शरद पवार की सेहत ऐसी नहीं है कि वे पहले की तरह सक्रिय होकर महाराष्ट्र में राजनीति कर सकें। लेकिन फिर से राज्यसभा जाकर उन्होंने ऐसा संकेत दिया है कि वे एक पारी और खेलने के लिए तैयार हैं। हालांकि यह पारी कैसी होगी यह किसी को समझ में नहीं आ रहा है। वैसे भी शरद पवार की राजनीति समझना सबके वश की बात नहीं होती है। जाने माने पत्रकार वीर सांघवी ने अपनी किताब में उनके बारे में लिखा है कि अगर हवाईअड्डे पर पवार के हाथ में मुंबई जाने वाली उड़ान का बोर्डिंग पास दिखे तो जरूरी नहीं है कि वे मुंबई जा रहे हों। हो सकता है कि वे चेन्नई लैंड करें। तभी 82 साल की उम्र में संन्यास की घोषणा के बाद भी फिर से राज्यसभा जाने के उनके फैसले को समझने की जरुरत है। साथ ही यह भी समझने की जरुरत है कि उनके प्रति भाजपा के सद्भाव का क्या मतलब है?
भाजपा ने संख्या कम होने के बावजूद बिहार में राज्यसभा चुनाव में अतिरिक्त उम्मीदवार दिया। ओडिशा और हरियाणा में भी राज्यसभा का अतिरिक्त उम्मीदवार उतारा। महाराष्ट्र में भी भाजपा की ओर से कहा गया था कि वह सातवां उम्मीदवार देगी। लेकिन उसने नहीं दिया और शरद पवार को निर्विरोध निर्वाचित होने दिया। बाद में संजय राउत की किताब की कहानियां आईं, जिसके मुताबिक शरद पवार ने कानूनी मामलों में अमित शाह की मदद की थी। बहरहाल, एक तरफ शरद पवार के दिवंगत भतीजे सुनेत्रा पवार की राजनीति है, जो पूरी तरह से मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस के हिसाब से चल रही है तो दूसरी ओर शरद पवार का विपक्ष की ओर से साझा उम्मीदवार के तौर पर राज्यसभा जाना है। साथ ही उनके प्रति भाजपा का सद्भाव भी है। सो, अगले कुछ दिन में वे जो राजनीति करेंगे उस पर बारीकी से नजर रखने की जरुरत है। एनसीपी के साथ साथ विपक्ष की राजनीति पर भी इसका असर होगा।


