अप्रैल में जब नारी शक्ति वंदन कानून में संशोधन का बिल संसद के विशेष सत्र में पेश किया गया तो ऐसा लगा जैसे भाजपा और उसके नेताओं को महिलाओं की कितनी परवाह है। विपक्षी पार्टियों ने भले इसका विरोध किया था लेकिन महिलाओं के प्रति जुबानी जमाखर्च करने में उसने भी कंजूसी नहीं की थी। उसके बाद पांच राज्यों के चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में प्रचार के दौरान विपक्ष को महिला विरोधी साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई। भाजपा अपने को इस बात के लिए प्रतिबद्ध बता रही है कि वह महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देगी। लेकिन पश्चिम बंगाल के चुनाव में उसने 294 सीटों में से कुल 33 सीटों पर महिलाओं को उतारा था। यानी करीब 11 फीसदी टिकट महिलाओं को दिया था।
भाजपा को 207 सीटें मिली हैं, जिनमें से 21 महिलाएं हैं। इनमें से सात महिलाओं को भाजपा की शुभेंदु अधिकारी सरकार में मंत्री बनाया गया है। सोचें, 41 मंत्री बने हैं उनमें से सात महिलाएं हैं। यानी 20 फीसदी केसे कुछ कम महिलाओं को मंत्री बनाया गया। इसका अर्थ है कि जब तक कानून नहीं बनेगा तब तक महिलाओं को 33 फीसदी हिस्सा भाजपा भी नहीं देगी। उधर कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार बनी तो पहले चरण में 14 मंत्रियों ने शपथ ली है। उनमें एक भी महिला मंत्री नहीं है। यह पूर्वाग्रह की हद है। ऐसा नहीं है कि कर्नाटक अपवाद है। केरल की कांग्रेस सरकार में भी सिर्फ दो महिलाएं मंत्री हैं। 21 सदस्यों की वीडी सतीशन की सरकार में सिर्फ दो महिलाएं हैं। अभी एक नया संगठन बना है कॉकरोच जनता पार्टी का। उससे संस्थापक ने तीन प्रवक्ताओं की नियुक्ति की है, जिनमें कोई महिला नहीं है।
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