सवाल है कोई पार्टी यदि सत्ता में बैठकर भी विपक्ष की तरह लड़ती रहे और विपक्ष में पहुँचकर भी कोई पार्टी खुद को सत्ताधारी समझती रहे तो लोकतंत्र का क्या होगा? पिछले बारह वर्षों की भारतीय राजनीति का यह अजीब किस्सा है। भाजपा सरकार चलाते हुए भी कांग्रेस से ऐसे लड़ती रही मानो देश अभी उसी के कब्जे में हो। कांग्रेस विपक्ष में बैठी रही, लेकिन इस भाव से उबर नहीं पाई कि सत्ता तो उसी की है, बस किसी ने छीन ली है। एक उस सरकार से लड़ती रही जो जा चुकी थी। दूसरी यह मानने को तैयार नहीं हुई कि उसकी सरकार जा चुकी है।
सो बार-बार चुनाव हुए। पूरी ताकत से हुए। टेलीविजन पर घमासान लगातार रहा। आरोप लगे, जवाब आए। लेकिन देश की राजनीतिक बहस कितनी आगे बढ़ी? सरकार के पास अपनी कमियों के लिए कांग्रेस थी। कांग्रेस के पास अपनी दुर्दशा के लिए भाजपा। दोनों को एक-दूसरे की जरूरत थी। दोनों इस इंतजाम में सहज भी हो गए।
मैं हाल में कश्मीर और लद्दाख की यात्रा में बार-बार यही बात सोचती हुई थी। दिल्ली से दूर थी। उसके रोज के राजनीतिक शोर से भी। सोचा था, कुछ दिन उससे छुट्टी मिलेगी। लेकिन वहाँ लोगों की बातचीत में राजनीति को लेकर ऐसी उत्सुकता मिली जो दिल्ली में लंबे समय से महसूस नहीं हुई थी। लोग सवाल पूछ रहे थे। केवल नाराजगी में नहीं। जानने की इच्छा से। इस संभावना के उत्साह में कि आगे कुछ बदल भी सकता है।
और चर्चा कश्मीर की नहीं, दिल्ली की थी।
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का क्या होगा? सीजेपी में कितना दम है? उसका आंदोलन क्या सचमुच सत्ता प्रतिष्ठान को परेशान कर सकता है? जेन ज़ी का विरोध कुछ दिनों का उबाल है या नौजवानों के भीतर कुछ ज्यादा गहरा पक रहा है? और इन सबके बीच घूमता वह सवाल—क्या भाजपा वाकई उतनी अजेय है जितनी दिखाई देती है?
सवालों से अधिक मुझे उन्हें पूछने की सहजता ने चौंकाया। ऐसा नहीं कि सब भाजपा के खिलाफ थे। या सबकी उम्मीद कांग्रेस से थी। किसी को शक था, किसी को उम्मीद। कुछ को शायद इसी संभावना में मजा आ रहा था कि राजनीति का अगला पन्ना अभी लिखा नहीं गया है।
आखिर लंबे समय बाद बातचीत में कुछ ऐसा था जिसका जवाब पहले से तय नहीं था।
वर्षों से दिल्ली कश्मीर की चर्चा करती आई है। कश्मीर एक समस्या है। उसे समझना है, संभालना है, उसका समाधान करना है। और अब कश्मीर में बैठी मैं सुन रही थी कि लोग दिल्ली को समझने की कोशिश कर रहे हैं। वहाँ क्या चल रहा है? आगे क्या होगा? किसकी कितनी ताकत है? मानो इस बार पहेली दिल्ली हो गई हो।
इसे भारतीयों का राजनीतिक गपशप का पुराना शौक मान सकते हैं। लेकिन क्या बात इतनी ही है? कहीं ऐसा तो नहीं कि हम राजनीति के तयशुदा नतीजों के इतने आदी हो गए हैं कि अनिश्चितता की थोड़ी-सी गुंजाइश भी उत्साह पैदा करने लगी है? जब रोज बताया जाए कि कौन जीतेगा, कौन हार चुका है और किसका कोई भविष्य नहीं है, तब इस धारणा में छोटी-सी दरार भी देखने लायक हो जाती है।
फिर चर्चा के लिए सामग्री भी खूब है।
एलन मस्क के हवाले से एक सवाल चला कि क्या भारत के असली बॉस मुकेश अंबानी हैं? न कोई प्रमाण, न इससे कोई निष्कर्ष निकाला जा सकता है। लेकिन ऐसे सवाल का चल पड़ना और उसमें लोगों की दिलचस्पी भी कुछ बताती है। लोग पैसे और सत्ता के रिश्ते पर बात करना चाहते हैं। किसकी कहाँ तक पहुँच है? सरकार के फैसलों में किसका कितना असर है? सार्वजनिक सत्ता और निजी संपत्ति के बीच की दूरी आखिर बची कितनी है?
