ग्राउंड रिपोर्ट – श्रुति व्यास
मैंने सोमवार सुबह यह गलत लिखा कि भारत की जेनरेशन-ज़ेड राजनीति से उदासीन है, डरपोक तरुणाई है और व्यवस्थापरस्त है। लेकिन सोमवार को ही नई दिल्ली की लुटियंस दिल्ली की सड़कों ने मेरा भ्रम चकनाचूर कर दिया। चार-चार परतों वाली बैरिकेडिंग, रैपिड एक्शन फोर्स, सीआरपीएफ और दिल्ली-त्रिपुरा आदि की पुलिस के हजारों जवानों, दंगा-रोधी वाहन, नाकाबंदी, बंद मेट्रो स्टेशन और बाधित इंटरनेट के बावजूद युवाओं का जनसैलाब अकल्पनीय था। मैंने सोचा था कि सोनम वांगचुक को जंतर-मंतर से उठवा कर सरकार ने 20 जुलाई के प्रदर्शन को फुस्स कर दिया है। पर आज प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह भी जान गए होंगे कि जिस युवापीढ़ी को वे अपना ‘डेमोग्राफिक डिविडेंड’ मानते थे, वही अब जज़्बाती गुस्से में है।
मैं सुबह साढ़े दस बजे से शाम पाँच बजे तक संसद भवन के इर्द-गिर्द, रिज़र्व बैंक के आसपास, पटेल चौक, संचार भवन, जंतर-मंतर, कॉन्स्टिट्यूशन क्लब और रायसीना रोड पर उस युवा जोश से रूबरू थी, जिसमें लड़कों से अधिक लड़कियाँ गुस्से में दिखीं। पुलिस से लड़कियाँ न केवल भिड़ रही थीं, बल्कि वे मीडिया से भी बेबाकी से बोल रही थीं। पुलिसकर्मियों से वे पूछ रही थीं, “क्या तुम्हारे बेटे-बेटियाँ नहीं हैं?”
ऐसा दिन न अन्ना आंदोलन के समय था और न निर्भया आंदोलन के समय। जबकि आज पूरा दिन उमस से भरा था। इतनी उमस कि कपड़े शरीर से चिपक जाएँ। बादल बरसते, फिर धूप निकल आती, फिर बारिश लौट आती। लेकिन मौसम जितना भारी था, पुलिस बंदोबस्त जितने भारी थे युवाओं का उत्साह उससे कहीं अधिक था। समय बीतने के साथ भीड़ कम नहीं हुई, वह लगातार बढ़ती गई। जंतर-मंतर की ओर आने वाली लगभग हर सड़क छात्रों और युवाओं से भरी थी। नारे गूंज रहे थे। जोश, हिम्मत साफ महसूस हो रही थी। यदि कोई पूछता कि “हाउ इज़ द जोश?”, तो जवाब दिल्ली की सड़कें खुद दे रही थीं—“हाई।”
प्रदर्शन में केवल दिल्ली का ही युवा नहीं था। देश के अलग-अलग हिस्सों से छात्र पहुंचे थे। मेरी मुलाकात जयपुर से आए कुछ युवाओं से हुई, जो सिर्फ मार्च में शामिल होने नहीं, बल्कि एकजुटता जताने आए थे। पंजाब, मुंबई, हरियाणा और कई दूसरे राज्यों से भी छात्र पहुंचे थे। भीड़ में इंजीनियर थे, डिजाइनर थे, एमबीए के छात्र थे, कानून पढ़ने वाले थे, किसान परिवारों के युवा थे। कई पहली बार दिल्ली आए थे। वे सिर्फ अपनी उपस्थिति दर्ज कराने नहीं, बल्कि अपनी आवाज़ सुनाने आए थे।
भीड़ में मेरी मुलाकात दिल्ली विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी में स्नातक कर चुकी रागिनी से हुई। वह पुलिस की बैरिकेडिंग के ठीक बाहर खड़ी थी। कुछ ही मिनट पहले महिला पुलिसकर्मी उसे घसीट कर वहां तक लाई थीं। उसके छोटे-छोटे हाथों की त्वचा अब भी लाल पड़ी थी। कलाइयों पर उभरते नीले निशान साफ दिखाई दे रहे थे। लेकिन उसके चेहरे पर डर नहीं था। उल्टा, जैसे उस टकराव ने उसके इरादे को और धार दे दी हो। बात करते हुए वह अनमने ढंग से अपनी उंगलियां मोड़ती-खोलती रही, मानो दर्द अब उसके लिए मायने ही नहीं रखता। आंखों में आग थी, आवाज़ में ज़रा भी कंपन नहीं। वह मयूर विहार से प्रदर्शन देखने नहीं आई थी। वह उसका हिस्सा बनने आई थी
