहिर है। विपक्ष एक-एक सीट पर अपने आप लड़ता हुआ है। उन्हें जमीनी सच्चाई से खाद-पानी मिलते हुए है। न अरविंद केजरीवाल और हेमंत सोरेन को जमानत ले कर बाहर निकलना चाहिए और न कांग्रेस व सोशल मीडिया को शोर करना चाहिए।

उलटे कहना चाहिए अबकी बार चार सौ पार। ताकि मोदी-शाह वैसे ही चुनाव लड़ते रहें, जैसे 19 अप्रैल से पहले लड़ रहे थे, और अभी 26 अप्रैल के चरण का नैरेटिव बना रहे हैं। मेरा मानना है कि अक्षय तृतीया के अगले दिन के मतदान में भी मतदाताओं की बेरूखी जाहिर होगी। बूथ पर मुस्लिम, दलित, आदिवासी, जाट-गुर्जर-मीणा या गरीब-गुरबे ज्यादा वोट डालते मिलेंगे। हैरानी की बात जो इनमें न जाने कैसे संविधान व आरक्षण की चिंता पैदा हुई है। ये केजरीवाल की खबरें पढ़ रहे हैं और चुपचाप वोट डालने का निश्चय किए हुए हैं। मतलब  मोदी-मोदी का शोर नहीं सुना जा रहा है, माहौल फीका है तो इसका यह अर्थ नहीं है कि मोदी राज के दस साला अनुभवों से लोगों के मन में बनी गांठों पर मतदान नहीं हो रहा होगा। आखिर यदि मोदी के लिए वोट डालने की भक्ति है तो मोदी को हराने का मौन निश्चय भी है। इसलिए 2024 का चुनाव फंसा है और दिलचस्प हुआ है।

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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