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इस्लाम का भय: भारत में सच और झूठ

जिहाद

लंदन की वैश्विक पत्रिका ‘द इकॉनोमिस्ट’ की इस सप्ताह की कवर स्टोरी लाजवाब है। मसला यूरोप का है, पर शीर्षक हो या संपादकीय और रिपोर्टें, पढ़ते हुए लगा मानो हिंदू बनाम इस्लाम की राजनीति, चिंता और भय का पोस्टमार्टम हो! ‘द इकॉनोमिस्ट’ का कवर शीर्षक है—‘The Truth and the Lies About Islam in Europe’। इसे यदि ‘The Truth and the Lies About Islam in India’ के चश्मे से जांचें तो मेरा मानना है कि इतिहास, सभ्यता और संदर्भ के फर्क अलग हैं, बहुत गहरे हैं। इसलिए क्योंकि यूरोप में मुसलमान हाल की एक-डेढ़ सदी की आप्रवासी आबादी हैं, वहीं भारत में वे इसी मिट्टी और इतिहास का हिस्सा हैं। बावजूद इसके राजनीति, कौम और सभ्यता की भयाकुलता का मनोरोग आश्चर्यजनक रूप से एक जैसा है।

मेरा यह भी मानना है कि ब्रिटेन और यूरोपीय देशों के मूल निवासियों से ज्यादा भारत का सोशल मीडिया, हिंदूजन और मोदीभक्त इस चिंता में दुबले हैं कि ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी कब इस्लामी देश हो जाएंगे! वहां छह-दस प्रतिशत मुसलमानों से यूरोप के मिट जाने का भय है और भारत में चौदह-पंद्रह-बीस प्रतिशत मुसलमानों से सनातन सभ्यता के मिट जाने का। तभी सोचें कि गोरों में, ईसाइयत में, यूरोपीय सभ्यता में अपने अस्तित्व को लेकर जितना आत्मविश्वास है, क्या उतना आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राज में हिंदुओं में है? कतई नहीं। क्यों?

यही असली और बहुत गंभीर सवाल है।

सोचें, आज हिंदू, कथित हिंदू राष्ट्र, संघ परिवार और उसकी राजनीति किस बात से इतनी डरी हुई है? विशेषकर इतिहास के इस लंबे सत्य के (इक़बाल की पंक्ति) कि “कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी”! यही भारत के मूल सनातन सत्य के चिरंतन अस्तित्व की शायद सबसे सहज ऐतिहासिक व्याख्या है। सदियां बदलीं, राज बदले, आक्रमणकारी आए और गए, पर इस (सनातन) सभ्यता की हस्ती नहीं मिटी। जो हजारों वर्षों की उथल-पुथल में बचा रहा, उसके स्वभाव में भय नहीं बल्कि हिसाब से जिजीविषा और आत्मविश्वास होना चाहिए। जिस धर्म-सभ्यता को सनातन कहते हैं, जो हजारों वर्षों में न जाने कितने आक्रमण, राजवंश, मत-पंथ, सल्तनतें, मुगल और अंग्रेज देख चुकी; जो सबके बावजूद भारत की लगभग अस्सी प्रतिशत आबादी की जीवन-पद्धति है; जिसके पास अपना बहुमत, अपना लोकतंत्र, अपनी निर्वाचित सत्ता, अपनी सेना-पुलिस, अपनी आर्थिक ताकत और दुनिया भर में फैला प्रवासी समाज है—उस हिंदू को भला सन् 2026 या 2126 में कौन मिटा रहा है? या मिटा सकता है?

क्या मुसलमान?

तब गणित व आंकड़ों का क्या सत्य है? 1951 में भारत में हिंदू 84.1 प्रतिशत थे और मुसलमान 9.8 प्रतिशत। 2011 की जनगणना में हिंदू 79.8 और मुसलमान 14.2 प्रतिशत हुए। अनुपात बदला जरूर, मगर वह उस “जनसंख्या विस्फोट” या “हिंदू अल्पसंख्यक हो जाएगा” वाली कहानी का प्रमाण नहीं है जो मोबाइल फोन पर 2024 से रोज मिल रही है। पहली बात, मुस्लिम प्रजनन दर तेजी से घटी है और हिंदू-मुस्लिम fertility gap लगातार सिकुड़ता हुआ है। वैश्विक Pew एजेंसी के दीर्घकालीन अनुमान में भी 2050 का भारत करीब 77 प्रतिशत हिंदू और 18 प्रतिशत मुस्लिम है। यानी अगले चौथाई सदी में भी भारत प्रचंड हिंदू बहुमत का देश होगा।

तो फिर भय किसका?