फिर सोनिया गांधी की आने वाली आत्मकथा ‘बिलॉन्गिंग: ए जर्नी ऑफ लव’ की चर्चा है। सोचें, एक व्यक्ति का जीवन कितने वर्षों तक भाजपा की राजनीति की सामग्री बना रहा। इटली में जन्मी महिला। भारत के सबसे ताकतवर राजनीतिक परिवार में विवाह। फिर कांग्रेस की अध्यक्षता। प्रधानमंत्री पद स्वीकार नहीं करना। बावजूद इसके पार्टी और सरकार में प्रभाव बनाए रखना। उनके विदेशी मूल पर कितने चुनाव लड़े गए, कितने भाषण हुए!
अब वे अपनी कहानी खुद सुनाने वाली हैं।
मेरी उत्सुकता केवल यह नहीं है कि वे क्या बताएँगी। यह भी है कि देश फिर उसी पुरानी बहस में लौटेगा या उनके जीवन को कुछ अलग ढंग से पढ़ पाएगा? कांग्रेस अपने अतीत से बाहर नहीं निकल पाई। भाजपा ने भी उसे बाहर निकलने देने में दिलचस्पी नहीं दिखाई। गांधी परिवार कांग्रेस के लिए विरासत रहा तो भाजपा के लिए निशाना। दोनों के लिए अतीत काम का रहा।
उधर फारूक अब्दुल्ला हैं। उन्होंने फिर कुछ ऐसा कह दिया जिससे दिल्ली में नाराजगी का परिचित दौर शुरू हो जाए। बारामूला में पाकिस्तान पर उनकी टिप्पणी आई और अपेक्षित प्रतिक्रियाएँ भी आ गईं। मैं सोच रही थी, क्या उमर अब्दुल्ला की सरकार के दौरान अपेक्षाकृत शांति से पुराने योद्धा ऊबने लगे हैं? या दिल्ली को याद दिलाना चाहते हैं कि वे अभी हैं। केवल सम्मानित बुजुर्ग बनकर बैठ जाने का उनका इरादा नहीं है।
लेकिन यहाँ भी फर्क देखिए। फारूक अब्दुल्ला पाकिस्तान को चर्चा में वापस ला रहे थे। और जिन कश्मीरियों से मेरी बात हो रही थी, वे भारत की अंदरूनी राजनीति में ज्यादा दिलचस्पी ले रहे थे। उन्हें दिल्ली की सत्ता के भीतर और उसके सामने बनती चुनौतियाँ जाननी थीं।
इसी बीच सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश संजय किशन कौल की आने वाली आत्मकथा ‘विदाउट फियर ऑर फेवर’ की चर्चा है। न्यायिक मतभेदों की यादें। संस्थाओं के भीतर काम करने के अनुभव। सत्ता और अधिकार के उन गलियारों का विवरण जिन्हें बाहर बैठा नागरिक पूरी तरह देख नहीं पाता। न्यायाधीशों से कहा जाता है कि उनके फैसले बोलने चाहिए। वे अपने संस्मरणों में बोलें तो लोग यह भी जानना चाहेंगे कि फैसलों के पीछे का अनुभव क्या था।
ऊपर से देखें तो इन बातों का आपस में संबंध नहीं है। एक अरबपति की कथित टिप्पणी। एक राजनीतिक परिवार की कहानी। एक पुराने नेता का विवाद। एक पूर्व न्यायाधीश की यादें। लेकिन मुझे इनमें एक बात साझा लगी। इन्हें चर्चा का विषय बनने के लिए भाजपा और कांग्रेस की बहुत कम जरूरत पड़ रही है। लोगों की अपनी उत्सुकता है। वे जानना चाहते हैं कि जो बताया जा रहा है, उसके पीछे क्या है? ताकत वास्तव में कहाँ है? और जो आज स्थायी दिखाई देता है, वह कितना स्थायी है?
