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उपेंद्र कुशवाहा का ध्यान रखने की मजबूरी

उपेंद्र कुशवाहा

सोचें, भारतीय जनता पार्टी ने सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री बनाया है। वे कुशवाहा समाज के सबसे बड़े नेता हैं। उनके मुख्यमंत्री बनने के बाद किसी भी पार्टी के कुशवाहा नेता का कोई भविष्य नहीं बचा। राजद के संसदीय दल के नेता अभय कुशवाहा ने जाकर सम्राट चौधरी को गुलदस्ता दिया। इसके बावजूद भाजपा को उपेंद्र कुशवाहा का ध्यान रखने की मजबूरी है। पहले उपेंद्र कुशवाहा को लोकसभा का चुनाव हारने के बाद दो साल की राज्यसभा मिली और फिर छह साल के लिए उनको राज्यसभा भेजा गया। उन्होंने अपने बेटे दीपक प्रकाश को बिना एमएलए या एमएलसी बने मंत्री बनवा दिया तो भाजपा को उनको भी एडजस्ट करना पड़ा।

असल में पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए यह सवाल उठाया कि बिना विधायक बने किसी को दो बार कैसे मंत्री बनाया गया? इसके बाद भाजपा ने आनन फानन में अपनी पार्टी के एक एमएलसी देवेश कुमार का इस्तीफा कराया। उनकी जगह राज्यपाल की ओर से दीपक प्रकाश को मनोनीत किया जाएगा। देवेश कुमार का कार्यकाल सिर्फ 10 महीने का ही है लेकिन इसका बड़ा मैसेज गया है। एक मैसेज तो यह गया कि सबके बावजूद उपेंद्र कुशवाहा इतने मजबूत हैं कि उनके बेटे को एडजस्ट करने के लिए भाजपा को अपने एमएलसी का बलि देनी पड़ी। दूसरा मैसेज यह है कि पिछड़ी जाति के लिए भाजपा अपने सबसे भरोसेमंद समर्थक जाति की भी बलि ले सकती है। ध्यान रहे देवेश कुमार भूमिहार हैं। उनके इस्तीफे के बाद यह चर्चा है कि कुशवाहा के लिए भूमिहार की बलि हुई है। सोचें, भूमिहारों ने बांकीपुर के उपचुनाव में भी तमाम हल्ले के बावजूद प्रशांत किशोर से ज्यादा वोट भाजपा को दिया। उसके अगले ही दिन देवेश कुमार की छुट्टी हो गई।

By NI Political Desk

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