यहां ‘इकॉनोमिस्ट’ का यूरोप का पोस्टमार्टम भारत के लिए उपयोगी है। उसका निष्कर्ष यह नहीं कि इस्लामी कट्टरता काल्पनिक है। उलटे पत्रिका ने बहुत साफ कहा है—Islam और Islamism को एक समझना गलती है। मुसलमान समस्या नहीं, मगर राजनीतिक इस्लाम और कट्टरता समस्या हो सकते हैं। यूरोप में कुछ मुस्लिम नौजवानों के कट्टर विचार हैं। शरीयत को राष्ट्रीय कानून से ऊपर मानने वाले हैं। मुस्लिम ब्रदरहुड जैसे संगठनों की संस्थाओं में पैठ बनाने की कोशिशें हैं। महिलाओं, समलैंगिकों, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और पैगंबर की आलोचना जैसे प्रश्नों पर उदार लोकतंत्र से टकराव तब वास्तविक है।

हिसाब से इसी आईने में भारत को अपने को देखना चाहिए।

भारत में भी मौलानाओं की भीड़ है। मदरसे की जड़ता है। मुस्लिम पर्सनल लॉ की रूढ़ि है। शरीयत की चाह है। बुर्का-हिजाब का आग्रह है। कट्टर भाषण हैं। पाकिस्तान और कश्मीर की विरासत है। आतंकवाद का अनुभव है। और वह मुस्लिम राजनीति भी रही जिसने मुसलमान को आधुनिक नागरिक बनाने से अधिक कई बार उसे मजहबी समुदाय बनाए रखने में अपना स्वार्थ देखा।

इसे नकारना, इस वास्तविकता की अनदेखी सेकुलर जमात की मूर्खता रही है।

मगर इससे चौदह-पंद्रह प्रतिशत मुसलमानों को अस्सी प्रतिशत हिंदुओं के अस्तित्व का खतरा बना देना दूसरी और कहीं बड़ी मूर्खता है।

जाहिर है दोनों मूर्खताएं एक-दूसरे की खाद हैं।

कट्टर मौलाना कहता है—इस्लाम खतरे में है। उग्र हिंदुत्ववादी उसकी क्लिप उठाकर कहता है—देखो, हिंदू खतरे में है। फिर हिंदू की उग्र क्लिप मुस्लिम फोन पर पहुंचती है—देखो, वे तुम्हें भारत से निकालना चाहते हैं। मुसलमान और घिरता है। मौलाना और उसकी आवश्यकता बनी हुई होती है। फिर उसकी प्रतिक्रिया हिंदू के मोबाइल पर पहुंचती है। हिंदू और डरता है।

मतलब एक चक्र है जो लगातार पूरा होता जाता है, पुनरावृत्त होता जाता है!

हिंदू बनाम मुस्लिम में दंगों का जब-जब समय पहले आता था तब दंगे के लिए, समय विशेष में ही अफवाह फैली हुई होती थी। जबकि आज क्या है? अब अफवाह चौबीस घंटे जेब में रहती है। पहले हिंदू अपने आसपास के मुसलमान से मुसलमान को जानता था। दुकानदार, दर्जी, मिस्त्री, ड्राइवर, सहकर्मी, पड़ोसी। अब एल्गोरिदम उसके लिए देश-दुनिया का सबसे कट्टर मुसलमान खोजकर लाता है। ऐसे ही मुसलमान को सामान्य हिंदू नहीं, सबसे उग्र हिंदुत्ववादी चेहरा दिखता है।

इसलिए ‘इकॉनोमिस्ट’ की यूरोप पर सबसे समझदार पंक्ति का अर्थ भारत में और बड़ा है। कट्टर इस्लाम और कट्टर दक्षिणपंथ दुश्मन जरूर हैं, लेकिन दोनों एक-दूसरे से जीते हैं। एक को दूसरे का डर चाहिए।

और भारत में यह उद्योग अब विशाल है।

तभी जरा उलटे मगर गहरे अर्थों वाले इस सवाल पर सोचें—दस-बारह वर्षों की मजबूत हिंदू राजनीति के बाद हिंदू अधिक आत्मविश्वासी हुआ या अधिक भयभीत, भयाकुल?

सोचें, राम मंदिर बन गया। अनुच्छेद 370 हट गया। तीन तलाक के खिलाफ कानून बना। केंद्र की सत्ता में हिंदू राष्ट्रवाद की राजनीति अपने शिखर पर है। राज्य पहले से अधिक शक्तिशाली है। सीमा पर सेना है। भीतर पुलिस है। चुनावों में हिंदू निर्णायक बहुमत है। फिर भी रोज नया खतरा क्यों? कभी लव जिहाद। कभी लैंड जिहाद। कभी वोट जिहाद। कभी पॉपुलेशन जिहाद। कभी वक्फ। कभी बांग्लादेशी। कभी रोहिंग्या। यूपी में आए दिन बुलडोजर कैसे-कैसे खतरों की डोज लिए होता है?

सोचें, इतना बुलडोजर चला, छप्पन इंची सुरक्षा के तराने हैं, फिर भी सोशल मीडिया का हिंदू कितनी तरह के डरों में जी रहा है। उसके लिए लंदन का मुस्लिम मेयर भी चिंता का कारण है तो बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन भी खौफनाक खतरा!