रागिनी ने बताया कि जिस मास्टर्स कोर्स में वह दाखिला लेना चाहती है, उसमें सामान्य वर्ग के लिए अब केवल 18 सीटें बची हैं। जिस एनसीसी मार्ग से आगे बढ़ने की उसने योजना बनाई थी, उसके पात्रता नियम भी बदल दिए गए हैं। और अगर वह अभी नौकरी करने लगे, तो मुश्किल से बारह हजार रुपये महीने कमा पाएगी।”आप ही बताइए,” उसने मुझसे पूछा, “ग्रेजुएट होकर भी सिर्फ़ बारह हजार कमाऊंगी?” फिर वह बोली, “नेता अपने बच्चों को विदेश पढ़ने भेजते हैं। आलीशान ज़िंदगी जीते हैं। हमारा क्या?” दोपहर तक रागिनी उस विशाल जनसमूह का सिर्फ़ एक चेहरा रह गई थी, जो देश के अलग-अलग हिस्सों से राजधानी के दिल की ओर बढ़ रहा था।
रागिनी अकेली नहीं थी। उसके जैसे सवाल पूरे प्रदर्शन में बार-बार सुनाई दे रहे थे।
संसद मार्ग के बाहर मेरी मुलाकात उन कुछ दोस्तों से हुई, जो सिर्फ़ एकजुटता जताने के लिए रातभर का सफ़र तय कर जयपुर से आए थे। पंजाब, महाराष्ट्र, हरियाणा और उत्तर प्रदेश से भी छात्र पहुंचे थे। कई तो सीधे रेलवे स्टेशन से अपने बैग कंधों पर लटकाए मार्च में शामिल हुए। उनमें से कई ने बताया कि यह उनके जीवन का पहला प्रदर्शन था।
थोड़ी देर बाद मेरी मुलाकात हिमांशी से हुई। वह और उसकी सहेलियाँ आंसू गैस के गोले छोड़े जाने के बाद आगे बढ़ रही थीं। आँखें लाल थीं। हाथों और कलाइयों पर धक्का-मुक्की के निशान थे। लेकिन उनमें डर नहीं था। हिमांशी पिछले वर्ष ग्रेजुएशन कर चुकी है और फैशन इंडस्ट्री में काम करती है। उसके साथ काम करने वाली उसकी सहेलियाँ भी थीं। ढीली जींस, टी-शर्ट और सिर पर बंधे बैंडाना पहने ये युवा किसी राजनीतिक संगठन की पारंपरिक तस्वीर नहीं लग रहे थे। लेकिन बातचीत शुरू होते ही उनकी राजनीतिक चेतना साफ दिखाई देने लगी। वे भ्रष्टाचार, सत्ता के दुरुपयोग और सरकार की कार्यशैली पर खुलकर सवाल उठा रहे थे।
कुछ ही दूरी पर एक प्रदर्शनकारी आइसक्रीम खाते हुए एक पोस्टर पकड़े खड़ा था, जिसमें पुराने मेलोडी चॉकलेट विज्ञापन का व्यंग्यात्मक रूपांतरण किया गया था। काले चश्मे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर के नीचे लिखा था—”पेपर लीक कब बंद होगा? मेलोडी खाओ, खुद जान जाओगे।” राहगीर मुस्कुरा रहे थे, तस्वीरें खींच रहे थे। लेकिन उस हास्य के भीतर कड़वाहट इतनी गहरी थी कि उसे नज़रअंदाज़ करना मुश्किल था। दूसरे पोस्टरों पर बस तीन मांगें लिखी थीं—नौकरियां, जवाबदेही और भविष्य।
