सवाल है कि भारत जो दावा कर रहा है कि विकास दर 7.8 फीसदी है तथा साल दर साल के आधार पर पिछले साल पहली तिमाही में विकास दर का आंकड़ा 6.9 था तो सवाल है कि दुनिया के देश या संस्थाएं इसे क्यों नहीं समझ रही हैं? भारत पिछले कई दशक से लगातार सबसे तेज रफ्तार से बढ़ने वाली बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देशों में सबसे ऊपर है। हर बार जब आंकड़े आते हैं तो बताया जाता है कि भारत चीन और अमेरिका के मुकाबले कितने ज्यादा रफ्तार से बढ़ रहा है। लेकिन जब वास्तविक विकास की बात होती है तो भारत कहीं टिकता नहीं है। हालांकि लोगों को यह बेसिक तथ्य भी नहीं बताया जाता है कि चीन की अर्थव्यवस्था 20 ट्रिलियन डॉलर है इसलिए अगर वह चार फीसदी की दर से भी बढ़ेगा तो वास्तविक उत्पादन भारत के आठ फीसदी से विकास दर से बहुत ज्यादा होगा क्योंकि भारत की अर्थव्यवस्था चार ट्रिलियन डॉलर की भी नहीं है। सो, सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था के बावजूद भारत बहुत सारी चीजों में क्यों पीछे है?
सोचें, भारत के सांख्यिकी विभाग ने जिस दिन यह आंकड़ा जारी किया कि पहली तिमाही में भारत की विकास दर 7.8 फीसदी रही है उस दिन के बाद लगातार तीन दिन शेयर बाजार में गिरावट रही है। अमेरिका और ईरान के युद्ध के बीच अगर देश की अर्थव्यवस्था करीब आठ फीसदी की दर से बढ़ रही थी तो शेयर बाजार को तो खुशी से उछल पड़ना था। लेकिन उलटा हुआ। बाजार में लगातार गिरावट रही। जब विकास दर बहुत तेज होने के आंकड़े आते हैं तो यह सवाल भी उठता है कि आखिर दुनिया भर के संस्थागत विदेशी निवेशक (एफएफआई) इस बात को क्यों नहीं समझ रहे हैं? वे क्यों भारत के बाजार से पैसा निकाल रहे हैं? यह भी सवाल उठता है कि प्रत्यक्ष विदेशी निवेश क्यों नहीं बढ़ रहा है?
भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश यानी एफडीआई की आमद बहुत कम है। कई महीनों में तो ऐसा हुआ कि भारत में जितना निवेश आया उससे ज्यादा निवेश भारत के लोगों ने दूसरे देश में किया। यह भी सवाल है कि जब देश की आर्थिक विकास दर ऐसी है तो इतनी बड़ी संख्या में अरबपति भारतीय देश छोड़ कर क्यों जा रहे हैं? हर साल हजारों की संख्या में भारत के नागरिक दूसरे देशों की नागरिकता ले रहे हैं। इसी तरह से इतनी अच्छी अर्थव्यवस्था होने के बावजूद डॉलर के मुकाबले रुपए की कीमत में गिरावट का सवाल भी उठ रहा है। इस तरह के कई सवाल रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने उठाए। उन्होंने आंकड़ों पर सुभाष गर्ग की तरह सवाल नहीं उठाया लेकिन इसकी तुलना देश की अर्थव्यवस्था की वास्तविक हालत और नागरिकों की आर्थिक स्थिति से की।
रोजगार की हालत हो या प्रति व्यक्ति आय की स्थिति कुछ भी ऐसा नहीं है, जिससे यह अंदाजा लगे कि दुनिया की सबसे तेज दर से बढ़ती अर्थव्यवस्था में खुशहाली है। वैसे भी जीडीपी का आंकड़ा औसत आंकड़ा होता है, इससे लोगों के जीवन स्तर की वास्तविक तस्वीर नहीं मिलती है। इसे एक अच्छे रूपक के साथ अर्थशास्त्री अरुण कुमार ने बताया है। उन्होंने कहा कि एक स्टेडियम में जेफ बेजोस और इलॉन मस्क पहुंच जाएं तो उस स्टेडियम में बैठे लोगों की औसत आय एक बिलियन डॉलर की हो जाएगी। लेकिन यह वास्तविकता तो कतई नहीं बनती।
Leave a comment
You must be logged in to post a comment.



