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ममता ने भरोसा पहले गंवाया!

भारत के कोई सत्तारूढ़ पार्टी चुनाव इसलिए नहीं हारती कि कोई विकल्प आ खड़ा हुआ है। उसका पतन तब होता है, जब विश्वास खत्म हो जाता है। और लगभग चुपचाप विकल्प शक्ल पा जाता है। यही आज के चुनाव नतीजों का लबोलुआब है। सत्ता बहसबाजी से नहीं, भरोसे के खिसकने से हारती है।

राजनीति चालबाज हो सकती है। नेता उससे भी ज्यादा चालाक होते हैं। लेकिन एक क्षण ऐसा आता है जब जनता दोनों को असहज कर देती है। वह न बहस करती है, न अपने इरादे की घोषणा करती है। वह बस अपना विश्वास खींच लेती है। और जैसे ही यह होता है, वे सारी बातें, नैरेटिव, आख्यान—जिन्हें मेहनत से गढ़ा गया था, आत्मविश्वास से दोहराया गया था वे सब धीरे-धीरे ढहने लगते हैं।

मई 2026 का विधानसभा चुनाव 2024 की छाया में ही है।  माहौल में पहले से तय नतीजे का आत्मविश्वास था। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की वापसी मानी जा रही थी, भले थोड़ी कमजोर हो। तमिलनाडु में द्रविड़ मुनेत्र कड़गम के खिलाफ सत्ता-विरोधी रुझान टिक नहीं पाएगा, यह भी मान लिया गया था। केरल परिचित ढर्रे में रहेगा। और असम में, विपक्ष कितना भी शोर करे, कथा का केंद्र हिमंत बिस्व सरमा ही बने रहेंगे।

सब कुछ स्थिर लगता था। और अक्सर यही वह समय होता है, जब जमीन खिसकती है। भारतीय मतदाता बदलाव की घोषणा पहले नहीं करता। वह सब सुनता है, संकेतों को समझता है, मानो सहमत दिखता है—और फिर, मतदान केंद्र में, मतपत्र पर, अपना फैसला बदल देता है। 2026 में भी यही हुआ। जनता ने सिर्फ हिस्सा नहीं लिया, उसने हस्तक्षेप किया। उसने उस पुराने सवाल को—विकल्प कहाँ है?—उलट दिया। दिखा दिया कि सवाल ही गलत है। भारत में विकल्प खोजे नहीं जाते, वे बनते हैं—जब वर्तमान याकि मौजूद सत्ता का जलवा बिखरा लगता है।

बंगाल से शुरू करें।

दो साल से राज्य में एक हल्की सरसराहट थी। इतनी तेज़ नहीं कि उसे लहर कहा जाए, पर इतनी लगातार कि उसे नजरअंदाज भी नहीं किया जा सके। लोकसभा चुनावों के दौरान कोलकत्ता में मुझे यह सरसराहट भारतीय जनता पार्टी की ओर जिज्ञासा में बदलती दिखी। और यह केवल “गैर-बंगाली” मतदाता की बेचैनी नहीं थी। यह बंगाल के भीतर से आ रही थी—गाँवों से लेकर शहरों के उभरते वर्ग तक। भद्रलोक भी, अपने संकोची अंदाज में, इसे महसूस करने लगे थे। लेकिन महसूस करना और साथ खड़ा होना अलग बातें हैं। संकेत साफ थे, भरोसा अभी नहीं टूटा था।

बंगाल में बेचैनी बढ़ रही थी। एक झिझक बनी रही—जब तक कि टूट नहीं गई। क्योंकि यह सिर्फ सत्ता-विरोध नहीं था। यह उससे गहरा था—मोहभंग। पंद्रह साल काफी होते हैं कि उम्मीद थकान में बदल जाए। ममता बनर्जी के उभार के साथ जो बदलाव का वादा आया था, वह धीरे-धीरे निरंतरता में बदल गया। सत्ता बनी रही। कई जगहों पर डर भी बना रहा, लेकिन डर भरोसा नहीं बनाता।

यह बात अनौपचारिक बातचीत में भी सुनाई देती थी। दिल्ली में काम करने आईं बंगाल की महिलाएँ “दीदी” के बारे में इस बार धीरे बोलती थीं—जैसे आलोचना कहीं लौट न आए, जैसे उसका कोई असर हो सकता हो। यह राजनीति की भाषा नहीं थी। यह अनुभव की भाषा थी। जहाँ आलोचना फुसफुसाहट में बदल जाए, वहाँ भरोसा पहले ही टूट चुका होता है!