शायद राजनीति के जरूरत से ज्यादा अनुमान योग्य हो जाने पर ऐसा होता है। लोग उसमें कुछ अनसोचा तलाशने लगते हैं। कोई संभावना, जिस पर अभी पार्टियों की मुहर न लगी हो।
भाजपा की पिछले वर्षों की बड़ी ताकत यही रही कि देश किस बात पर बहस करेगा, यह वह तय करती थी। कांग्रेस विरोध भी करती थी तो प्रायः उसी के चुने विषयों पर। इतिहास हो, राष्ट्रवाद हो, गांधी परिवार हो या असहमत व्यक्ति की देशभक्ति—सवाल भाजपा बनाती थी। कांग्रेस उत्तर देने में जुट जाती थी। वह सफाई देती थी, प्रतिवाद करती थी और अगले सवाल का इंतजार करती थी।
चुनावी लिहाज से भाजपा को इसका खूब लाभ मिला। लेकिन क्या आज भी लोगों की राजनीतिक जिज्ञासा उसी घेरे में बँधी हुई है? क्या वे अब भी वही सुनना चाहते हैं जो उन्हें वर्षों से सुनाया जा रहा है?
इससे कांग्रेस अपने आप प्रासंगिक नहीं हो जाती। उसकी अपनी परीक्षा है। मतदाता सूचियों और चुनाव आयोग पर आरोपों को लेकर एक नवंबर को रामलीला मैदान में उसकी प्रस्तावित रैली को ही लें। यही वह मैदान है जहाँ कभी कांग्रेस सरकार के खिलाफ गुस्सा जमा हुआ था। तब उससे जवाब माँगा जा रहा था। अब वह चाहती है कि लोग उसके साथ खड़े होकर सरकार से जवाब माँगें।
लेकिन मैदान भर जाने से आंदोलन नहीं बनता। और आंदोलन से जनादेश तक का रास्ता तो और लंबा है।
कांग्रेस को समझना होगा कि भाजपा से नाराज हर व्यक्ति राहुल गांधी का समर्थक नहीं है। सरकार के खिलाफ उठी हर आवाज उसकी वापसी की पुकार नहीं है। जनता का गुस्सा किसी पार्टी की जमा पूँजी नहीं होता कि जरूरत पड़ी और निकाल लिया। उसे सुनना पड़ता है। उसका भरोसा कमाना पड़ता है। अपने आचरण से बताना पड़ता है कि सत्ता मिलने पर उसके सवालों का क्या होगा।
जो पार्टी अब भी कभी-कभी ऐसे व्यवहार करती है मानो अपनी सत्ता कहीं रखकर भूल गई हो, उसके लिए यह आसान सबक नहीं है।
लेकिन मेरी ज्यादा उत्सुकता भाजपा को लेकर है। सवाल पूछने की इस भूख का वह क्या करेगी?
