nayaindia Taiwan ताईवानी लोगों का चीन को ठेंगा!
श्रुति व्यास

ताईवानी लोगों का चीन को ठेंगा!

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विलियम लाई चिंग-टी ताईवान के नए राष्ट्रपति चुने गए हैं। चीन से ताईवान की आजादी की पक्षधर उनकी डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी (डीपीपी) ने तीसरी बार जीत हासिल की है। जहां एक ओर ताईवान खुशी में झूम रहा है जश्न मना रहा है, वहीं चीन में शी जिन पिंग शायद लाल-पीले हो रहे होंगे, गुस्से से उबल रहे होंगे।

आखिकार, ताईवान का अपनी मातृभूमि का हिस्सा बनाना शी जिनपिंग का पुराना सपना है। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ताइवान को अपने देश का पवित्र, खोया हुआ इलाका मानती है। कुछ सप्ताह पहले शी ने ताइवान के चीन में विलय को ‘ऐतिहासिक अवश्यंभाविता’ बताया था।लेकिन डीपीपी और लाई चिंग-टी की वापसी से यह ‘अवश्यंभाविता’ हवा-हवाई नजर आ रही है। यह एक निर्णायक चुनाव था जिसमें ताईवानी मतदाताओं ने जाहिर तौर पर चीन की उस धमकी को नजरअंदाज कर दिया जिसमें डीपीपी को पृथकतावादी बताया गया था। चीन ने कहा था कि डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी को वोट देने का मतलब है युद्ध के लिए वोट देना। जनता ने अपनी राय जाहिर कर दी है।

शनिवार को करीब 70 फ़ीसदी मतदाताओं ने वोट दिया। ताईवान के ज्यादातर लोग न तो स्वतंत्रता के पक्षधर हैं ना ही तुरंत एकीकरण के, बल्कि वे यथास्थिति अर्थात व्यावहारिक तौर पर ताईवान को आज़ाद बनाए रखना चाहते हैं। लाई चिंग-टी ने 40 प्रतिशत वोटों के साथ जीत हासिल की है। उन्होंने ताईवान की संप्रभुता से समझौता किए बिना चीन की राह रोकने की अपनी पार्टी की नीति जारी रखने का वायदा किया है। चुनाव जीतने के बाद जनता को संबोधित करते हुए उन्होंने जनमत की सराहना करते हुए कहा, “ताईवान दुनिया को यह संदेश दे रहा है कि लोकतंत्र और अधिनायकवाद में से हम लोकतंत्र के पक्षधर हैं”।उन्होंने अपने भाषण में यह वायदा भी किया कि वे चीन की जुबानी और सैन्य धमकियों से ताईवान की रक्षा करेंगे।

डीपीपी की जीत से दोनों महाशक्तियों – चीन और अमरीका – की बढ़ती प्रतिद्वंद्विता के और जोर पकड़ने की संभावना है – और यह अगले चार सालों तक तीखी होगी।

हालांकि इस जीत पर चीन की पूरी प्रतिक्रिया आने वाले महीनों में सामने आएगी मगर फिलहाल, नतीजे आने के तुरंत बाद, चीन ने एक चेतावनी भरा वक्तव्य जारी किया है। ताईवानी मामलों के उसके ऑफिस ने कहा कि इस चुनाव से इन दोनों देशों के संबंधों की दिशा में बदलाव नहीं होगा। मतलब यह कि अस्थिरता और तनाव का दौर जारी रहेगा और यह भी लगभग निश्चित है कि वह और गंभीर स्वरुप लेगा।

चुनाव प्रचार के दौरान चीनी अधिकारियों ने वक्तव्यों और सरकारी प्रकाशनों के सम्पादकीय लेखों में लाई चिंग-टी को खलनायक बताया, उन्हें “ताईवान की आजादी का अड़ियल पैरोकार” “ताईवान स्ट्रेट के दोनों ओर अमन-चैन नष्ट करने वाला” और “एक घातक युद्ध का संभावित रचयिता” आदि बताया। ताईवान की स्वतंत्रता के बारे में लाई चिंग-टी के विचार अपने पूर्ववर्ती की तुलना में अधिक स्पष्ट हैं और वे उन्हें बिना लागलपेट के व्यक्त करते रहे हैं। चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने संकल्प व्यक्त किया था कि वे आधुनिकीकरण की राह पर चलते रहेंगे और एकाएक ताईवान को स्वतंत्र घोषित करने जैसा कोई कदम नहीं उठाएंगे (हालांकि अब डीपीपी के नेता कह रहे हैं कि ताईवान पहले से ही स्वतंत्र है इसलिए इसकी घोषणा करने की कोई जरूरत नहीं है!)।

