पूर्वोत्तर में एक समय भारतीय जनता पार्टी ने अपनी पूरी पकड़ बना ली थी। ज्यादातर राज्यों में उसकी या सहयोगी पार्टियों की सरकार बनी। लेकिन अब धीरे धीरे ऐसा लग रहा है कि सहयोगी पार्टियों का भाजपा पर से भरोसा उठ रहा है। उनको लग रहा है कि भाजपा अपने को मजबूत कर रही है, जिसका असर आगे उनकी राजनीति पर पड़ सकता है। तभी नगालैंड से लेकर मेघालय तक भाजपा अपने दांव चल रही है और भाजपा की सहयोगी पार्टियां अपने दांव चल रही है। ताजा मामला मेघालय का है, जहां यूडीपी के आठ विधायक भाजपा में शामिल हो गए हैं। पार्टी के दो विधायक सत्तारूढ़ एनपीपी में चले गए। मजबूरी में इकलौते बचे नेता को मंत्रिमंडल से इस्तीफा देना पड़ा।
सोचें, भाजपा के सिर्फ दो सीटों पर जीती थी। लेकिन अब उसके 10 विधायक हो गए हैं। भाजपा की इस राजनीति से मुख्यमंत्री कॉनरेड संगमा चिंतित रहते हैं। तभी उन्होंने अपनी स्थिति मजबूत की है। इस बार वे अकेले बहुमत में हैं। उनके पास 36 विधायक हैं और वे भाजपा से अलग राह भी चल रहे हैं। ऐसे ही नगालैंड में भाजपा की राजनीति से घबरा कर एनपीएफ ने दूसरी पार्टी एनडीपीपी का विलय अपनी पार्टी में करा लिया। इस तरह उसकी सीटों की संख्या 39 हो गई। भाजपा 12 सीटों पर है। उधर अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू भी अलग राजनीति कर रहे हैं। उनको लग रहा है कि भ्रष्टाचार के मामले में सीबीआई की जांच से परेशानी बढ़ सकती है। ध्यान रहे वे कांग्रेस पार्टी छोड़ कर भाजपा के साथ जुड़े हैं। उसके बाद से लगातार मुख्यमंत्री बन रहे हैं। अब उनको चिंता सता रही है कि कहीं भाजपा उन्हें हटा न दे।
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