पश्चिम बंगाल में दिलचस्प तस्वीर सामने आई है। भाजपा के पास 294 की विधानसभा में 207 सीटें हैं। मुख्य विपक्षी तृणमूल कांग्रेस को 80 सीटें मिली थीं। इससे लग रहा था कि ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली पार्टी मजबूत विपक्ष की भूमिका निभाएगी। ममता खुद लड़ने भिड़ने वाली नेता हैं और ऊपर से उनके पास 29 लोकसभा सांसद औरर 80 विधायकों की ताकत थी। लेकिन अब यह ताकत समाप्त होती दिख रही है। उनकी पार्टी के करीब 60 विधायक अलग हो गए हैं और उन्होंने स्पीकर से अलग गुट की मान्यता ले ली है। स्पीकर ने तृणमूल से निकाले गए विधायक ऋतब्रत बनर्जी को विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के तौर पर मान्यता दे दी है।
ऋतब्रत बनर्जी ने बगावत करने के बाद भी ममता बनर्जी को ही पार्टी का अध्यक्ष बताया है लेकिन वह तकनीकी पोजिशनिंग है। उन्होंने इसके साथ ही यह भी कहा कि उनका गुट रचनात्मक विपक्ष की भूमिका निभाएगा और जरुरत पड़ने पर सरकार का विरोध भी करेगा लेकिन जहां सरकार अच्छा काम करेगी वहां उसका समर्थन भी किया जाएगा। एक तरह से उन्होंने साफ कर दिया है कि अब पश्चिम बंगाल का विपक्ष भी सरकार के साथ है।
कहा जा रहा है कि ऋतब्रत बनर्जी में इतना दम नहीं था कि वे विधायक जुटा सकें। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने परदे के पीछे से सब कुछ हैंडल किया। चूंकि वे लंबे समय तक तृणमूल कांग्रेस में रहे और सबको जानते हैं तो उन्होंने विधायकों को ऋतब्रत और संदीपन साहा के साथ जोड़ा। इस तरह अब पश्चिम बंगाल में सरकार और विपक्ष दोनों भाजपा है। अगर इस गुट को पार्टी की मान्यता मिलती है तो उसका एनडीए में शामिल होना महज वक्त की बात होगी। उसके बाद जो बचेंगे उनको मुख्य विपक्षी पार्टी का दर्जा नहीं मिल पाएगा।
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