उत्तर प्रदेश सरकार ने अख़लाक की हत्या के आरोपियों पर से मुकदमा वापस लेने की अर्जी दी, तो आम जन की न्याय भावना आहत हुई। यह बड़ी राहत की बात है कि जिला न्यायालय ने उस अर्जी को ठुकरा दिया है।
ग्रेटर नोएडा के बीसड़ा गांव में सितंबर 2015 में भीड़ ने फ्रीज में बीफ रखने के शक पर मोहम्मद अख़लाक की पीट-पीट कर हत्या की, जो जाहिरा तौर पर उन्होंने कानून की धज्जियां उड़ाईं। यह तो निर्विवाद कहा जा सकता है कि उन्होंने कानून अपने हाथ में लिया। बीफ रखना गैर-कानूनी है और फिर भी शक हो कि किसी ने अपने पास उसे रखा है, तो उचित प्रक्रिया उस व्यक्ति के खिलाफ शिकायत दर्ज कराना होगा। मगर खुद उसे पीट कर मार डालना समाज को अराजक बनाना है। इसलिए उचित एवं अपेक्षित यही है कि अख़लाक की हत्या में शामिल व्यक्तियों के खिलाफ अगर अकाट्य साक्ष्य हों, तो उन्हें कठोरतम सज़ा होनी चाहिए।
ऐसे साक्ष्य हैं या नहीं, यह न्यायिक प्रक्रिया में ही तय हो सकता है। इसीलिए जब उत्तर प्रदेश सरकार ने अख़लाक की हत्या के आरोपियों पर से मुकदमा वापस लेने की अर्जी कोर्ट में दी, तो न्याय भावना से संचालित हर व्यक्ति ने खुद को आहत महसूस किया। यह बड़ी राहत की बात है कि जिला न्यायालय ने उस अर्जी को ठुकरा दिया है। अतिरिक्त जिला न्यायाधीश सौरभ द्विवेदी ने उस अर्जी को ‘बेबुनियाद’ करार दिया और इस मुकदमे को अति महत्त्वपूर्ण बताते हुए प्राथमिकता के आधार पर इसकी सुनवाई का आदेश दिया है। इससे भरोसा बना है कि भारत की न्याय प्रणाली में अभी जीवंतता बाकी है।
हालांकि यह तथ्य सामने है कि दस साल गुजर जाने के बावजूद मामला अभी तक निचली अदालत में ही है। इंसाफ में ऐसी देर आखिरकार न्याय के अर्थ को ही हलका कर देती है। उसके ऊपर राजनीतिक कारणों से अगर केस भी वापस हो जाए, तो कानून का राज होने का भरोसा क्षीण हो जाएगा। अख़लाक की हत्या के बाद देश में कथित गो-रक्षकों द्वारा कानून अपने हाथ में लेने का एक सिलसिला बनता नजर आया था। उसका अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों के मनोविज्ञान पर क्या असर हुआ है, यहां मुद्दा सिर्फ यह नहीं है। बल्कि उससे कानून के रुतबे और न्याय की सर्वोच्चता की धारणा चोटिल हुई है। जज द्विवेदी ने कानून-सम्मत निर्णय देकर उसी जख्म पर मरहम लगाया है।


