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नीतीश के कारण बनी अनोखी स्थिति

बिहार में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के विधान परिषद से इस्तीफा देने के बाद एक अनोखी स्थिति बन गई है, जिसके बारे में जनता दल यू के नेता और कानून व संविधान के जानकार भी सिर्फ इतना कह पा रहे हैं कि संविधान बनाने वालों ने कभी ऐसी स्थिति के बारे में नहीं सोचा होगा। हालांकि कुछ लोग इसे संवैधानिक संकट मान रहे हैं लेकिन ज्यादातर लोगों का कहना है कि संवैधानिक संकट नहीं है, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 164 की व्याख्या का मामला है। संविधान के अनुच्छेद 164 में मंत्रियों की नियुक्ति के प्रावधान किए गए हैं। यह बहुत दिलचस्प है कि नीतीश कुमार के प्रकरण के कारण बिहार के लोगों को संविधान के अनुच्छेद 101 और 164 पर चर्चा करने का मौका मिला है। अनुच्छेद 101 की भी पहले खूब व्याख्या हुई। इसमें किसी व्यक्ति के दो सदनों का सदस्य निर्वाचित होने के बाद किसी एक सदन से इस्तीफा देने के नियम हैं। कई दिनों तक इस पर चर्चा होती रही थी कि राज्यसभा का सदस्य चुने जाने के 14 दिन के भीतर नीतीश कुमार विधान परिषद से इस्तीफा देंगे या राजपत्र में अधिसूचना जारी होने के 14 दिन बाद देंगे या नौ अप्रैल को राज्यसभा सीट खाली होने के बाद वे शपथ लेंगे और उसके 14 दिन बाद इस्तीफा देंगे। खैर, वह बात तो तय हो गई कि चुने जाने के 14 दिन के भीतर इस्तीफा देना होता है। सो, उन्होंने विधान परिषद से इस्तीफा दे दिया।

अब सवाल अनुच्छेद 164 को लेकर उठ रहा है कि क्या विधान परिषद से इस्तीफा देने के बाद नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने रह सकते हैं? हर व्यक्ति इस बात का हवाला दे रहा है कि अनुच्छेद 164 के मुताबिक बिना किसी सदन के सदस्य रहे नीतीश कुमार छह महीने तक मुख्यमंत्री रह सकते हैं। इसलिए इसमें कोई संवैधानिक संकट नहीं है। लेकिन जो लोग व्याख्या कर रहे हैं, जिनको जनता दल यू के लोग बाल की खाल निकालने वाला बता रहे हैं उनका कहना है कि अनुच्छेद 164 में लिखा हुआ है कि अगर कोई व्यक्ति किसी सदन का सदस्य नहीं है तब भी वह मंत्री बन सकता है लेकिन उसके बाद छह महीने के भीतर उसको किसी न किसी सदन का सदस्य निर्वाचित होना होगा। लेकिन अगर कोई व्यक्ति पहले से सदन का सदस्य हो और वह इस्तीफा दे दे तो क्या उसका मंत्री पद बचा रहेगा?

सवाल बहुत जायज है। मंत्री, मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री को पद ग्रहण करने के बाद छह महीने का समय किसी सदन का सदस्य निर्वाचित होने के लिए दिया जाता है। अगर कोई मंत्री पहले से किसी सदन का सदस्य है और वह सदन से इस्तीफा दे दे तो उसे छह महीने का समय किस बात के लिए मिलेगा? वह किसी दूसरे सदन का सदस्य निर्वाचित होने की वजह से अगर संसद या विधानमंडल के किसी सदन की सदस्यता छोड़ता है तो इसका अर्थ है कि उसे संसद या  विधानमंडल में नहीं रहना है। यह मंशा जाहिर हो जाने के बाद क्या वह मंत्री बना रह सकता है? बिहार के मामले में इसका उपाय यह सुझाया जा रहा था कि या तो नीतीश कुमार को राज्यपाल कार्यवाहक मुख्यमंत्री के तौर पर काम करने को कह दें या उनको फिर से मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई जाए, तभी उनको समय मिल सकता है। अन्यथा विधान परिषद की सदस्यता से इस्तीफा देते ही उनका मुख्यमंत्री पद भी समाप्त हो जाएगा। यह अनोखी स्थिति है और जब तक मुख्यमंत्री पद से नीतीश कुमार का इस्तीफा नहीं हो जाता है तब तक इस पर चर्चा चलती रहेगी। इस बहाने अनुच्छेद 164 की व्याख्या का मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचे तब भी हैरानी नहीं होगी।

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By NI Political Desk

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