कांग्रेस पार्टी का संविधान बचाने का अपना मॉडल है। सोनिया व राहुल गांधी, प्रियंका गांधी वाड्रा और मल्लिकार्जुन खड़गे सहित कांग्रेस के तमाम नेताओं ने रविवार, 14 दिसंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान की रैली में हाथ में संविधान लेकर प्रदर्शन किया। पिछला लोकसभा चुनाव तो कांग्रेस और उसकी सहयोगी पार्टियों ने संविधान बचाने के नाम पर ही लड़ा था। लेकिन कांग्रेस जहां सरकार में है वहां उसने संविधान बचाने का वही रास्ता अपनाया है, जो भाजपा का रास्ता है। वहां संविधान कांग्रेस की सरकार के हिसाब से चलता है और टकराव होने की स्थिति में संविधान की नहीं सरकार की बात मानी जाती है। दलबदल कानून पर जिस तरह से तेलंगाना के स्पीकर ने फैसला किया है वह कांग्रेस का मॉडल का।
सोचें, 2023 के विधानसभा चुनाव के बाद मुख्य विपक्षी भारत राष्ट्र समिति यानी बीआरएस के 10 विधायक कांग्रेस में शामिल हो गए। बीआरएस के 39 विधायक जीते थे। संविधान के मुताबिक दो तिहाई से कम विधायक अगर पाला बदलते हैं तो दलबदल विरोधी कानून लागू होता है। लेकिन यहां 25 फीसदी विधायकों ने पार्टी छोड़ी और स्पीकर जी प्रसाद कुमार ने कहा है कि किसी कानून का उल्लंघन नहीं हुआ है। बीआरएस ने इन विधायकों को अयोग्य ठहराने का नोटिस दिया है। जब स्पीकर ने कोई फैसला नहीं किया तो बीआरएस ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर स्पीकर ने पांच विधायकों की अयोग्यता पर सुनवाई की और कहा कि किसी कानून का उल्लंघन नहीं हुआ है। यहां दो बातें हैं। इसी तरह से अगर कांग्रेस के विधायक भाजपा में जाते हैं तो उसको ऑपरेशन लोटस कहा जाता है और जब स्पीकर उनको अयोग्य नहीं ठहराते हैं तो उसे संविधान की हत्या कहा जाता है। ये दोनों काम कांग्रेस तेलंगाना में कर रही है।
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