पश्चिम बंगाल के चुनाव नतीजों को लेकर भाजपा बहुत ज्यादा भरोसे में है। वैसे तो वह हर चुनाव में भरोसे में रहती है। लेकिन पश्चिम बंगाल का मामला थोड़ा अलग है। इस बार भाजपा ने पहले चरण के मतदान के दो दिन पहले यानी प्रचार बंद होने के दिन से जो माहौल बनाया है वह अभी तक कायम है। पहले चरण में भाजपा ने 152 में से एक सौ से ज्यादा सीट जीतने का नैरेटिव बनाया। यह भी कमाल की बात है कि दिल्ली से बंगाल गए तमाम पत्रकार एक जैसी बात कर रहे थे। यहां तक कि कोलकाता में राइटविंग इको सिस्टम के लोग भी वही कहानी सुना रहे थे।
हर कहानी का लब्बोलुआब यह था कि पश्चिम बंगाल के हिंदू इस बार एकजुट हैं, वे मुसलमानों की बढ़ती आबादी और उनकी बढ़ती बदमाशियों से परेशान हैं, वे भाषा व संस्कृति से ज्यादा धर्म की बात कर रहे हैं, वे ममता बनर्जी की पार्टी की तृष्टिकरण की नीति से परेशान हैं, कट मनी से लोग परेशान हैं, पाड़ा क्लब से परेशान हैं, मस्तान लोगों से परेशान हैं आदि आदि। इस आधार पर दावा किया गया कि भाजपा पूर्ण बहुमत हासिल कर रही है।
लेकिन सवाल है कि क्या जिस तरह की धारणा बनाने की बात भाजपा कह रही है उसी आधार पर इतना भरोसा हो सकता है कि पूर्ण बहुमत मिल जाए? यह सवाल इसलिए है क्योंकि जमीनी असलियत बिल्कुल अलग है। एक जमीनी वास्तविकता यह है कि भाजपा सिर्फ 70 फीसदी वोट में लड़ी है, जबकि ममता बनर्जी सौ फीसदी वोट में लड़ी हैं। दूसरी वास्तविकता यह है कि भाजपा बंगाल के सिर्फ 70 फीसदी मतदान केंद्रों पर लड़ी है, जबकि तृणमूल कांग्रेस सौ फीसदी मतदान केंद्रों पर लड़ी है।
भाजपा के कम मतदान केंद्र पर लड़ने का अर्थ यह है कि लगभग 30 फीसदी मतदान केंद्रों पर उसकी उपस्थिति ही नहीं थी। इसकी मिसाल फालता विधानसभा सीट है, जहां 284 बूथों मे से लगभग 280 बूथ पर भाजपा का पोलिंग एजेंट नहीं था। ऐसा नहीं है कि यह स्थिति दक्षिण 24 परगना के चुनिंदा बूथ पर है। पूरे इलाके में लगभग ऐसी ही स्थिति है। यहां तक कि जिन दो सीटों से भाजपा के सीएम पद के अघोषित दावेदार और नेता प्रतिपक्ष शुभेंदु अधिकारी लड़े हैं वहां भी सभी मतदान केंद्रों पर भाजपा को पोलिंग एजेंट नहीं मिले।
एक रिपोर्ट के मुताबिक ममता बनर्जी की भबानीपुर विधानसभा सीट पर 50 से कुछ ज्यादा मतदान केंद्र ऐसे थे, जहां भाजपा का पोलिंग एजेंट नहीं था। इसी तरह शुभेंदु अधिकारी ने जिस नंदीग्राम सीट पर पिछली बार ममता बनर्जी को हराया था वहां के 80 से ज्यादा पोलिंग बूथ पर भाजपा को पोलिंग एजेंट नहीं मिले थे। यह स्थिति दोनों चरणों के मतदान में रही है। हालांकि ऐसा नहीं है कि जिन बूथों पर भाजपा का पोलिंग एजेंट नहीं था वहां भाजपा को वोट नहीं पड़े होंगे। लेकिन लगभग 30 फीसदी इलाका भगवान भरोसे थे।
अगर हिंदुओं के अंदर इतना स्ट्रॉन्ग सेंटिमेंट हो की हर हाल में भाजपा को वोट देना है तभी इन बूथों पर भाजपा को वोट पड़े होंगे। अन्यथा वहां का ज्यादातर वोट तृणमूल कांग्रेस के खाते में जाएगा। इस तरह की रिपोर्ट से सरकार और चुनाव आयोग की ओर से की गई सुरक्षा व्यवस्था की भी पोल खुलती है। सोचें, जब पूरी केंद्र सरकार, चुनाव आयोग, न्यायपालिका और केंद्रीय अर्धसैनिक बल मिल कर इतनी सुरक्षा नहीं सुनिश्चित कर सके कि भाजपा को पोलिंग एजेंट मिलें तो मतदाताओं को कैसे सुरक्षा का भरोसा हुआ होगा?


