इस मई बीजिंग में दिलचस्प दृश्य, नजारा है। डोनाल्ड ट्रंप का ‘ग्रेट हॉल ऑफ द पीपल’ में स्वागत हुआ। उन्होंने 21 तोपों की सलामी, सैन्य बैंड और अमेरिकी-चीनी झंडे लहराते स्कूली बच्चों की सधी हुई पंक्तियों के बीच प्रवेश किया। कैमरे एक साथ घूमे। लाल कालीन के किनारे खड़े अधिकारी मशीन की तरह ताली बजाते हुए। आखिर एक दशक बाद कोई अमेरिकी राष्ट्रपति चीन यात्रा पर था। कुछ ही दिनों बाद रूस के व्लादिमीर पुतिन भी उसी शहर में पहुँचे। पर मॉस्को ने इसे “रूटीन डिप्लोमेसी” कहा है। रूटीन। यही मौजूदा विश्व राजनीति का खुलासा करने वाला असल शब्द है!
क्योंकि शीत युद्ध के बाद की दुनिया में, एक ही सप्ताह के भीतर अमेरिका और रूस — दोनों के नेताओं का चीन पहुँचना, कोई साधारण कूटनीतिक घटना नहीं है।
जी-20 जैसे बहुपक्षीय मंचों या संयुक्त राष्ट्र की संस्थागत छतरी से बाहर, ऐसा दृश्य कभी सामान्य नहीं माना जाता था। लेकिन आज यह न तो असंभव लगता है, न चौंकाने वाला। एक दशक पहले तक वॉशिंगटन निर्विवाद वैश्विक केंद्र हुआ करता था। राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री अमेरिका जाते थे क्योंकि वहीं संकट सुलझते थे, गठबंधन तय होते थे और विश्व व्यवस्था की अनौपचारिक भाषा लिखी जाती थी।
आज कूटनीतिक आवाजाही का भूगोल बदल चुका है। अब स्वयं वॉशिंगटन बीजिंग की ओर देखता है, सिर्फ व्यापार समझौतों के लिए नहीं बल्कि सप्लाई चेन, दुर्लभ खनिजों, विनिर्माण निर्भरता और यहाँ तक कि होरमुज़ जलडमरूमध्य जैसे सामरिक दबावों के संदर्भ में भी। धीरे-धीरे यह स्पष्ट होने लगा है कि चीन अब केवल प्रतिस्पर्धी शक्ति नहीं है। वह ऐसी ताकत बन चुका है जिसके सहयोग से बचना देशों के लिए संरचनात्मक रूप से कठिन होता जा रहा है।
और शी जिनपिंग, चाइनीज़ थिंक-टैंक का कमाल था, जो उन्होंने पश्चिमी दुनिया को ज्ञान दिया कि उनकी सभ्यता क्या होती हुई है!
शी जिनपिंग ने ट्रंप की यात्रा के दौरान “थ्यूसिडाइड्स ट्रैप” का वह हवाला दिया, जिसे पहले तो ट्रंप समझ नहीं पाए और न उनके कूटनीतिज्ञ। फिर जब समझे, तो ट्रंप खिसियाते हुए थे।
“थ्यूसिडाइड्स ट्रैप” अवधारणा प्राचीन यूनानी इतिहासकार थ्यूसिडाइड्स की है। उन्होंने History of the Peloponnesian War में लिखा था कि एथेंस के उभार और उससे स्पार्टा में पैदा हुए भय ने युद्ध को लगभग अपरिहार्य बना दिया था। आधुनिक यथार्थवादी विचारकों ने इसी ढाँचे का उपयोग अमेरिका और उभरते चीन के बीच संरचनात्मक तनाव को समझाने के लिए भी किया है।
जॉन मीयर्शाइमर के “ऑफेंसिव रियलिज़्म” ने इस तर्क को धार दी है। इसका अर्थ है कि स्थापित महाशक्ति अपने प्रभाव क्षेत्र में किसी दूसरी शक्ति को इतना प्रभावशाली होते नहीं देखना चाहती कि वह प्रभुत्व स्थापित कर सके। दूसरी ओर, उभरती शक्ति अपनी क्षमता हासिल करने के बाद विस्तार रोकना नहीं चाहती। इस सोच में प्रतिद्वंद्विता किसी नीति की विफलता या कूटनीतिक गलतफहमी नहीं, बल्कि शक्ति संरचना की स्वाभाविक परिणति होती है।