लोगों को बोलने क्यों नहीं दिया जाए? प्रदर्शनकारी प्रदर्शन करें। कांग्रेस नारे लगाए। मीम बनें। नौजवान अपनी भाषा में अपनी नाराजगी कहें। बारह वर्षों से देश चला रही पार्टी, इतने बड़े संगठन और इतनी चुनावी सफलताओं के बाद भी हर नई आवाज से परेशान क्यों हो? भीड़ में कोई नया चेहरा दिखे तो उसे तत्काल खतरा क्यों मान लिया जाए?
आखिर इतनी ताकत किस काम की, यदि आलोचना सुनने का धीरज भी न दे?
उलटे हर सवाल के पीछे विरोधी तलाशने की आदत बनी हुई है। किसने उकसाया? कौन पीछे है? किसका एजेंडा है? मानो नागरिक अपने अनुभव से नाराज हो ही नहीं सकता। उसे किसी न किसी ने भेजा होगा। इतनी शक्तिशाली सरकार का लगभग हर आलोचना का जवाब देना जरूरी समझना अपने आप में विचारने की बात है। कुछ सवालों को सुनकर भी छोड़ा जा सकता है। कुछ नाराजगियों को अपनी जगह रहने दिया जा सकता है।
भाजपा ने कभी कांग्रेस सरकार को ऐसा बना दिया था कि वह अपनी ही सत्ता में अपने भविष्य से डरी हुई लगने लगी थी। उसे ध्यान रखना चाहिए कि कहीं वही बेचैनी अब उसके अपने व्यवहार में न उतर आए।
और उन लोगों पर भी ध्यान देना चाहिए जो अपना राजनीतिक मंच खुद खड़ा कर रहे हैं। नेहा बोरा और अभिजीत दीपके जैसे चेहरे कुछ समय बाद ओझल हो सकते हैं। आगे अपने दम पर नेता भी बन सकते हैं। अभी कौन जानता है? लेकिन उनकी उपस्थिति को केवल इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता कि वे किसी स्थापित पार्टी के नेता नहीं हैं।
राजनीति में खाली जगह पड़ी नहीं रहती। पार्टियाँ उसे न पहचानें तो कोई और उसमें खड़ा हो जाता है। और सरकार से सवाल पूछने वाले हर व्यक्ति की मंजिल कांग्रेस नहीं होती।
इसीलिए मुझे आज की अनिश्चितता दिलचस्प लगती है। इसमें 2029 की कोई भविष्यवाणी तलाशना जल्दबाजी होगी। लेकिन यह देखना जरूरी है कि लोग क्या पूछ रहे हैं। किन जवाबों से उनका मन भर गया है। किन संभावनाओं पर वे अब अपने ढंग से बात करने लगे हैं।
मैं छुट्टी पर गई थी। कुछ शांति मिलेगी, ऐसा सोचा था। वहाँ दिल्ली की राजनीति पर लोगों की अटकलें सुनती रही। लेकिन इस बातचीत में दिल्ली के रोज के शोर से अलग एक उत्साह था। लोग केवल सुनी हुई बात दोहरा नहीं रहे थे। अपनी तरफ से पूछ रहे थे—अच्छा, अब आगे क्या?
हो सकता है यह हमारे राजनीतिक गपशप के पुराने शौक का ही एक और दौर हो। हो सकता है, भीतर कुछ हलचल भी हो। अभी इसका दावा नहीं करूँगी।
लेकिन लौटते हुए एक सवाल साथ आया। बारह वर्ष सत्ता वाले विपक्ष की तरह लड़ते रहे। विपक्ष वाले सत्ता से बेदखल शासकों की तरह इंतजार करते रहे। इस बीच लोगों के अपने सवाल जमा होते गए। अब यदि वे खुद तय करने लगें कि देश में किस बात पर बहस होनी चाहिए, तो दोनों पार्टियाँ क्या करेंगी?
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