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दुनिया बना रही बुद्धि, भारत बनेगा पालतू?

बुद्धि के ब्रह्म ने मानो मशीन में, एआई में अपना निवास बना लिया हो। तभी अब मशीनें मनुष्य से लाखों गुना विशाल दिमाग दिखलाते हुए हैं। हर दिन, हर सप्ताह इतनी खबरें, ऐसी-ऐसी कवर स्टोरीज आ रही हैं कि अब एआई का न ओर है और न छोर। इस सप्ताह पत्रिका द इकोनॉमिस्ट का कवर देखा, यूरेका एआई! यदि विज्ञान की खोजों का जिम्मा मशीनों ने अपने हाथ में ले लिया तो? देख पढ़ने की तुक समझ नहीं आई। लगा पढ़ने की जरूरत ही नहीं है! आखिर मनुष्य यानी पाठक पढ़े भी तो उसमें एआई के असीम को समझने, विचारने का सामर्थ्य कितना है? उसके करने के लिए अब है क्या? बेचारा मनुष्य। जहाँ वह असंख्य दिमागी सीमाओं में बँधा हुआ है, वहीं एआई स्वतंत्र है, स्वच्छंद है, बेफिक्र है और अपने ही पुर्जों, भाषा के अनंत में उड़ता हुआ।

बात केवल लिखने-पढ़ने की ही नहीं है। द इकोनॉमिस्ट की 15 अक्टूबर की कवर स्टोरी के अनुसार, छह अक्टूबर 2026 का दिन गणित के इतिहास का सबसे बड़ा दिन साबित हो सकता है। कैसे? इस दिन अमेरिकी कंपनी ओपनएआई ने एक ही दिन में 719 शोधपत्र जारी किए। दावा किया कि उसके एआई मॉडल ने गणित की कम से कम 372 ऐसी समस्याओं के समाधान खोज लिए हैं जिनमें बड़े-बड़े गणितज्ञ दशकों से उलझे हुए थे। उससे पहले सितंबर में एआई ने तरल पदार्थों की गति से जुड़ी एक ऐसी गणितीय समस्या को महज 88 घंटों में हल करने का दावा किया जिस पर गणितज्ञ एक सदी से माथापच्ची कर रहे थे।

नतीजतन गणितज्ञ हैरान-परेशान हैं। कुछ तो विरोध में उतर आए हैं। आखिर मनुष्य के वर्षों के अध्ययन, चिंतन और शोध का अर्थ क्या बचेगा यदि मशीन चंद घंटों में उत्तर निकाल दे? और वह भी ऐसे उत्तर जिन्हें सही मानने से पहले मनुष्य को समझने में ही महीनों लग जाएँ! ध्यान रहे, ये एआई कंपनियों के घोषित समाधान हैं, जिनकी स्वतंत्र वैज्ञानिक जाँच और पुष्टि अलग प्रश्न है।

पर गणित मात्र एक विषय है। मौसम की भविष्यवाणी, परमाणु संलयन के प्रयोग, नई धातुओं और पदार्थों की खोज, प्रोटीन की संरचना, दवाइयों का निर्माण आदि सभी में तो एआई घुस चुकी है। जीव विज्ञान में भी छलाँगें हैं। मशीनें डीएनए की भाषा पढ़ रही हैं। उसमें फेरबदल सुझा रही हैं। सूखे और गर्मी को झेलने वाली फसलें तैयार करने की कोशिश हो रही है। प्रयोगशालाओं में जीवित कोशिकाओं के कंप्यूटर मॉडल बनाने की तैयारी है। मतलब कल को वैज्ञानिक किसी दवा का असर पहले कंप्यूटर की आभासी कोशिका पर जाँचेंगे। और आगे? बिल्कुल नए जीवों की रचना भी संभव होगी! द इकोनॉमिस्ट ने बताया है कि एआई की मदद से प्राकृतिक वायरसों से अलग सोलह प्रयोगात्मक वायरस बनाए जा चुके हैं, जो बैक्टीरिया पर हमला करते हैं। सोचें, जिस जीव-जगत को समझने में मनुष्य को सदियाँ लगीं, अब उसकी जैविक संरचना में परिवर्तन और नए जीव बनाने की संभावनाएँ मशीनों से लगातार खुल रही हैं और खुलती जाएँगी।

असली बात इससे भी आगे की है। गूगल डीपमाइंड, ओपनएआई और एंथ्रोपिक जैसी कंपनियाँ एआई को केवल वैज्ञानिकों की सहायता करने वाला औजार नहीं बनाए रखना चाहतीं। वे स्वयं वैज्ञानिक खोजों के मैदान में उतर रही हैं। क्यों? इसलिए भी कि विज्ञान की कठिन समस्याएँ हल करते हुए उनके एआई मॉडल और अधिक बुद्धिमान बन सकते हैं। यानी मशीन विज्ञान की समस्याएँ सुलझाएगी, उससे अपनी बुद्धि बढ़ाएगी और फिर उसी बढ़ी हुई बुद्धि से अपने से भी बेहतर मशीन बनाने की कोशिश करेगी।