उनके  साथी और उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार सियाओ बी-किम, जो अमेरिका में ताईवान के प्रतिनिधि रहे हैं और अब उपराष्ट्रपति निर्वाचित हो गए हैं, उन्हें भी वाशिंगटन में ताईवान की स्वतंत्रता का एक दृढ़ किंतु चौकन्ना रक्षक माना जाता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि डीपीपी का दुबारा सत्ता में आना अमेरिका के लिए कई दृष्टियों से फायदेमंद है। एक तो 2.30 करोड़ की जनसंख्या और सारी दुनिया को माईक्रोप्रोसेसर का सप्लायर होने के कारण ताईवान, वाशिंगटन के लिए वैश्विक स्थिरता की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। और दूसरे चीन से मुकाबले में उलझे अमेरिका के लिए ताईवान में ‘लोकतंत्र की जीत’ एक दृष्टि से उसकी भी जीत है और कई मायनों में चीन की हार है।

लेकिन यह सब निश्चित ही शी जिन पिंग को पसंद नहीं आ रहा होगा। दुनियाभर के जानकारों ने इन दोनों के बीच बढ़ती प्रतिद्वंद्विता और इसके एक युद्ध की कगार तक पहुंचने के खतरे को लेकर चिंता जाहिर की है। बीजिंग ने यह साफ कर दिया है कि वह वाशिंगटन से ताईवान पर दबाव डालने और उसे दिए जाने वाले सैन्य समर्थन में कमी लाने की मांग करता रहेगा। वैसे भी, अमरीका और चीन के कूटनीतिक संबंधों में एक-दूसरे को चेताते हुए संदेशों की भरमार है।

इस बीच आने वाले दिनों में चीन, ताईवान की राजनीति में दुष्प्रचार, धमकियों और आर्थिक प्रोत्साहनों के जरिए हस्तक्षेप करने का प्रयास करता रहेगा। चीनी अधिकारियों ने यह संकेत भी दिया है कि वे टैरिफ संबंधी रियायतों में कमी करके ताईवान के व्यापार को प्रभावित करने का कदम भी उठा सकते हैं। चीनी लड़ाकू विमान, ड्रोन और जहाज लगभग प्रतिदिन ताईवान की सीमा का उल्लंघन करते रहते हैं और आगे यह और बढेगा, ऐसी सम्भावना है।

चीन चाहता है कि ताईवानी डीपीपी को चुनने के लिए पछताएं। लेकिन ज्यादा बड़ी प्रतिक्रिया तो 20 मई को ही आ सकती है जब नई सरकार सत्ता संभालेगी। लाई चिंग-टी चुनाव प्रचार के दौरान ही यह कहकर विवाद पैदा चुके हैं कि उन्हें उम्मीद है कि एक दिन ताईवान का राष्ट्रपति व्हाईट हाऊस में प्रवेश करता नजर आएगा। अमेरिकी अधिकारी इस बात को लेकर भी चिंतित होंगे कि टी कार्यभार सम्हालने के बाद अपने पहले भाषण में ऐसी कोई बात न कह दें, जो लीक और अपेक्षा से अलग हो। मगर फिलहाल तो ताईवान अपनी इच्छा पूरी होने से आनंदित है, जश्न मना रहा है, और डर को अपने से दूर खदेड़ चुका है। र इसमें भी कोई शक नहीं कि शक्तिशाली ड्रेगन को चुनौती देने के लिए ताईवान तालियों और तारीफ का हकदार है। (कॉपी: अमरीश हरदेनिया)

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By श्रुति व्यास

संवाददाता/स्तंभकार/ संपादक नया इंडिया में संवाददता और स्तंभकार। प्रबंध संपादक- www.nayaindia.com राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय राजनीति के समसामयिक विषयों पर रिपोर्टिंग और कॉलम लेखन। स्कॉटलेंड की सेंट एंड्रियूज विश्वविधालय में इंटरनेशनल रिलेशन व मेनेजमेंट के अध्ययन के साथ बीबीसी, दिल्ली आदि में वर्क अनुभव ले पत्रकारिता और भारत की राजनीति की राजनीति में दिलचस्पी से समसामयिक विषयों पर लिखना शुरू किया। लोकसभा तथा विधानसभा चुनावों की ग्राउंड रिपोर्टिंग, यूट्यूब तथा सोशल मीडिया के साथ अंग्रेजी वेबसाइट दिप्रिंट, रिडिफ आदि में लेखन योगदान। लिखने का पसंदीदा विषय लोकसभा-विधानसभा चुनावों को कवर करते हुए लोगों के मूड़, उनमें चरचे-चरखे और जमीनी हकीकत को समझना-बूझना।

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