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शेयर बाजार की हकीकत क्या है?

भारत के सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी के 7.8 फीसदी की रफ्तार से बढ़ने की खबरों के बाद लगातार तीन दिन से शेयर बाजार में गिरावट है। एक समय जब बिना किसी ठोस कारण के भारत का शेयर बाजार तेजी से बढ़ रहा था तब सरकार और भाजपा के लोग बताते थे कि यह शेयर बाजार और दुनिया भर के निवेशकों का भारत की अर्थव्यवस्था और राजनीतिक नेतृत्व में भरोसा है, जिसकी वजह से बाजार बढ़ रहा है। अब जबकि बाजार लगातार गिरावट पर है तो कहा जा रहा है कि इससे वास्तविक तस्वीर नहीं दिखती है। हकीकत यह है कि दुनिया भर के विदेशी निवेशक भारत से पैसा निकाल रहे हैं। चाहे संस्थापक विदेशी निवेशक यानी एफआईआई हों या विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक यानी एफपीआई हो सब पैसे निकाल रहे हैं। यह भी वास्तविकता है कि भारत के शेयर बाजार से पैसा निकल कर वे इंडोनेशिया, ताइवान या चीन जैसे अन्य एशियाई बाजारों में निवेश कर रहे हैं। एक समय अमेरिका में ब्याज दरों के कारण भारत में पैसा आता या जाता था। लेकिन अब एशियाई बाजार भारी पड़ रहे हैं।

इसका सबसे बड़ा कारण तो यह है कि बरसों से भारत के शेयर बाजार में शेयरों की कीमत बहुत ऊंची है। हर निवेशक य़ह बताता मिलेगा कि भारत में शेयर ओवरप्राइस्ड हैं। कुछ खास व्यापारी और देश के बड़े उद्यमी इस काम में लगे रहते हैं। हाल में जी समूह के सुभाष चंद्रा जब साढ़े छह करोड़ में 22 हजार करोड़ रुपए का कर्ज निपटाने के विवाद में फंसे तो उन्होंने देश के सबसे बड़े उद्योगपति मुकेश अंबानी का नाम लेकर कहा कि अंबानी के लोगों ने जी समूह के शेयर 40 फीसदी गिरवा दिए थे। उन्होंने यह भी कहा कि मुकेश अंबानी के जानने वालों की हजारों कंपनियां हैं, जिनसे वे शेयर बाजार मैनिपुलेट करते हैं। पता नहीं इन आरोपों में कितना दम है लेकिन यह भारतीय शेयर बाजार को लेकर बनी पुरानी धारणा है कि वहां शेयरों की कीमत ऊंची है। सो, सस्ते शेयर और बेहतर रिटर्न की तलाश में कंपनियां दूसरे एशियाई बाजारों में जा रही हैं।

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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