केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड यानी सीबीएसई ने इस बार जो गड़बड़ की है वह अभूतपूर्व है। उसने 12वीं की बोर्ड परीक्षा देने वाले 18 लाख बच्चों पर बिना तैयारी के ऑनस्क्रीन मार्किंग का प्रयोग कर डाला। इसका बहुत बड़ा नुकसान हुआ है। चार लाख से ज्यादा बच्चों ने पुनर्मूल्यंकन का आवेदन किया। उसमें उनको जो परेशानी हुई उसकी लंबी दास्तान है। लेकिन असली सवाल यह है कि सीबीएसई ने पायलट प्रोजेक्ट क्यों नहीं किया और ज्यादा बड़ा ड्राई रन क्यों नहीं चलाया? इसी तरह दूसरा सवाल यह है कि उसी कंपनी को ओएसएम का ठेका क्यों दिया, जिसे तेलंगाना ने ब्लैकलिस्ट किया था?
हालांकि सीबीएसई की ओर से आधिकारिक रूप से इससे इनकार किया गया है कि ब्लैकलिस्टेड कंपनी को ठेका दिया गया। लेकिन जानकार सूत्रों का कहना है कि सीबीएसई के अधिकारियों ने अनौपचारिक बातचीत में कबूल किया कि तेलंगाना में ब्लैकलिस्ट की गई कंपनी कोएम्ट एडुटेक को की 18 लाख छात्रों की करीब एक करोड़ कॉपियों के लगभग 40 करोड़ पन्ने अपलोड करने का ठेका दिया गया। लेकिन इसी गलती पर भी जवाब मांगेंगा कौन और कौन जवाबदेही तय करेगा? सबसे पहले तो इसी मूर्खतापूर्ण प्रयोग के बारे में पूछना चाहिए कि जब छात्रों ने हाथ से कॉपी लिखी तो 40 करोड़ पन्ने स्कैन करके उसे अपलोड करने का क्या तर्क है?


