ईरान को नया सर्वोच्च नेता मिल गया है। हाल ही में मारे गए अयातुल्ला अली खामेनेई के बेटे मोज़तबा खामेनेई इस इस्लामी गणराज्य की सबसे ऊँची कुर्सी पर बैठे हैं। यह उस अनुमान के ठीक उलट है जो इज़राइल और अमेरिका के रणनीतिक हलकों में था। वहाँ यह विश्वास था कि अगर ईरान की व्यवस्था के सबसे शक्तिशाली व्यक्ति को हटा दे तो देश की पूरी राजनीतिक संरचना हिलने लगेगी। लेकिन अभी तक जो दिखाई दे रहा है वह यह कि ईरान ने व्यक्ति. नेता खोया है पर व्यवस्था नहीं।
क्रांतिकारी व्यवस्थाओं की एक खास प्रवृत्ति होती है। वे व्यक्तियों पर आधारित दिखाई देती हैं, लेकिन संकट के समय उनकी असली शक्ति संस्थाओं से आती है। ईरान में भी यही हुआ है। अली खामेनेई की हत्या ने एक क्षण के लिए ऐसा लगा कि इस्लामी गणराज्य की राजनीतिक संरचना टूट सकती है। लेकिन बहुत जल्दी उत्तराधिकार की प्रक्रिया पूरी कर दी गई और मोज़तबा खामेनेई को सर्वोच्च नेता बना दिया गया।
इस निर्णय ने एक स्पष्ट संदेश दिया—ईरान में व्यवस्था जारी रहेगी।
लेकिन यह भी उतना ही स्पष्ट है कि इस युद्ध के बाद ईरान की व्यवस्था पहले जैसी नहीं रहेगी। अली खामेनेई दशकों तक उस केंद्र के रूप में मौजूद थे जो धार्मिक प्रतिष्ठान, राजनीतिक नेतृत्व और सैन्य शक्ति के बीच अंतिम संतुलन बनाए रखता था। उनके शब्द कई बार अंतिम निर्णय की तरह काम करते थे। उनकी अनुपस्थिति में सत्ता का वह संतुलन स्वाभाविक रूप से बदलने लगा है।
यहीं से इस कहानी का असली अर्थ सामने आता है।
ईरान की राजनीतिक संरचना केवल सर्वोच्च नेता पर नहीं टिकी है। उसके नीचे धार्मिक संस्थाओं का एक जटिल ढाँचा है, एक विस्तृत सुरक्षा तंत्र है और सबसे महत्वपूर्ण इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स है। यही वह संस्था है जिसने पिछले चार दशकों में धीरे-धीरे राज्य के भीतर असाधारण शक्ति अर्जित की है।
IRGC केवल सेना नहीं है। वह खुफिया नेटवर्क भी है, आर्थिक शक्ति भी और राजनीतिक प्रभाव भी। ईरान की कई बड़ी औद्योगिक परियोजनाएँ, ऊर्जा क्षेत्र और क्षेत्रीय सैन्य नेटवर्क इस संस्था से जुड़े हुए हैं। इस कारण जब भी ईरान संकट में होता है, सत्ता का झुकाव स्वाभाविक रूप से उसी दिशा में जाता है।
अली खामेनेई की हत्या के बाद वही प्रक्रिया तेज होती दिखाई दे रही है।
मोज़तबा खामेनेई का उभार इस परिवर्तन का प्रतीक भी हो सकता है। अपने पिता के विपरीत उनकी धार्मिक प्रतिष्ठा या राजनीतिक अनुभव उतना गहरा नहीं माना जाता। लंबे समय से उन्हें इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स का पसंदीदा उम्मीदवार बताया जाता रहा है। उनकी नियुक्ति के तुरंत बाद पुराना वीडियो प्रसारित हुआ जिसमें वे किशोर उम्र में ईरान-इराक युद्ध के मोर्चे पर दिखाई देते हैं। यह केवल स्मृति नहीं थी, बल्कि क्रांतिकारी वैधता का एक संदेश भी था।
इससे यह संकेत मिला कि नई व्यवस्था में प्रतीकात्मक नेतृत्व और वास्तविक शक्ति के बीच दूरी बढ़ सकती है।
अयातुल्ला खामेनेई की मौत के बाद के शुरुआती दिनों में इस बदलाव के संकेत भी दिखाई दिए। कुछ समय के लिए ऐसा लगा कि ईरान की सत्ता राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियन, धार्मिक प्रतिष्ठान और सैन्य नेतृत्व के बीच एक अस्थिर संतुलन में चल रही है। राष्ट्रपति ने खाड़ी देशों के प्रति अपेक्षाकृत नरम संकेत भी दिए। उन्होंने क्षेत्रीय हमलों पर खेद जताया और यह संकेत दिया कि यदि खाड़ी देश अपनी जमीन का इस्तेमाल ईरान के खिलाफ हमलों के लिए नहीं होने देंगे तो तनाव कम हो सकता है।
