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भारत में खो गई है जवाबदेही?

शनिवार को सोनम वांगचुक के साथ जो हुआ, उसे देखते हुए पहली बार लगा कि भारत में केवल राजनीति नहीं बदली है, जवाबदेही भी बदल गई है।

1975 में इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति जगमोहनलाल सिन्हा ने इंदिरा गांधी को चुनावी अनियमितताओं का दोषी ठहराते हुए उनका चुनाव खारिज किया था। फैसला सीधे प्रधानमंत्री के खिलाफ था। इंदिरा गांधी ने उसे स्वीकार करने के बजाय आपातकाल लगाया। वह लोकतंत्र का सबसे अंधकारमय अध्याय था, लेकिन उसमें एक राजनीतिक सच्चाई भी थी। आरोप प्रधानमंत्री पर था और पूरा देश जानता था कि जिम्मेदारी भी प्रधानमंत्री की है। सत्ता बचाने का उनका तरीका लोकतांत्रिक नहीं था, लेकिन जवाबदेही का अंतिम पता किसी को खोजने की जरूरत नहीं थी। भारत का हर नागरिक जानता-समझता था

चौदह वर्ष बाद यही कसौटी राजीव गांधी के सामने आई। वे “मिस्टर क्लीन” की छवि लेकर सत्ता में आए, लेकिन बोफोर्स विवाद उनकी पूरी राजनीतिक पहचान पर छा गया। हालांकि अदालत कभी यह साबित नहीं कर सकी कि उन्होंने व्यक्तिगत रूप से रिश्वत ली थी। फिर भी जनता ने राजनीतिक फैसला दे दिया। प्रधानमंत्री के इतने निकट हुआ सौदा प्रधानमंत्री की राजनीतिक जिम्मेदारी भी बना। और1989 में उसकी कीमत उन्हें सत्ता गंवाकर चुकानी पड़ी।

फिर मनमोहन सिंह आए। उनकी व्यक्तिगत ईमानदारी पर शायद ही किसी ने सवाल उठाया हो। लेकिन लोकतंत्र व्यक्ति की नहीं, पद की जवाबदेही भी तय करता है। 2जी स्पेक्ट्रम और कोयला आवंटन विवाद उनके कार्यकाल में सामने आए। लंबे समय तक कोयला मंत्रालय स्वयं उनके पास था। इसलिए “मुझे जानकारी नहीं थी” जैसी सफाई राजनीतिक रूप से टिक नहीं सकी। किसी ने यह नहीं कहा कि उन्होंने अपनी जेब भरी, लेकिन इतना पर्याप्त था कि विवाद प्रधानमंत्री कार्यालय की चौखट तक पहुँच चुका था। 2014 में उसकी राजनीतिक कीमत कांग्रेस ने चुकाई।

इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और मनमोहन सिंह—तीनों एक-दूसरे से बिल्कुल अलग थे। फिर भी उनमें एक समानता थी। उनके आसपास पैदा हुआ बड़ा विवाद अंततः प्रधानमंत्री तक पहुँचता था। कभी प्रतिष्ठा जाती थी, कभी सरकार, कभी दोनों। उस समय जवाबदेही को सत्ता के शिखर (प्रधानमंत्री पद) तक पहुँचने में ज्यादा समय नहीं लगता था।

यही भारतीय लोकतंत्र का विकास था। उपलब्धि थी। एक महत्वपूर्ण राजनीतिक आदत थी। लोकतंत्र में सरकार का चेहरा ही उसकी अंतिम जवाबदेही भी होता था।

यहीं मुझे लगता है कि पिछले दशक में सबसे बड़ा बदलाव आया है।

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व का दशक विवादों से खाली नहीं रहा। किसानों का लंबा आंदोलन हुआ। देश की शीर्ष महिला पहलवानों ने सत्तारूढ़ दल के प्रभावशाली सांसद के खिलाफ संघर्ष किया। प्रतियोगी परीक्षाओं के प्रश्नपत्र बार-बार लीक हुए। भर्ती प्रक्रियाएँ संदेह के घेरे में आईं। लद्दाख में असंतोष बना। कई मौकों पर नागरिकों ने सरकार से जवाब माँगा।

लेकिन इन सबमें एक बात समान रही। विवाद जंतर-मंतर, दिल्ली के प्रवेश दरवाजों तक और सरकार तक भी पहुँचे, मगर प्रधानमंत्री तक नहीं।

यही इस दौर की सबसे असाधारण राजनीतिक विशेषता है।

यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि विरोध करने वाले वही वर्ग थे जिन्हें नरेंद्र मोदी ने अपनी राजनीति के केंद्र में रखा था। अच्छे दिनों के वायदे में किसान राष्ट्र की रीढ़ बताए गए थे। युवाओं को भारत की सबसे बड़ी शक्ति कहा गया। “डेमोग्राफिक डिविडेंड” केवल आर्थिक अवधारणा नहीं, बल्कि पूरे शासनकाल की राजनीतिक कथा थी।

