भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस दोनों ने राज्यसभा चुनाव के लिए अपने उम्मीदवारों की जो पहली सूची जारी की है उसे बारीकी से देखें तो दोनों पार्टियों के काम करने और उम्मीदवार तय करने के तरीके का अंतर साफ दिखता है। कांग्रेस की सूची में, जहां ऐसे चेहरे ज्यादा हैं, जो मीडिया में रहते हैं, पहले से चर्चित हैं और राहुल गांधी या प्रियंका गांधी वाड्रा के नजदीकी माने जाते हैं। उसमें जमीन पर काम करने वाले हैं, जबकि दूसरी ओर भाजपा की सूची में ज्यादातर लोग ऐसे हैं, जो बरसों से संगठन में काम कर रहे हैं और मीडिया में ज्यादा क्या बिल्कुल नहीं दिखाई देते हैं। मिसाल के तौर पर भाजपा ने गुजरात से जिन चार लोगों को उम्मीदवार बनाया उनको दिल्ली का एलीट मीडिया जानता ही नहीं है।
भाजपा ने मध्य प्रदेश से रजनीश अग्रवाल को उम्मीदवार बनाया है। वे बरसों से संगठन का काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि वे टिकट के नए न तो दिल्ली गए थे और न प्रदेश कार्यालय में लॉबिंग की थी। ऐसे ही राजस्थान से सतीश पुनिया और अलका गुर्जर का भी मामला है। मणिपुर में पार्टी ने प्रदेश अध्यक्ष शारदा देवी को टिकट दिया है। तरुण चुघ जरूर ऐसे नेता हैं, जो मीडिया में दिखते हैं लेकिन उनको सिर्फ इस आधार पर टिकट नहीं मिली है। दूसरी ओर कांग्रेस ने पवन खेड़ा को इसी आधार पर टिकट दिया है कि वे टीवी पर लड़ते हैं और उन्होंने अंजाम की परवाह किए बगैर असम के मुख्यमंत्री के ऊपर बेसिरपैर के आरोप लगाए थे। हालांकि इससे कांग्रेस को बड़ा नुकसान हुआ था। उनके अलावा भी मीनाक्षी नटराजन और नीरज दांगी को राहुल गांधी का करीबी माना जाता है। प्रणब झा परदे के पीछे काम करते हैं लेकिन उनकी टिकट भी इसलिए हुई क्योंकि वे राष्ट्रीय अध्यक्ष के कार्यालय में समन्वय का काम देखते हैं।
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