2024 के आसपास यह बदलने लगा। संयम टूटा। दबा हुआ असंतोष सामने आने लगा—बिना किसी विचारधारा के, बिना भाषण के, सीधे जीवन की सच्चाई में। “वहाँ हमारे लिए कुछ नहीं है। इसलिए हम यहाँ आते हैं।” जाहिर है यह नारा नहीं, अनुभव का फैसला था।

कोलकाता में भी यही थकान महसूस होती थी। अपनी पुरानी सुंदरता के बावजूद, मुझे औपनिवेशिक इमारतों और विक्टोरिया के आसपास—शहर ठहरा हुआ लगा। जैसे वह रुक गया हो, जबकि बाकी आगे बढ़ गए हों। पटना में उतरते ही उल्टा अहसास हुआ—एक शहर जो चल रहा है, कोशिश कर रहा है, बदल रहा है। शहर की रफ्तार ही उसकी राजनीति बताती है।

ममता बनर्जी का पतन अचानक नहीं है। वह संकेतों में झलकता हुआ था। लोकसभा के नतीजों में, पहले के चुनावों में—जो जमा होते गए, पर पूरी तरह समझे नहीं गए। लंबे समय तक सत्ता में रहने से एक तरह की अंधता आ जाती है। संकेत शोर लगने लगते हैं। यहाँ चूक विपक्ष को समझने में नहीं थी। चूक विश्वास के कम होते जाने को समझने में थी। सत्ता पार्टी अक्सर अपने विरोधियों को नहीं, अपने संकेतों को गलत पढ़ती है।

खासकर उस पीढ़ी के बीच, जिसने बाहर की दुनिया देख ली है और अब वह दिक्क्तों, सीमाओं को स्वीकार करने को तैयार नहीं है। उन्हे विचारधारा नहीं चाहिए थी। वे गति चाहते थे, बदलाव चाहते थे। और जब वह नहीं मिलता है तो विश्वास खत्म होने लगता है। नई पीढ़ी वादों को नहीं, गति को मापती है, ताजगी चाहती है।

निश्चित ही अब बहसबाजी होंगी—संस्थाओं को लेकर, SIR पर, चुनाव आयोग पर, हेराफेरी पर। पर ये सब सतह की बातें हैं। इसके नीचे एक सीधी सच्चाई है: बंगाल बहुत पहले बदलना शुरू हो चुका था, परिणाम से बहुत पहले। एक राज्य, जो दशकों तक वामपंथ की ओर झुका रहा, अब चुपचाप दिशा बदल रहा था—सिर्फ पार्टी के स्तर पर नहीं, सोच के स्तर पर। वह चेहरे से थक गया था, बदलाव चाहता था, तेजी चाहता था। वह विकास की बड़ी कहानी का हिस्सा बनना चाहता था। सो चुनाव नतीजे सिर्फ घोषणा होती है, बदलाव उससे पहले हो चुका होता है।

2026 के राज्य चुनावों का संदेश साफ है। भारत में सत्ता चुनौती से नहीं गिरती। वह तब गिरती है, जब उस पर विश्वास खत्म हो जाता है।

और यह सिर्फ बंगाल की कहानी नहीं है। तमिलनाडु में क्या हुआ। पुराने से विश्वास का टूटना, ऊबना चुपचाप जमा होता है। और नए विकल्पों में अचानक ताजा-ताजा बना विकल्प चुन लिया गया है। और केरल में मतदाताओं की आदत पहले से ही अपनी अपनी लय में बदलाव करते रहना हैं। इन सभी राज्यों में बेचैनी हर जगह मुखरता से दिखी नहीं, लेकिन होती जरूर है। मौन, शांत दिखने वाला समाज अक्सर सबसे पहले बदलता है।

यही वह मौन-बारीक चेतावनी है। न बहुत तेज़, न बहुत तीखी—लेकिन साफ। भारत में सत्ता अक्सर अपने विरोधियों से नहीं हारती। वह अपने ही घटते भरोसे से हारती है। और जब यह ऊपर दिखता है, तब तक नीचे का मतदाता आगे बढ़ चुका होता है। जनता घोषणा नहीं करती वह अपना फैसला सुना देती है।

By श्रुति व्यास

संवाददाता/स्तंभकार/ संपादक नया इंडिया में संवाददता और स्तंभकार। प्रबंध संपादक- www.nayaindia.com राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय राजनीति के समसामयिक विषयों पर रिपोर्टिंग और कॉलम लेखन। स्कॉटलेंड की सेंट एंड्रियूज विश्वविधालय में इंटरनेशनल रिलेशन व मेनेजमेंट के अध्ययन के साथ बीबीसी, दिल्ली आदि में वर्क अनुभव ले पत्रकारिता और भारत की राजनीति की राजनीति में दिलचस्पी से समसामयिक विषयों पर लिखना शुरू किया। लोकसभा तथा विधानसभा चुनावों की ग्राउंड रिपोर्टिंग, यूट्यूब तथा सोशल मीडिया के साथ अंग्रेजी वेबसाइट दिप्रिंट, रिडिफ आदि में लेखन योगदान। लिखने का पसंदीदा विषय लोकसभा-विधानसभा चुनावों को कवर करते हुए लोगों के मूड़, उनमें चरचे-चरखे और जमीनी हकीकत को समझना-बूझना।

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