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झारखंड में भाजपा ने हाथ खड़े कर दिए!

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की झारखंड यात्रा कई मायने में बहुत खास रही। उन्होंने एक तरह से 2024 के लोकसभा चुनाव और उसी साल अंत में होने वाले झारखंड विधानसभा चुनाव का बिगुल बजा दिया। उन्होंने यह भी साफ कर दिया कि भाजपा का इरादा राज्य सरकार को अस्थिर करने का नहीं है। तो क्या यह माना जाए कि भाजपा ने झारखंड में हाथ खड़े कर दिए? यह सवाल इसलिए भी है क्योंकि पिछले दो साल में झारखंड सरकार को अस्थिर करने के जो प्रयास हुए, पार्टी के दूसरे सर्वोच्च नेता अमित शाह ने उससे अपने और शीर्ष नेतृत्व को अलग किया और प्रदेश नेतृत्व पर ठीकरा फोड़ दिया।

अमित शाह ने झारखंड के चाईबासा में कहा- प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और विधायक दल के नेता बाबूलाल मरांडी चाहते थे कि राज्य सरकार को बदल दिया जाए लेकिन हमने कहा कि लोकतंत्र में ऐसा नहीं कर सकते। सवाल है कि भाजपा को लोकतंत्र की इतनी परवाह है तो कर्नाटक, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में चुनी हुई सरकार को क्यों बदल दिया? असल में भाजपा ने लोकतंत्र के प्रति श्रद्धा या सम्मान की वजह से झारखंड में सरकार बदलने का काम स्थगित नहीं किया, बल्कि वह सरकार नहीं बदल सकी। अवसरवादी आदमी की परिभाषा होती है कि वह पानी में गिर जाए तो उसी में नहाने लगे, जिसके लिए भारत में पुरानी कहावत है कि फिसल गए तो हर हर गंगे! उसी अंदाज में भाजपा झारखंड सरकार को नहीं बदल सकी तो अमित शाह ने कहा कि लोकतंत्र में ऐसा नहीं कर सकते।

इसके साथ ही उन्होंने बाबूलाल मरांडी को कठघरे में भी खड़ा कर दिया। उन्होंने कहा कि बाबूलाल मरांडी चाहते थे कि सरकार को बदल दिया जाए। यह किसी से छिपा नहीं है कि मरांडी जब से भाजपा में वापस लौटे और उनको विधायक दल का नेता बनाया गया तब से वे और उनकी टीम इस काम में लगे थे कि किसी तरह से हेमंत सोरेन की सरकार को हटा कर भाजपा की सरकार बनाई जाए। इसमें झारखंड से बाहर की ताकतें भी सक्रिय रहीं, लेकिन किसी न किसी वजह से कामयाबी नहीं मिली।

ऊपर से भाजपा के प्रदेश नेताओं के प्रयासों ने राज्य सरकार को अलर्ट कर दिया। बीच में एक समय ऐसा भी आया, जब हेमंत सोरेन को झारखंड मुक्ति मोर्चा और कांग्रेस के विधायकों को छत्तीसगढ़ के रिसोर्ट में ले जाकर रखना पड़ा था। उनकी सीआईडी टीम और राजनीतिक तंत्र इतना अलर्ट था कि कांग्रेस के तीन विधायकों को कथित तौर पर भाजपा से पैसा लेने के बाद पुलिस से पकड़वा दिया। इस काम में ममता बनर्जी ने उनकी मदद की। उनकी सरकार बदलने का प्रयास विफल होता गया और इस बीच समय निकल गया। अब लोकसभा चुनाव में डेढ़ साल से कम समय है और विधानसभा चुनाव में भी दो साल से कम समय है। ऐसे में सरकार गिराना भाजपा को फायदे का सौदा नहीं लग रहा है।

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