तब मनुष्य कहाँ होगा? वैज्ञानिक खोज का मालिक, उसका निरीक्षक या मशीन द्वारा निकाले गए निष्कर्षों को समझने में लगा एक विद्यार्थी, शोधकर्ता? द इकोनॉमिस्ट की संपादकीय चिंता यही है कि विज्ञान में मनुष्य की समझ और नियंत्रण बना रहना चाहिए। अन्यथा वह स्थिति भी संभव है जिसमें मशीनें खोजें करती रहें और मनुष्य केवल उनसे पूछता रहे कि अब क्या करना है। पत्रिका ने तो यहाँ तक लिखा है कि ऐसा समाज मनुष्यों को मशीनों के पालतू प्राणियों जैसी स्थिति में पहुँचा सकता है!

इस नई दुनिया का बाजार तेजी से सभी ओर बन रहा है। एआई की बुद्धि अब टोकन के हिसाब से बिक रही है। जिस तरह कभी अनाज, नमक या पशुओं से मूल्य का हिसाब होता था, वैसे अब मशीन की भाषा पढ़ने, लिखने और सोचने की कीमत टोकन में तय हो रही है। एक कंपनी का एआई दूसरी कंपनी से चालीस गुना सस्ता हो सकता है। सस्ते और महँगे एआई मॉडलों के बीच ग्राहक को चुनाव कराने वाली ओपनराउटर जैसी कंपनी को खरीदने के लिए भुगतान कंपनी स्ट्राइप ने कथित तौर पर 7.5 अरब डॉलर का सौदा किया है।

यानी बुद्धि का नया बाजार! किस काम के लिए सस्ती मशीन का दिमाग लगाना है और किस काम के लिए महँगी मशीन का, यह कारोबार का नया हिसाब, नया मॉडल है। जाहिर है औद्योगिक उत्पादनों, सेवाओं में जैसे सस्ते विकल्प देकर बाजार पर कब्जा करता है वैसे ही एआई बाजार में भी चीन की डीपसीक जैसी कंपनियाँ सस्ते एआई मॉडल बेचकर अमेरिकी कंपनियों को चुनौती दे रही हैं।

और अब जरा कल्पना करें, दिमाग में भारत पर सोचें तो क्या मिलेगा? खाली खोखा! दुनिया में जब अमेरिका और चीन की कंपनियाँ मशीनों से गणित की अनसुलझी समस्याएँ हल कराने, नई दवाएँ और जीव बनाने तथा एआई से एआई की बुद्धि बढ़ाने में लगी हैं, तब भारत इस वैज्ञानिक क्रांति में कहाँ खड़ा है? बकौल विश्व बौद्धिक संपदा संगठन के ग्लोबल इनोवेशन इंडेक्स 2026 के, भारत इनोवेशन में 139 अर्थव्यवस्थाओं की लिस्ट में 38वें स्थान पर है। स्विट्जरलैंड पहले, स्वीडन दूसरे, अमेरिका तीसरे, दक्षिण कोरिया चौथे और सिंगापुर पाँचवें स्थान पर हैं। चीन दसवें स्थान पर पहुँच चुका है।

मतलब दुनिया में नवाचार की दौड़ का हिसाब देखें तो भारत अभी पहले तीस देशों में भी नहीं है। जबकि भारत दुनिया की सबसे बड़ी आबादी और अर्थव्यवस्थाओं में एक है। उसके नौजवान वैश्विक तकनीकी कंपनियों में काम कर रहे हैं। कहने को भारत सूचना प्रौद्योगिकी सेवाओं के निर्यात में दुनिया में पहले स्थान पर है। ऐसे ही विकसित चरण के स्टार्टअप उद्यमों में वेंचर कैपिटल सौदों के मामले में चौथे स्थान पर है। नवाचार से प्राप्त परिणामों में 25वें स्थान पर है। लेकिन मार कहाँ खा रहा है? नवाचार के लिए आबोहवा याकि जरूरी संसाधनों और व्यवस्थाओं में 49वें स्थान पर होने के कारण! मतलब दुनिया की तकनीक को चलाने, उसके लिए सेवाएँ देने और उसका बाजार बनने के जुगाड़ों में भारत आगे है, लेकिन मौलिक वैज्ञानिक अनुसंधान और नई तकनीक बनाने की बुनियादी क्षमता में पीछे।

