यह लाख टके का सवाल है कि पश्चिम बंगाल में क्या अगले एक हफ्ते में विधानसभा चुनाव की घोषणा होगी? जब मुख्य चुनाव आयुक्त के नेतृत्व में चुनाव आयोग की फुल बेंच बंगाल का दो दिन का दौरा कर चुकी और पार्टियों व अधिकारियों के साथ मीटिंग हो गई, तैयारियों की समीक्षा हो गई तो चुनाव की घोषणा पर किसी को संशय नहीं होना चाहिए। खबर भी आ रही है कि 16 मार्च को बंगाल सहित पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव की घोषणा हो सकती है। फिर भी संदेह हो रहा है तो कारण बहुत पुख्ता हैं। अब तो मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी संशय जाहिर कर दिया है। उन्होंने सवालिया लहजे में कहा है क्या कि सरकार राष्ट्रपति शासन लगाने की तैयारी कर रही है? इसके बाद उन्होंने अपने संशय को तथ्यात्मक आधार देने के लिए कहा कि तमिलनाडु सरकार को तीन साल तक परेशान करने वाले व्यक्ति को राज्यपाल बना कर बंगाल लाने का और क्या कारण हो सकता है? यह सवाल उठाने के बाद उन्होंने कहा कि अगर राष्ट्रपति शासन लग जाता है तो अच्छा होगा क्योंकि तब वे सड़क पर उतर कर ज्यादा आक्रामक तरीके से लड़ पाएंगी।
तमिलनाडु से आरएन रवि को बंगाल ले जाना एक तैयारी का हिस्सा तो लग रहा है। लेकिन चुनाव को लेकर असली संशय चुनाव आयोग के कारण पैदा हुआ है। आयोग ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर के बाद जो अंतिम मतदाता सूची जारी की उसमें 60 लाख से ज्यादा मतदाताओं के नाम विचाराधीन सूची में डाल दिया। लॉजिकल डिस्क्रिपेंसीज के नाम पर उनके आवेदन में कमियां निकाली गईं और उसे सुधारने का प्रयास शुरू हुआ। बंगाल में बीएलओ और बीएलए के साथ साथ ईआरओ और एईआरओ कम पड़ गए तो माइक्रो ऑब्जर्वर नियुक्त किए गए और अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर बंगाल के साथ साथ झारखंड, ओडिशा आदि राज्यों के न्यायिक अधिकारी भी इस काम में शामिल किए गए हैं।
इसके बावजूद मंगलवार, 10 मार्च को सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई में बताया गया कि 60 लाख विचाराधीन मतदाताओं में से आठ लाख के दस्तावेज चेक हुए हैं यानी 52 लाख मतदाता का मामला लंबित है। आठ लाख मतदाताओं का नाम करीब 10 दिन में चेक हुआ है। सोचें, अगर 16 मार्च को चुनाव की घोषणा होनी है तो अगले पांच या छह दिन में कितने नाम चेक हो जाएंगे? जाहिर है अगर सब कुछ समय पर होना है यानी अप्रैल में चुनाव होना है तो 45 लाख या उससे ज्यादा नाम और कट जाएंगे। निश्चित रूप से इनमें से लाखों लोग जेनुइन मतदाता होंगे। सुप्रीम कोर्ट, चुनाव आयोग और ममता बनर्जी सब कह रहे हैं कि एक भी पात्र मतदाता का नाम सूची से नहीं कटना चाहिए। फिर 45 लाख या उससे ज्यादा मतदाताओं के नाम सूची से हटा कर कैसे चुनाव हो सकता है? अभी कोई तरीका नहीं दिख रहा है कि अगले एक हफ्ते में सभी 52 लाख मतदाताओं के दस्तावेज चेक हो जाएं। ममता बनर्जी को दोनों स्थितियों में खतरा है। एसआईआर के पहले और दूसरे चऱण में 63 लाख मतदाताओं के नाम कटे हैं। अब अगर 45 लाख नाम और कट जाते हैं तो यह भी ममता बनर्जी के लिए चिंता की बात है और अगर सारे नाम चेक करने के लिए राष्ट्रपति शासन लग जाता है तो वह भी चिंता की बात है। जानकार लोगों का कहना है कि नाम कटने से ज्यादा चिंता राष्ट्रपति शासन की है। नाम तो भाजपा समर्थकों के भी कट रहे हैं। लेकिन राष्ट्रपति शासन लगा तो ममता का कैडर भागना शुरू करेगा और चुनाव पर बड़ा असर होगा। .