लेकिन यह स्थिति अधिक देर तक नहीं रही।
सैन्य नेतृत्व की प्रतिक्रिया तुरंत सामने आ गई। ईरानी सैन्य कमांडरों ने स्पष्ट कहा कि खाड़ी क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य अड्डे अभी भी वैध लक्ष्य हैं। उनके अनुसार यह संघर्ष केवल क्षेत्रीय तनाव नहीं बल्कि अस्तित्व की लड़ाई है। इस प्रतिक्रिया ने यह स्पष्ट कर दिया कि युद्ध के समय ईरान की सत्ता का असली केंद्र कहाँ है।
युद्ध अक्सर यही करते हैं। वे उन संस्थाओं को मजबूत बना देते हैं जो युद्ध लड़ती हैं। ईरान में वह संस्था रिवोल्यूशनरी गार्ड्स हैं।
समय के साथ यह संगठन केवल सैन्य बल नहीं रहा। उसने ईरान की अर्थव्यवस्था के कई हिस्सों में प्रभाव स्थापित किया है और क्षेत्रीय राजनीति में भी निर्णायक भूमिका निभाई है। लेबनान से लेकर इराक और सीरिया तक उसके नेटवर्क मौजूद हैं। यही कारण है कि अली खामेनेई की मौत के बाद की अनिश्चितता में भी राज्य की संरचना नहीं टूटी।
एक सप्ताह पहले जब युद्ध शुरू हुआ और ईरान के सर्वोच्च नेता मारे गए, तब पूरे क्षेत्र में सबसे बड़ा सवाल यह था कि क्या इस्लामी गणराज्य इस झटके को सह पाएगा। अब दूसरे सप्ताह की शुरुआत में उत्तर कुछ हद तक साफ दिखाई देता है। व्यवस्था टूटने के बजाय पुनर्गठित हो रही है।
इस दृष्टि से मोज़तबा खामेनेई का उत्तराधिकार इस युद्ध का अंत नहीं बल्कि उसका अगला चरण हो सकता है।
यदि वे लंबे समय तक सत्ता में बने रहते हैं तो उन्हें केवल अपने पिता की राजनीतिक विरासत ही नहीं मिलेगी, बल्कि उस युद्ध की स्मृति भी मिलेगी जिसने उनके पिता की जान ली और राज्य को अस्तित्व के संकट में डाल दिया।
और उनके पीछे वह संस्था खड़ी होगी जिसने इस संकट के क्षण में व्यवस्था को संभाला है—रिवोल्यूशनरी गार्ड्स।
यह संगठन स्वयं को केवल सैनिकों का समूह नहीं बल्कि इस्लामी गणराज्य का संरक्षक मानता है। उसका लक्ष्य केवल सीमाओं की रक्षा करना नहीं बल्कि क्रांतिकारी राज्य को टिकाए रखना और क्षेत्र में उसका प्रभाव बढ़ाना भी है। इसलिए ऐसा सर्वोच्च नेता जो इस दृष्टि से सहमत हो, उनके लिए स्वाभाविक विकल्प है।
यही कारण है कि आने वाले समय में मोज़तबा खामेनेई की सुरक्षा केवल राजनीतिक सवाल नहीं बल्कि रणनीतिक आवश्यकता भी बन सकती है।
ईरान के खिलाफ जो युद्ध उसकी शक्ति को तोड़ने के लिए शुरू हुआ था, वह शायद उल्टा असर पैदा कर सकता है। इतिहास में अक्सर ऐसा हुआ है कि बाहरी हमला किसी व्यवस्था को कमजोर करने के बजाय उसे और सख्त बना देता है। अली खामेनेई की हत्या ने ईरान को झटका जरूर दिया, लेकिन उसने इस्लामी गणराज्य को टूटने नहीं दिया। इसके बजाय सत्ता उस संस्था के हाथों में और सिमटती दिखाई दे रही है जो युद्ध लड़ सकती है—रिवोल्यूशनरी गार्ड्स। अगर यह रुझान आगे बढ़ता है तो ईरान का भविष्य किसी धार्मिक नेतृत्व वाले क्रांतिकारी राज्य से कम और एक सुरक्षा-प्रधान व्यवस्था के रूप में अधिक दिखाई देगा। यानी जिस युद्ध से ईरान को कमजोर करने की उम्मीद थी, वही अंततः उस ताकत को और मजबूत कर सकता है जो इस व्यवस्था की असली रीढ़ है।


