शरद पवार ने बहुत सोच समझ कर अपनी पार्टी के लिए घड़ी चुनाव चिन्ह लिया था। लेकिन वह घड़ी अजित पवार ने छीन ली थी और अब उस पर सुनेत्रा पवार का कब्जा है। दूसरी ओऱ शरद पवार, उनकी बेटी और बची खुची पार्टी के लिए घड़ी टिक टिक कर रही है। उनके लिए ‘अ मिनट टू मिडनाइट’ का जुमला बोला जा सकता है। इसका अर्थ है कि पार्टी टूटने या विलय के लिए पूरी तरह से तैयार है। फैसला शरद पवार को करना है और जल्दी करना है। अगर वे देरी करते हैं तो समस्या होगी। बची खुची पार्टी भी उनके हाथ से निकल जाएगी। ध्यान रहे शरद पवार के पास लोकसभा में आठ सांसद और महाराष्ट विधानसभा में 10 विधायक हैं। इन 10 में से छह विधायक और आठ में से छह सांसद पाला बदलने को तैयार हैं। उनको इसमें समस्या नहीं है कि पार्टी भाजपा के साथ चली जाए या पार्टी का विलय सुनेत्रा पवार की पार्टी यानी असली एनसीपी के साथ कर दी जाए। बस .ये नेता किसी तरह से सत्ता के साथ जाना चाहते हैं। उनको अहसास हो गया. है कि केंद्र, प्रदेश और नगर निगम तीनों की सत्ता से बाहर रह कर वे ज्यादा समय तक राजनीति नहीं कर पाएंगे।
शरद पवार के लिए सिल्वर लाइनिंग यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का उनके प्रति सद्भाव है। यही से उनको राहत मिली हुई है। यह जानना बहुत दिलचस्प है कि भाजपा के दोनों शीर्ष नेताओं ने महाराष्ट्र में ऑपरेशन एनसीपी चला रहे नेताओं को साफ निर्देश दिया है कि काम ऐसे करना है कि शरद पवार को बुरा न लगे। यानी उनकी सहमति से कोई भी फैसला करना है। यह बडी बात है कि पार्टी तोड़ने से पहले शरद पवार का ध्यान रखा जा रहा है। यह भी कहा जा रहा है कि पार्टी के शीर्ष नेता दिल्ली में सुप्रिया सुले को एडजस्ट करने को तैयार हैं। यानी शरद पवार और उनकी बेटी को नाराज या निराश नहीं करना है। हालांकि यह साफ कर दिया गया है कि सुप्रिया सुले सरकार में आती हैं तो कृषि मंत्रालय नहीं मिलेगी। उन्हें कोई दूसरा मंत्रालय देकर एडजस्ट किया जा सकता है। महाराष्ट्र में भी उनकी पार्टी के विधायकों को सरकार में जगह मिल सकती है।
परंतु क्या शऱद पवार और सुप्रिया सुले को यह जो छूट मिली हुई है वह अनंतकाल के लिए है? ऐसा नहीं है। भाजपा बहुत आक्रामक तरीके से इस बार के मानसून सत्र के लिए सांसद जुटा रही है। उसे किसी हाल में संविधान संशोधन वाले कम से कम दो बिल पास कराने हैं। इन विधेयकों के लिए विशेष बहुमत की जरुरत है यानी दोनों सदनों में अलग अलग दो तिहाई बहुमत की जरुरत होगी। इसलिए शरद पवार को बहुत जल्दी फैसला करना होगा। तभी मंगलवार को देर रात तक चौतरफा माथापच्ची हुई है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस ने एनसीपी के नेताओं प्रफुल्ल पटेल और सुनील तटकरे से मुलाकात की। वे शरद पवार की पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष जितेंद्र पाटिल से भी मिले। इनकी साझा मुलाकात हुई। उधर अमित शाह के एकनाथ शिंदे से मिलने की खबर आई। सो, अब फैसले की घड़ी है। शरद पवार की पार्टी सुनेत्रा पवार के साथ जाती है या उनके सासंद व विधायक भाजपा के साथ जाते हैं या पवार सीधे एनडीए का हिस्सा बन जाते हैं। अपने 50 साल की राजनीति में पहली बार शरद पवार इस तरह की स्थिति में फंसे हैं। उन्हें पार्टी और बेटी को देखना है या पांच दशक की राजनीति की कमाई संभालनी है। पांच दशक की राजनीतिक पूंजी यानी मराठा और मुस्लिम दोनों की राजनीति उनके हाथ से निकल रही है।
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