ऐसा लग रहा है कि केंद्र सरकार की आंखें खुल गई हैं और वह सारे भूल सुधार एक साथ करना चाह रही है। छात्रों और युवाओं के आंदोलन से पहले सरकार की आंखों पर पट्टी चढ़ी थी। ऐसा नहीं था कि वह पट्टी सिर्फ अहंकार की थी। राजनीतिक नासमझी की पट्टी भी सरकार की आंखों पर चढ़ी थी। राहुल गांधी की बहुजन राजनीति ने भाजपा को भी व्यापक हिंदुत्व की बजाय जातियों की राजनीति के रास्ते पर चला दिया था। रही सही कसर सरकार के कुछ नए नवेले सलाहकारों ने पूरी कर दी थी। उन्होंने भी समझा दिया था कि अंबेडकर, फुले, पेरियार की बात करके काम चल जाएगा, इसके आगे देखने की जरुरत नहीं है। तभी यूजीसी ने कैम्पस में समानता के नाम पर घनघोर भेदभाव का निर्देश जारी किया। यही धर्मेंद्र प्रधान शिक्षा मंत्री थे और निश्चित रूप से यूजीसी ने उनकी जानकारी में यह निर्देश जारी किया होगा।
जब यूजीसी ने समानता के नाम पर भेदभाव और पूर्वाग्रह वाला निर्देश जारी किया, जिसमें सामान्य जातियों के किशोर उम्र के छात्रों को कैम्पस में प्रवेश के साथ ही संभावित अपराधी बना दिया गया था तब इसका भारी विरोध हुआ। भाजपा के सबसे कोर समर्थकों ने इसका विरोध किया। लेकिन न तो शिक्षा मंत्री ने कोई बयान जारी किया और न प्रधानमंत्री या किसी अन्य बड़े नेता की ओर से इसके विरोध में कुछ कहा गया। इसमें सुधार का आश्वासन भी नहीं दिया गया। उलटे भाजपा ने अपनी पार्टी के कुछ बड़बोले अगड़े नेताओं को आगे करके इसका बचाव करवाया।
बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इस पर रोक लगाई। अब ‘जेन जी’ के आंदोलन के कारण घुटनों पर आई सरकार ने धर्मेंद्र प्रधान को हटाया तो साथ ही यूजीसी वाले भूल सुधार का दांव भी चल दिया। कर्नाटक के ब्राह्मण नेता प्रहलाद जोशी को शिक्षा मंत्रालय का प्रभार देने का यही मतलब है। बताया जा रहा है कि यह प्रभार अस्थायी नहीं है, बल्कि हो सकता है कि अगली फेरबदल में उनको स्थायी शिक्षा मंत्री बनाया जाए। हालांकि जम्मू कश्मीर के डॉक्टर जितेंद्र सिंह के नाम की भी चर्चा है। अब देखना है कि यूजीसी वाले निर्देश पर सुप्रीम कोर्ट की रोक जारी रहती है या सरकार उसे वापस लेती है?
बहरहाल, धर्मेंद् प्रधान के हटने से एक तीर से दो शिकार हुए हैं। इसके बाद सरकार ने परीक्षा की व्यवस्था में बहुप्रतीक्षित सुधार की प्रक्रिया को भी आगे बढ़ाया है। ध्यान रहे 2024 में जब नीट यूजी के पेपर लीक हुए थे और देश के कई राज्यों में परीक्षा केंद्र मैनेज होने की खबरें आई थीं तब भी परीक्षा की व्यवस्था में सुधार की मांग उठी थी। लेकिन तब सरकार ने इस पर ध्यान नहीं दिया था। उस समय सरकार ने पूरे देश की परीक्षा भी रद्द नहीं कराई थी। लेकिन इस बार जब बड़ा आंदोलन हुआ तो सरकार परीक्षा की व्यवस्था में सुधार करने जा रही है।
इसके लिए कांग्रेस के नेता रहे नंदन नीलेकणी की अध्यक्षता में एक उच्चाधिकार प्राप्त कमेटी बनाई गई है। यहां भी सरकार ने ऐसा नाम आगे कर दिया, जिस पर कांग्रेस नेता सवाल नहीं उठा सकते हैं। आखिर कांग्रेस की सरकार में नीलेकणी काफी समय तक कैबिनेट मंत्री के दर्जे के साथ यूआईएडीआई के प्रमुख रहे थे। वे 2014 के चुनाव में कांग्रेस की टिकट पर बेंगलुरू की एक सीट से चुनाव भी लड़े थे। सो, शिक्षा और परीक्षा को लेकर पिछले कुछ समय से उठ रहे सवालों और अलग अलग समूहों की नाराजगी को एक साथ दूर करने का सरकार ने शुरू कर दिया है।
Leave a comment
You must be logged in to post a comment.