शी जिनपिंग इस वैचारिक साहित्य को भलीभाँति समझते हैं। इसलिए बीजिंग में उनके शब्द इतने भारी लगे। अमेरिकी राष्ट्रपति के साथ बैठकर उन्होंने सार्वजनिक रूप से पूछा कि क्या चीन और अमेरिका “कथित थ्यूसिडाइड्स ट्रैप” से ऊपर उठकर “महाशक्तियों के संबंधों का नया प्रतिमान” बना सकते हैं।
सतह पर यह संवाद सहयोगात्मक लगेगा। लेकिन भीतर यह कहीं अधिक गहरी बात कह रहा था। चीन अब उस विकासशील देश की तरह बात नहीं कर रहा था, जो अमेरिकी नेतृत्व वाली व्यवस्था में जगह माँग रहा हो। वह एक सभ्यता-स्तरीय राष्ट्र की तरह बोल रहा था, जो स्वयं को वॉशिंगटन के बराबर और शायद आने वाली सदी का उत्तराधिकारी, अमेरिका की जगह लेने वाला मानने लगा है।
असल दिलचस्प बात यह है कि पश्चिम के यथार्थवादी (रियलिज़्म) विचारकों ने प्रतिद्वंद्विता का अनुमान तो सही लगाया, पर चीन के उभार के तरीके को पूरी तरह न समझ पाए, और न समझ पा रहे हैं।
बीजिंग ने सोवियत संघ की तरह अमेरिकी व्यवस्था को बाहर से चुनौती नहीं दी। उसने उसी व्यवस्था के भीतर प्रवेश किया, जिसे शीत युद्ध के बाद वॉशिंगटन ने बनाया था, और धीरे-धीरे खुद को उसके लिए अनिवार्य बना लिया। पहले लगभग अदृश्य तरीके से। फिर लगातार धैर्य के साथ।
चीन के शेन्ज़ेन के कारखानों से लेकर अफ्रीका के बंदरगाहों तक, यह विस्तार धीरे-धीरे दिखाई देने लगा। चीन से कंटेनर जहाज़ों की कतारें लंबी होती गईं। एशियाई बंदरगाहों पर चीनी क्रेनें खड़ी होने लगीं। खाड़ी के कारोबारी अब सिर्फ डॉलर नहीं, युआन में भी संभावनाएँ गिनने लगे।
मतलब वैश्वीकरण की धमनियों में — विनिर्माण, औद्योगिक सप्लाई चेन, बुनियादी ढाँचा वित्तपोषण, दुर्लभ खनिज, व्यापार मार्ग और उपभोक्ता बाजारों, सभी में चीन अब इस तरह समा गया है कि उसे अलग करना रणनीतिक कदम कम और आर्थिक आत्मघात अधिक लगने लगा।
ठीक दूसरी तरफ वॉशिंगटन व्यापार युद्धों, संस्थागत थकान और राजनीतिक तमाशों में लगातार उलझा हुआ है। चीन ने इतिहास की लंबी घड़ी पर भरोसा रखने वाले राष्ट्र की ठंडी धैर्यशीलता के साथ निर्माण जारी रखा। महाद्वीपों में फैलाए बंदरगाह। एशिया, अफ्रीका और खाड़ी तक फैले उसके बेल्ट एंड रोड गलियारे। ग्लोबल साउथ में बढ़ते कूटनीतिक नेटवर्क। रेयर-अर्थ पर पकड़। सेमीकंडक्टर महत्वाकांक्षाएँ। यहाँ तक कि एक-दूसरे पर अविश्वास करने वाले देशों के बीच मध्यस्थ बनने की उसकी छवि भी धीरे-धीरे गढ़ी गई।
चीन ने वह बात जल्दी समझ ली थी, जिसे पश्चिम बहुत देर से समझ पाया। इक्कीसवीं सदी में शक्ति केवल सबसे बड़ी सेना के पास नहीं होगी। बल्कि शक्ति उस देश के पास भी होगी, जो वैश्विक अर्थव्यवस्था की धुरी बन जाए, जिसके बिना व्यवस्था को चलाना कठिन और उससे टकराना अत्यधिक महँगा हो जाए।
