भारतीय जनता पार्टी ने अकाली दल को हरी झंडी तो दे दी है लेकिन तालमेल से पहले इस बात पर अड़ी है कि वह बराबर सीटों पर लड़ेगी। यह भाजपा की रणनीति होती है। उसने बिहार में धीरे धीरे करके नीतीश कुमार की पार्टी को अपने बराबर पर ला दिया, जबकि 2010 तक जनता दल यू बड़ी पार्टी थी। वह भाजपा के मुकाबले डेढ़ गुना तक ज्यादा सीट लड़ती थी। 2009 के लोकसभा में भाजपा 15 और जदयू 25 सीटों पर लड़ी थी, जबकि 2010 के विधानसभा चुनाव में भाजपा 101 और जदयू 142 सीट पर लड़ी थी। लेकिन पिछले चुनाव में दोनों एक एक सौ सीटों पर लड़े। ऐसे ही भाजपा चाहती है कि पंजाब में बराबरी का तालमेल हो। यानी अकाली दल और भाजपा बराबर सीटों पर लड़ें।
दूसरी ओर अकाली दल की रणनीति भाजपा से दोगुने से ज्यादा सीटों पर लड़ने की है। बराबरी के तालमेल के लिए भाजपा ने दबाव बनाना शुरू कर दिया है। पहले हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने कहा कि भाजपा अकेले लड़ेगी और अब भाजपा के राष्ट्रीय संगठन महामंत्री बीएल संतोष और कार्यालय प्रभारी तरुण चुघ ने कहा है कि भाजपा अकेले सभी 117 सीटों पर तैयारी कर रही है। वे पहले पंजाब के प्रभारी रहे हैं। हालांकि पंजाब के नए प्रभारी सतीश पुनिया ने अभी तक कोई बयान नहीं दिया है। माना जा रहा है कि जिन नेताओं के सीधे बातचीत करनी है उनको चुप रहने को कहा गया है और बाकी लोग दबाव बनाने के लिए बयान देंगे। हालांकि यह संभव नहीं है कि अकाली दल बराबरी पर तालमेल करे। लेकिन यह तय है कि लगातार दो चुनावों से हार रही अकाली दल पहले से कुछ ज्यादा सीट भाजपा को देने पर राजी हो जाएगी।
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