सांझ ढलते-ढलते एड्रेनालिन की जगह थकान ने ले ली। कपड़े भीग चुके थे। आवाज़ें बैठ चुकी थीं। दर्जनों छात्र हिरासत में लिए जा चुके थे। एक बैरिकेड के पास एक युवती चुपचाप फुटपाथ पर बैठी थी। उसके गले में एन-95 मास्क लटक रहा था। दोनों हाथों से उसने एक गत्ते का पोस्टर ऊपर उठा रखा था—”हम बोलते हैं क्योंकि हम अपने देश से प्यार करते हैं।”
उसके आसपास कोई नारा नहीं था। कोई ढोल नहीं बज रहा था। बस पूरे दिन की उथल-पुथल के बीच एक छात्रा चुपचाप बैठी थी और हर बार किसी के गुज़रने पर अपना पोस्टर थोड़ा और ऊंचा उठा लेती थी। वह सिर्फ़ एक पोस्टर नहीं था। वह विश्वास भी था।
शाम तक सफ़र की थकान उनके चेहरों पर साफ़ दिखाई देने लगी थी। कई छात्र फुटपाथों और ट्रैफिक डिवाइडरों पर बैग को तकिया बनाकर और बैनरों को मोड़कर सिरहाना बनाकर लेट गए थे। कोई कुछ मिनट आंखें मूंद लेता, फिर अगला नारा गूंजते ही उठ खड़ा होता। कुछ लोग अनजान साथियों के साथ बिस्कुट के पैकेट और पानी की बोतलें बांट रहे थे। वे थके हुए थे। लेकिन हारे हुए नहीं।
इस भीड़ ने एक और धारणा को तोड़ा। यहां सिर्फ़ छात्र संगठन नहीं थे। इंजीनियरिंग के स्नातक थे, एमबीए की तैयारी करने वाले थे, फैशन डिज़ाइनर थे, वकील थे, युवा किसान थे। वे पढ़े-लिखे थे, सजग थे और उन्हें पूरी स्पष्टता थी कि वे यहां क्यों आए हैं। उनके बीच बुज़ुर्ग पुरुष और महिलाएं भी खड़े थे, जो लगभग पूरी तरह युवाओं द्वारा खड़े किए गए इस आंदोलन को अपनी उपस्थिति से नैतिक बल दे रहे थे।
भीड़ में ग़ुस्सा था, लेकिन अराजकता नहीं। पूरे प्रदर्शन में असहमति का एक उत्सव-सा जीवंत वातावरण था। नारों की लहरें उठती थीं, स्टील की थालियां ताल देती थीं, पैरोडी गीत सत्ता का मज़ाक उड़ाते थे और हज़ारों सिरों के ऊपर पोस्टर झूमते रहते थे। फिर अचानक पुलिस का लाठीचार्ज हुआ। आंसू गैस के गोले छोड़े गए। कुछ क्षणों के लिए नारे थम गए। सिर्फ़ खांसी की आवाज़ें थीं, अगले गोले की सीटी थी और छात्र एक-दूसरे की आंखों में पानी डाल रहे थे। भीड़ धुएं में बिखर गई। लेकिन कुछ ही मिनटों बाद फिर उसी तरह जुड़ गई। किसी ने नया नारा लगाया। सैकड़ों आवाज़ें उसके पीछे उठ खड़ी हुईं। सोमवार को पूरे दिन संसद भवन का इलाका एक ऐसे युवा प्रतिरोध से गूंजा जिसे अनसुना करना असंभव था।
दिलचस्प बात यह थी कि सोमवार को युवाओं की आवाज़ साफ बदली हुई थी। शुरुआत में मांग केवल केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे तक थी। लेकिन जैसे-जैसे भीड़ बढ़ी, नारों का निशाना सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक पहुंचा। यह वही पीढ़ी है जिसे अक्सर देश का “डेमोग्राफिक डिविडेंड” कहा जाता है। सोमवार को उसी पीढ़ी का एक हिस्सा सत्ता से सीधे जवाब मांगता दिखाई दिया।
पोस्टरों ने भी उस दिन का माहौल बयान किया। एक तख्ती पर लिखा था—“No one paid me, I hate this corrupt government for free.” लेकिन जिस पोस्टर ने पूरे आंदोलन की भावना को सबसे सटीक शब्द दिए, उस पर लिखा था—“We speak up because we love our country.”