जबकि चीन की छलाँगें क्या हैं? वह सॉफ्टवेयर और मोबाइल एप्लीकेशन से आगे सेमीकंडक्टर, उन्नत विनिर्माण और गहन वैज्ञानिक अनुसंधान की दुनिया में अपनी ताकत बढ़ा रहा है। द इकोनॉमिस्ट के अनुसार, अमेरिका में गहन विज्ञान और भौतिक तकनीक पर आधारित 12,752 स्टार्टअप हैं। चीन में ऐसी कंपनियों की संख्या 2025 में 3,466 हो गई। पाँच वर्षों में दोगुने से अधिक! और ये कंपनियाँ केवल मोबाइल एप्लीकेशन बनाने या ऑनलाइन सामान बेचने वाली नहीं हैं। ये भौतिक दुनिया की नई तकनीकों पर काम करने वाली कंपनियाँ हैं।

यानी चीन की तैयारी उस दुनिया के लिए है जिसमें मशीनें विज्ञान की खोज करेंगी और उनसे नई मशीनें, नई दवाएँ, नए पदार्थ और नई उत्पादन प्रणालियाँ बनेंगी। तब सवाल है कि भारत क्या करेगा? दुनिया की तकनीक का सेवा प्रदाता और उपभोक्ता बना रहेगा? या अपनी खोज, अपने आविष्कार और अपनी वैज्ञानिक क्षमता से उस दुनिया के निर्माण में भी हिस्सा लेगा?

सवाल केवल विज्ञान की प्रयोगशालाओं का नहीं है। मनुष्य के जीवन का भी है। आखिर विज्ञान, तकनीक, नवाचार और आर्थिक विकास किसलिए हैं? नागरिक के बेहतर जीवन के लिए ही न? पर भारत और भारत के नागरिक याकि भीड़ बेहतर जीवन की जिद कहाँ करते हैं? लोगों की जिंदगी खैराती बनने, प्रदूषणों, झुग्गी झोपड़ियों, कॉकरोचपने में ही विकसित भारत के सपनों की है। कोई आश्चर्य नहीं कि 2026 में भारत का एक भी शहर दुनिया के सौ सबसे रहने योग्य शहरों में नहीं है! इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट की 173 शहरों की ग्लोबल लिवेबिलिटी रैंकिंग में नई दिल्ली 120वें, मुंबई 121वें, चेन्नई 123वें और बेंगलुरु 127वें स्थान पर हैं। दुनिया में कोपेनहेगन पहले, वियना दूसरे और मेलबर्न तीसरे स्थान पर हैं।

भारत की राजधानी दिल्ली को स्वास्थ्य सेवाओं में महज 41.7 और संस्कृति तथा पर्यावरण में 35.4 अंक मिले। सोचें, देश की राजधानी की यह स्थिति! और वह भी तब जब दिल्ली में चमचमाते एयरपोर्ट हैं, मेट्रो है, एक्सप्रेसवे हैं, गगनचुंबी इमारतें हैं। खरबों रुपये निर्माण पर खर्च हुए हैं। बावजूद इसके नागरिक के लिए साफ हवा, अच्छी स्वास्थ्य सेवाएँ, सुरक्षित परिवेश और सुविधाजनक रोजमर्रा का जीवन उपलब्ध कराना चुनौती है। जबकि चीन के सभी सर्वेक्षित शहरों में स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार लगातार दर्ज होता हुआ है।

तो तस्वीर में एक मशीनें मनुष्य से आगे निकलने की तैयारी में हैं, वहीं दूसरी तरफ भारत में मनुष्य अभी रहने योग्य शहर की बुनियादी सुविधाओं के लिए भी तरस रहा है। वहाँ चिंता है कि एआई कहीं विज्ञान पर अधिकार न कर ले। यहाँ चिंता है कि प्रदूषण से साँस कैसे बचे, बीमारी में अस्पताल कैसा मिले, सड़क पर चलना कितना सुरक्षित हो और रोजमर्रा की जिंदगी कैसे कटे। दुनिया की वैज्ञानिक छलाँग और भारत के नागरिक की वास्तविकता का अंतर दिन-रात का है! कुछ भी हो सारे विकास की कसौटी तो अंततः मनुष्य जीवन के अपने बदलाव ही तो हैं!

और घूम फिर कर सवाल बुद्धि (मनुष्य की) पर लौटता है। अब तक मनुष्य स्वयं ज्ञान अर्जित करता था। उसे समझने, परखने, उस पर संदेह करने और आगे बढ़ाने में पीढ़ियाँ खपती थीं। अब मशीनें ज्ञान के ऐसे परिणाम सामने रख सकती हैं जिन तक पहुँचने का रास्ता स्वयं वैज्ञानिकों को समझ न आए। तब ज्ञान बढ़ेगा, लेकिन क्या मनुष्य की समझ उसी अनुपात में बढ़ेगी? खासकर भारत जैसे देशों में? दुनिया निश्चित ही आगे अधिक बुद्धिमान मशीनों और उन पर अधिक निर्भर मनुष्यों की बनेगी। उसके जो स्वामी मनुष्य होंगे, मालिक होंगे वे क्या हैसियत इसलिए हुए होंगे, इसकी कल्पना ही दहलाने वाली है!

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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