ऐसे ही भारत में मुसलमान का मनोविज्ञान है। उससे पूछें तो उसका भी वर्तमान और भविष्य भय, चिंता में गुथा मिलेगा। जैसे मुसलमान से पूछें कि अस्सी प्रतिशत हिंदुओं के देश में वह अपना भविष्य किसमें देखता है? मौलाना में या संविधान में? शरीयत की सामुदायिक घेराबंदी में या आधुनिक शिक्षा में? अपनी बेटी को अलग रखने में या उसे डॉक्टर, वैज्ञानिक, उद्यमी और अफसर बनाने में? धार्मिक पहचान की राजनीति में या बराबर भारतीय नागरिक बनने में?

दोनों तरफ आत्मविश्वास का संकट है।

और इसीलिए मुझे भारत की असली बीमारी हिंदू-मुस्लिम नफरत से भी अधिक इतिहास के अनुभवों से जनित भयाकुलता की लगती है।

Pew एजेंसी के विशाल भारतीय सर्वे की तस्वीर भी अजीब व विचित्र है। 95 प्रतिशत मुसलमानों ने कहा उन्हें भारतीय होने पर बहुत गर्व है। 84 प्रतिशत भारतीयों ने माना कि सभी धर्मों का सम्मान करना “सच्चा भारतीय” होने के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। लेकिन इसी समाज में 66 प्रतिशत हिंदू मुसलमानों को अपने से बहुत अलग मानते हैं और 64 प्रतिशत मुसलमान हिंदुओं को। दोनों साथ हैं और अलग भी।

यही भारत है। सभ्यतागत विचित्रताओं, विरोधाभासों से भरा हुआ है।

भारत कभी भी अमेरिका का melting pot नहीं था। भारत हजारों वर्षों से अलग-अलग कटोरियों वाली एक थाली था। पूजा अलग। खाना अलग। शादी अलग। भगवान अलग। मगर बाजार साझा, भाषा साझा, गांव साझा, गली साझा और जिंदगी साझा।

और मौजूदा कटु सत्य है कि सोशल मीडिया उस साझा जिंदगी को खा रहा है। साथ-साथ रहना भी दूभर बना दिया है।

वही राजनीति दोनों धर्मों के डर को वोट में बदल रही है।

इसलिए सवाल यह नहीं कि मुस्लिम कट्टरता है या नहीं। है तो उसे बिना झिझक कुचलने वाला कानून और आधुनिक राज्य चाहिए। सवाल यह भी नहीं कि हिंदू की ऐतिहासिक स्मृति में इस्लामी शासन, विभाजन, पाकिस्तान, कश्मीर और आतंकवाद के घाव हैं या नहीं। पर हैं तो यह भी मानना होगा कि इतिहास मिटाया नहीं जा सकता।

सवाल है—क्या इतिहास की स्मृति वर्तमान का स्थायी भय बने?

जिस हिंदू सभ्यता को हजार वर्षों का विदेशी शासन नहीं मिटा पाया, उसे आज अपने ही गणराज्य में चौदह-पंद्रह प्रतिशत मुसलमान कैसे मिटा देंगे?

यही वह सवाल है जिसे शायद हिंदुत्व की राजनीति से पहले स्वयं हिंदू को अपने से पूछना चाहिए।

मेरा मानना है कि आधुनिक काल में हमने सनातन होने का असल अर्थ समझा ही नहीं। सनातन केवल पुराना होना नहीं। उसका अर्थ इतनी लंबी सभ्यतागत स्मृति के बाद आत्मविश्वासी होना भी है। यदि एक अरब के आसपास हिंदू रोज इस भय में जिएं कि चौदह-पंद्रह प्रतिशत मुसलमान उन्हें मिटा देंगे तो समस्या मुसलमान की ताकत भर नहीं है। कुछ समस्या हिंदू के आत्मविश्वास की भी है।

और मुसलमान को भी समझना होगा कि हिंदू का प्रत्येक भय झूठ, षड्यंत्र या “इस्लामोफोबिया” कह देने से वह खत्म नहीं होगा। मुस्लिम कट्टरता का सबसे पहला शिकार भारत का हिंदू नहीं, स्वयं सामान्य मुसलमान है। मौलाना जितना शक्तिशाली होगा, मुस्लिम नागरिक उतना छोटा होगा।

तभी ‘इकॉनोमिस्ट’ के यूरोप से भारत के लिए मेरा निष्कर्ष उलटा है।

यूरोप में सवाल है, देशों में बहस है—क्या इस्लाम हमें मिटा देगा?

जबकि भारत को पूछना चाहिए—जिस सनातन को इतिहास नहीं मिटा सका, उसे वर्तमान से इतना डर क्यों है?

और मुसलमान को पूछना चाहिए—जिस गणराज्य ने मुझे बराबर नागरिक बनाया, मैं अपना भविष्य गणराज्य में खोजूं या मजहबी घेरे में? या सऊदी अरब, पाकिस्तान में?

दोनों के उत्तर में भारत का भविष्य है।

क्योंकि भयाकुलता में हिंदू भी छोटा होता है। मुसलमान भी।

जबकि सभ्यता आत्मविश्वास से बड़ी होती है, भय से नहीं।

बहरहाल, ‘द इकॉनोमिस्ट’ का विश्लेषण यह भी प्रश्न बनाता है कि हम, भारत के लोग इस तरह विचारने में तनिक भी समर्थ क्यों नहीं हैं?

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By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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