दिन भर पुलिस की लाठी अलग-अलग जगह चली। आंसू गैस छोड़ी गई, हिरासत का डर बना, बारिश भी रुक-रुककर होती रही। लेकिन इन सबके बावजूद युवाओं का जोश न पस्त हुआ, न घटा। कई छात्र ऐसे मिले जिन्होंने घर पर बताए बिना दिल्ली आने का फैसला किया था, क्योंकि उन्हें पता था कि माता-पिता डर जाएंगे। वहीं कई ऐसे भी मिले, जिनके माता-पिता ने खुद उन्हें आने के लिए प्रोत्साहित किया था। उनका मानना था कि यदि भविष्य बेहतर बनाना है तो बदलाव की मांग उठनी ही चाहिए।
जब मैं वहां से लौटी, तब तक जंतर-मंतर की भीड़ कम नहीं हुई थी। वह बस छोटे-छोटे समूहों में बंट गई थी। लौटते हुए मेरे मन में बार-बार रागिनी के घायल हाथ लौट रहे थे। हिमांशी की जलती आंखें लौट रही थीं। जयपुर से रातभर सफ़र करके आए वे दोस्त याद आ रहे थे। और फिर अनायास ही दिल्ली की वही दूसरी पीढ़ी याद आई, जिसने निर्भया आंदोलन के दौरान सड़कों को भर दिया था और सिर्फ़ सरकार ही नहीं, पूरे देश को आईना देखने पर मजबूर किया था।
सोमवार को जो अलग चीज़ दिखी, वह गुस्से से भी बड़ी थी—उम्मीद। भीड़ में मौजूद लगभग हर युवा को विश्वास था कि उसकी आवाज़ बेअसर नहीं जाएगी। सवाल है, यह सोच और जज़्बा क्या आगे भी बना रहेगा? क्या यह आंदोलन लंबा चलेगा? इसका उत्तर अभी किसी के पास नहीं है। लेकिन इतना तय है कि जिस तरह हजारों छात्रों और युवाओं ने सोमवार को लुटियंस दिल्ली, संसद भवन और प्रधानमंत्री के सुरक्षा घेरे तक को चुनौती दी, वह सरकार और पूरे राजनीतिक तंत्र को सोचने पर तो मजबूर करेगा।
यह कहना अभी जल्दबाज़ी होगी कि यह किसी बड़े मोड़ का संकेत है। वैसा ही जैसे मंडल आयोग के बाद दिल्ली में नौजवानों के आत्मदाह ने वी.पी. सिंह सरकार की दिशा बदली थी या निर्भया और अन्ना आंदोलन ने मनमोहन सरकार की दशा तय कर दी थी। लेकिन सोमवार को यह साफ दिखा कि युवाओं (और खासकर लड़कियों) के जनसैलाब की छाप सोशल मीडिया के जरिए देश के हर नौजवान तक पहुंच चुका होगा। सोमवार की दिल्ली ने कम से कम इतना तो साबित किया है कि भारत की जेनरेशन-ज़ेड को राजनीति से उदासीन मान लेने, उसे दबा देने, भक्त बना देने या डरा देने का समय बीत चुका है।
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