धीरे-धीरे आँकड़े भी वही कहानी कहने लगे, जिसकी राजनीतिक भूमिका शी जिनपिंग पहले से तैयार कर रहे थे। परचेजिंग पावर पैरिटी के हिसाब से चीन की अर्थव्यवस्था अमेरिका को पीछे छोड़ चुकी है और 2035 तक यह अंतर और बढ़ने का अनुमान है। ये आँकड़े People’s Daily की राष्ट्रवादी सुर्खियों से नहीं आए। ये उन्हीं पश्चिमी संस्थानों से आए हैं, जिनकी वैचारिक रुचि बीजिंग की महत्वाकांक्षाओं को वैध ठहराने में नहीं है।
दिशा वर्षों से दिखाई दे रही थी। पीछे रह गई थी केवल पश्चिमी राजनीतिक मानस की वह भावनात्मक तैयारी, जो इस सच्चाई को स्वीकार कर सके कि इक्कीसवीं सदी में शक्ति का केंद्र किस ओर खिसक रहा है।
सो यथार्थवादियों ने प्रतिद्वंद्विता को सही पहचाना। लेकिन वे उस रास्ते को पूरी तरह नहीं समझ पाए, जिसके जरिए चीन ऊपर उठेगा। यही कारण है कि यह क्षण केवल वॉशिंगटन में नहीं, बल्कि यूरोप, एशिया और अब धीरे-धीरे भारत में भी मनोवैज्ञानिक असहजता पैदा कर रहा है। सरकार में चीन को माईबाप मानने का मानस बन रहा है। हालांकि अमेरिका के पास अद्वितीय सैन्य ताकत अब भी है। डॉलर अब भी वैश्विक वित्त का आधार है। सिलिकॉन वैली अब भी तकनीकी कल्पना को आकार देती है। लेकिन चीन अब ऐसी स्थिति में पहुँच चुका है, जहाँ वैश्विक अर्थव्यवस्था उसकी भागीदारी के बिना सहज रूप से चलती हुई नहीं दिखती।
ट्रंप चीन पहुँचे सौदों, टैरिफ़ और लेन-देन की भाषा लेकर। जबकि शी जिनपिंग इतिहास परिवर्तन की भाषा बोल रहे थे। एक व्यक्ति मौजूदा व्यवस्था के भीतर बातचीत कर रहा था। दूसरा शांत स्वर में संकेत दे रहा था कि नई व्यवस्था बननी शुरू हो चुकी है।
दुनिया अब भी इस शब्दावली से बचने की कोशिश कर सकती है — आदत, nostalgia या रणनीतिक असहजता के कारण। लेकिन वास्तविकता को छिपाना लगातार कठिन होता जा रहा है और होगा।
शी जिनपिंग अब केवल सम्मेलनों में शामिल होने वाले नेता नहीं रह गए हैं। वे धीरे-धीरे उस भू-राजनीतिक मंच के केंद्र में बैठते दिख रहे हैं, जिसके चारों ओर बाकी शक्तियों को आकर खड़ा होना पड़ रहा है। उनकी डायरी भरी हुई है। वॉशिंगटन को उनका leverage चाहिए। मॉस्को को उनके बाजार चाहिए। यूरोप उनके साथ सावधानी से बातचीत करता है। खाड़ी देश उन्हें लुभा रहे हैं। ग्लोबल साउथ अब बीजिंग को वैकल्पिक शक्ति नहीं, बल्कि आवश्यक शक्ति की तरह देखने लगा है।
बीजिंग की शामों में अब यह बदलाव दिखाई देने लगा है। विदेशी प्रतिनिधिमंडलों के मोटरकेड लगातार आते-जाते हैं। होटल लॉबी में अनुवादकों और सुरक्षा अधिकारियों की धीमी आवाजें घुली रहती हैं। कभी दुनिया जिन गलियारों को केवल अमेरिकी शक्ति का विस्तार मानती थी, वहाँ अब चीनी उपस्थिति स्थायी लगने लगी है।
और जब अमेरिका और रूस दोनों के राष्ट्रपति एक ही सप्ताह में बीजिंग पहुँचते हैं तो किसी बहुपक्षीय सम्मेलन के लिए नहीं बल्कि शी जिनपिंग के सामने बैठने के लिए, तब बहस लगभग समाप्त हो जाती है।
यह अब किसी उभरती हुई शक्ति की मुद्रा नहीं है।
यह एक महाशक्ति का उभर चुका स्वरूप है।