2018 में तुमकुरु के एक युवा सम्मेलन में नरेंद्र मोदी ने कहा था कि यदि समाज के लिए “विद्यार्थी देवो भव” मंत्र है, तो उनके लिए “युवा शक्ति देवो भव” मंत्र है।

फिर प्रश्नपत्र लीक का दौर आया। करोड़ों युवाओं ने केवल परीक्षाएँ नहीं खोईं; उन्होंने व्यवस्था पर अपना भरोसा भी खोया। स्वाभाविक अपेक्षा थी कि जिसने युवाओं को अपनी सबसे बड़ी शक्ति बताया, वही उनके सबसे कठिन समय में सबसे पहले दिखाई देगा।

लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

पहले सन्नाटा रहा। फिर प्रतीक्षा। फिर वही मंत्री अपने पद पर बने रहे जिनके विभाग पर सवाल उठ रहे थे। धीरे-धीरे शिकायत से अधिक चर्चा शिकायत करने वालों पर होने लगी। भारतीय राजनीति में यह नई रणनीति नहीं है। जब किसी प्रश्न का उत्तर कठिन हो, तो बहस को प्रश्न से हटाकर विरोध पर ले जाइए। धीरे-धीरे मूल प्रश्न ही धुँधला पड़ जाता है।

यही बात दूसरे विवादों में भी दिखाई देती है।

ब्रजभूषण शरण सिंह के खिलाफ देश की सात शीर्ष महिला पहलवानों ने आरोप लगाए। लखीमपुर खीरी में चार किसानों की मौत के बाद भी केंद्रीय मंत्री अजय मिश्रा टेनी लंबे समय तक पद पर बने रहे। राष्ट्रीय परीक्षा विवाद में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान पर सवाल उठे। हर बार राजनीतिक बहस किसी मंत्री, किसी सांसद या किसी संस्था तक पहुँची, लेकिन शायद ही कभी प्रधानमंत्री तक पहुँची।

पहले ऐसा नहीं होता था।

इनमें से हर विवाद प्रधानमंत्री कार्यालय के इतना निकट था कि भारतीय राजनीति के पहले के दौर में वह एक-दो सीढ़ियाँ और ऊपर चढ़ता। अब वह जैसे अंतिम सीढ़ी पर पहुँचने से पहले ही रुक जाता है।

ऐसा क्यों?

इसका एक उत्तर राजनीतिक प्रबंधन में है। हर सरकार विवादों को नियंत्रित करने की कोशिश करती है। जाँच बैठती है, समय लिया जाता है, बहस का केंद्र बदला जाता है। मोदी सरकार ने यह कला असाधारण दक्षता से सीखी है। लेकिन केवल राजनीतिक प्रबंधन पर्याप्त उत्तर नहीं है।

उसके लिए नरेंद्र मोदी की सार्वजनिक छवि को भी समझना होगा। उनके पीछे कोई राजनीतिक वंश नहीं है। रिश्तेदारों के लाभ उठाने की सार्वजनिक कहानियाँ नहीं हैं। निजी संपत्ति बढ़ाने की व्यापक धारणा भी नहीं है। उन्होंने स्वयं को बार-बार “फकीर” कहा है। बड़ी संख्या में लोग इस छवि पर विश्वास करते हैं। और लोकतंत्र में विश्वास केवल नेता की छवि नहीं बदलता, जवाबदेही का रास्ता भी बदल देता है।

फिर भी यहीं सबसे बड़ा विरोधाभास खड़ा होता है।

यदि प्रधानमंत्री वास्तव में अपने आसपास के विवादों से पूरी तरह अछूते हैं, तो फिर वही विवाद बार-बार बने क्यों रहते हैं? जो नेता व्यक्तिगत रूप से सबसे सुरक्षित हो, उसके लिए विवादित सहयोगियों से दूरी बनाना, उन्हे हटाना सबसे आसान होना चाहिए। वास्तविक अधिकार वही है जो अपने लोगों पर भी लागू हो सके।

लेकिन बार-बार उलटा दिखाई देता है। विवाद समाप्त करने के बजाय उन्हें साथ लेकर चलने का निर्णय लिया जाता है।

