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ईवीएम पर फैसला अंतिम नहीं

supreme court vvpat verification

सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि ईवीएम और वीवीपैट की मौजूदा व्यवस्था जैसे चल रही है वैसे चलती रहेगी। हालांकि कांग्रेस ने कहा है कि वह वीवीपैट पर्चियों के मिलान की मांग करती रहेगी। लेकिन फिलहाल वीवीपैट की सभी पर्चियों का ईवीएम के वोट से मिलान करने के लिए दायर की गई बहुत सारी याचिकाओं को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने साथ में एकाध शर्तें लगाई हैं, जैसे अगर दूसरे या तीसरे नंबर के उम्मीदवार को ईवीएम पर संदेह होता है तो वह सात दिन के भीतर शिकायत कर सकता है और ईवीएम के चिप की जांच हो सकती है। इसी तरह अदालत ने कहा है कि सिंबल लोडिंग यूनिट यानी एसएलयू को सिंबल लोडिंग के बाद सील कर दिया जाएगा और 45 दिन तक ईवीएम के साथ ही स्टोर में रखा जाएगा।

सर्वोच्च अदालत से इसी तरह के फैसले की उम्मीद थी लेकिन हैरानी की बात यह रही कि दोनों जजों ने अपना फैसला अलग अलग लिखा। जस्टिस दीपांकर दत्ता ने तो याचिकाओं में उठाए गए मुद्दों पर फैसला सुनाने से आगे बढ़ कर ईवीएम और वीवीपैट को भारत की उपलब्धि बता दी और कहा कि कुछ लोग भारत की उपलब्धियों को कमजोर करने का प्रयास करते हैं। सोचें, ईवीएम और वीवीपैट उपलब्धि है! अगर यह उपलब्धि है तब तो हम लोग अमेरिका और अनेक यूरोपीय देशों से आगे हैं क्योंकि उनके यहां बैलेट से वोटिंग होती है। बहरहाल, जस्टिस दत्ता ने याचिका दायर करने वाली संस्था एडीआर पर भी सवाल उठाए। हालांकि देश के मतदाताओं को जागरूक करने में एडीआर की भूमिका बहुत शानदार रही है।

बहरहाल, माननीय जजों ने ईवीएम और वीवीपैट की व्यवस्था को पवित्र मान लिया है और जस्टिस दीपांकर दत्ता ने यहां तक कहा है कि बैलेट पेपर से चुनाव की व्यवस्था की ओर लौटने का न तो प्रश्न उठता है और न भविष्य में उठ सकता है। सोचें, ऐसी भविष्यवाणी! लेकिन अदालत ने जब यह फैसला सुनाया तो ईवीएम का इतिहास ध्यान आया। एक समय भारत के माननीय सुप्रीम कोर्ट ने प्रयोग के तौर पर ईवीएम से कराए गए वोट को खारिज कर दिया था और कहा था कि भारत में वोटिंग का मतलब बैलेट से वोटिंग है और बैलेट का मतलब पेपर पर छपा हुआ बैलेट ही है कोई मशीन नहीं। तब लगता है सुप्रीम कोर्ट भविष्य देखने से चूक गया था। तीन जजों की बेंच के फैसले से सीपीएम के जीते हुए उम्मीदवार का चुनाव रद्द हुआ और बैलेट से चुनाव हुआ तो कांग्रेस का उम्मीदवार जीत गया।

यह मामला पिछली सदी में अस्सी के दशक का है। तब चुनाव आयोग ने संविधान के अनुच्छेद 324 से मिले अपने अधिकार का इस्तेमाल करके 1982 में केरल विधानसभा चुनाव में पनुर सीट के 84 में से 50 बूथों पर ईवीएम का इस्तेमाल किया था। इस चुनाव में सीपीआई के उम्मीदवार सिल्वा पिल्लई ने कांग्रेस के अम्बट चाको जोस को 123 वोट से हरा दिया था। हारे हुए उम्मीदवार ने निचली अदालत में नतीजे को चुनौती दी तो निचली अदालत ने याचिका खारिज कर दी और कहा कि चुनाव आयोग ने जो किया है ठीक किया है। लेकिन बाद में सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस मुर्तुजा फजल अली, जस्टिस ए वरदराजन और जस्टिस रंगनाथ मिश्र की बेंच ने इस पर विचार किया और नतीजे को रद्द कर दिया। फिर बैलेट से चुनाव हुआ और उसमें ईवीएम से जीता हुआ उम्मीदवार हार गया। क्या पता भविष्य में फिर ईवीएम की बजाय बैलेट से चुनाव हो और उसमें भी ईवीएम से जीतने वाले लोग हार जाएं! भविष्य किसने देखा है?

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