संभव है इसका उत्तर नरेंद्र मोदी की व्यक्तिगत निष्कलंकता से कम और उनकी तथा अमित शाह की राजनीतिक गणित से अधिक जुड़ा हो। हर नेता निष्ठाओं के नेटवर्क के सहारे शासन करता है। किसी प्रभावशाली सहयोगी को हटाना केवल नैतिक निर्णय नहीं, राजनीतिक जोखिम भी है। शक्ति-संतुलन बदलता है, संगठन को संदेश जाता है और समीकरण प्रभावित होते हैं। इसलिए विवाद को सह लेना, कई बार उसे समाप्त करने से सस्ता पड़ता है।

या फिर बात इससे भी आगे की है।

संभव है नेतृत्व को अब यह भरोसा हो गया हो कि विवाद, आंदोलन, असंतोष, गुस्सा शीर्ष नेतृत्व तक राजनीतिक नुकसान पहुँचाने की क्षमता खो चुके हैं। नरेंद्र मोदी और उनके समर्थकों के बीच बना भावनात्मक संबंध इतना मजबूत हो चुका है कि बड़ी संख्या में मतदाता प्रधानमंत्री और उनके नाम पर शासन करने वालों के बीच स्पष्ट अंतर कर लेते हैं। सरकार से शिकायत हो सकती है, किसी मंत्री से नाराज़गी भी हो सकती है, लेकिन उसकी राजनीतिक जिम्मेदारी स्वतः प्रधानमंत्री तक नहीं पहुँचती।

यहीं से वह प्रश्न जन्म लेता है जो शायद नरेंद्र मोदी से भी बड़ा है।

लोकतंत्र का तब क्या होता है, जब जवाबदेही अपनी पूरी यात्रा करना बंद कर दे?

स्वतंत्र भारत के अधिकांश इतिहास में राजनीतिक जिम्मेदारी अंततः सत्ता के सर्वोच्च पद तक पहुँच जाती थी। कभी वह प्रक्रिया अपूर्ण थी, कभी कठोर, कभी अन्यायपूर्ण भी। लेकिन यात्रा पूरी होती थी।

आज असहमति अब भी है। आंदोलन भी हैं। सवाल भी हैं। बदला है तो केवल उनका रास्ता।

शनिवार को सोनम वांगचुक के साथ जो हुआ, उसने मुझे इसी बदलाव का एहसास कराया। प्रश्न उठा, लेकिन वह भी अंततः उसी जगह जाकर ठहर गया जहाँ पिछले कई वर्षों से दूसरे प्रश्न ठहरते आए हैं।

शायद यही हमारे समय का सबसे बड़ा राजनीतिक परिवर्तन है। भारत में विवाद खत्म नहीं हुए हैं। विरोध भी खत्म नहीं हुआ है। लेकिन जवाबदेही जैसे अपनी आख़िरी सीढ़ी तक पहुँचना भूल गई है।

यह केवल एक लोकप्रिय प्रधानमंत्री की कहानी नहीं है। यह उस लोकतांत्रिक मनोविज्ञान की कहानी है जिसमें सत्ता का सर्वोच्च पद पहले की तरह सबसे बड़ा उत्तरदायित्व नहीं रह गया है।

कभी भारतीय लोकतंत्र में जवाबदेही का रास्ता सीधा प्रधानमंत्री के दरवाज़े तक जाता था। आज वह रास्ता जैसे कहीं बीच में मुड़ जाता है। शायद यही कारण है कि मोदी वर्षों की कहानी केवल नरेंद्र मोदी की कहानी नहीं रह जाती; वह भारतीय लोकतंत्र की बदलती प्रकृति की कहानी बन जाती है। उसमें असहमति जीवित है, प्रश्न भी जीवित हैं, लेकिन उन प्रश्नों का अंतिम पता अब पहले जितना निश्चित नहीं रह गया है।

By श्रुति व्यास

संवाददाता/स्तंभकार/ संपादक नया इंडिया में संवाददता और स्तंभकार। प्रबंध संपादक- www.nayaindia.com राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय राजनीति के समसामयिक विषयों पर रिपोर्टिंग और कॉलम लेखन। स्कॉटलेंड की सेंट एंड्रियूज विश्वविधालय में इंटरनेशनल रिलेशन व मेनेजमेंट के अध्ययन के साथ बीबीसी, दिल्ली आदि में वर्क अनुभव ले पत्रकारिता और भारत की राजनीति की राजनीति में दिलचस्पी से समसामयिक विषयों पर लिखना शुरू किया। लोकसभा तथा विधानसभा चुनावों की ग्राउंड रिपोर्टिंग, यूट्यूब तथा सोशल मीडिया के साथ अंग्रेजी वेबसाइट दिप्रिंट, रिडिफ आदि में लेखन योगदान। लिखने का पसंदीदा विषय लोकसभा-विधानसभा चुनावों को कवर करते हुए लोगों के मूड़, उनमें चरचे-चरखे और जमीनी हकीकत को समझना-बूझना।

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