economy crisis

  • धन किसका, कर्ज कहां?

    आबादी का छोटा-सा जो हिस्सा वित्तीय अर्थव्यवस्था से जुड़ा है, उसकी चमक बढ़ी है। मगर विषमता इतनी तेजी से बढ़ी है कि वित्तीय सेवाएं देने वाली जर्मन मूल की बहुराष्ट्रीय कंपनी- एलायंज ग्रुप- ने भी चेतावनी दी है। पहले खबर का अच्छा पहलूः 2024 में भारतीय घरों की औसत आमदनी बढ़ने की रफ्तार और तेज हुई। कुल मिलाकर 14.5 प्रतिशत वृद्धि दर्ज की गई। धन वृद्धि में सबसे बड़ा योगदान प्रतिभूतियों में निवेश का रहा। कुल बढ़ी आय में प्रतिभूतियों से हुई आमदनी का हिस्सा 28.7 प्रतिशत था। बीमा और पेंशन फंड में निवेश से हुई आय का हिस्सा 19.7...

  • समस्या की जड़ जहां

    आय कर और जीएसटी दरों में कटौती जैसे कदमों से लोगों को बेशक कुछ राहत मिली है, लेकिन असल सवाल है कि क्या इससे लोगों के हाथ में इतना पैसा बचने लगेगा, जिसे खर्च करने के वे उपाय ढूंढने लगेंगे? भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन ने यह पहली बार नहीं कहा है, मगर जीएसटी ढांचे में बदलाव को लेकर उम्मीद जगाने का अभी जैसा माहौल है, उसके बीच ये बात खास प्रासंगिक हो जाती है। उन्होंने कहा कि कॉरपोरेट सेक्टर में मुनाफा जिस दर से बढ़ा है, कर्मचारियों की तनख्वाह में उससे काफी कम वृद्धि हुई...

  • विषमता पर नई रोशनी

    संपन्न परिवारों की आमदनी में एक फीसदी बढ़ोतरी होने पर औसतन आय एवं धन के अनुपात में 0.6 प्रतिशत की कमी आती है। यानी लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा बिना टैक्स चुकाए धन में तब्दील कर लिया जाता है। भारत के धनी वर्ग की आमदनी उससे कहीं ज्यादा है, जिसकी घोषणा वे अपने टैक्स रिटर्न्स में करते हैं। अतिरिक्त आमदनी अक्सर उनकी ऐसी परिसंपत्तियों में तब्दील होती है, जिन पर भारत में टैक्स नहीं लगता। यह संकेत है कि भारत में आर्थिक विषमता असल में अभी के अनुमान से कहीं ज्यादा है। एक शोध ने इस बारे में नए तथ्य उपलब्ध...

  • कर्ज लेकर दाल-रोटी चला रहे हैं लोग

    कर्ज लेकर घी पीने का एक दर्शन भारत में रहा है। चार्वाक ऋषि को इस दर्शन का प्रणेता माना जाता है। हालांकि यह दर्शन ज्यादा लोकप्रिय नहीं हुआ क्योंकि कर्ज लेकर घी पीने वालों को भारतीय समाज में फ्रॉड माना जाता है। इसलिए यह काम बड़े लोगों खासकर उद्योगपतियों, कारोबारियों, नेताओं आदि के लिए छोड़ दिया गया। मध्यवर्ग अपनी मोरालिटी में इससे दूर रहा तो निचले तबके को इसका मौका ही नहीं मिला। लेकिन अब देश में एक नया दर्शन स्थापित हो रहा है। कर्ज लेकर दाल-रोटी चलाने का। नोटबंदी, जीएसटी और केंद्र सरकार की अन्य आर्थिक नीतियों के साथ...

  • यही यक्ष प्रश्न है

    “भारत में ऐसी मध्यम- आकार की कंपनियां पर्याप्त संख्या में नहीं हैं, जो अपने को बड़ी कंपनी बना सकने की स्थिति में हों, जबकि एमएसएमई का विकास विकसित भारत का लक्ष्य हासिल करने के लिए यह निर्णायक महत्त्व का है।” नीति आयोग के सीईओ बीवीआर सुब्रह्मण्यम की इस टिप्पणी पर ध्यान दीजिएः ‘कभी-कभी जब मैं भारतीय अर्थव्यवस्था के बारे में सोचता हूं, तो मुझे चिंता होती है। हमारे यहां बड़ी संख्या में बड़ी कंपनियां हैं। जबकि मझौली कंपनियों की संख्या बड़ी कंपनियों से भी कम है। वैसी स्थिति में आर्थिक वृद्धि कहां से हासिल होगी? यह स्थिति संस्थागत, ढांचागत रूप...

  • आर्थिक तस्वीर सुधर नहीं रही है

    Economy crisis Modi government: नए साल के पहले दिन केंद्र सरकार ने वस्तु व सेवा कर यानी जीएसटी कलेक्शन का आंकड़ा पेश किया। इसके मुताबिक दिसंबर में सरकार को 1.77 लाख करोड़ रुपए का राजस्व मिला। यह एक महीने पहले यानी नवंबर के मुकाबले पांच हजार करोड़ रुपए कम है। नवंबर में सरकार को 1.82 लाख करोड़ रुपए का राजस्व मिला था। नवंबर का आंकड़ा भी उससे पहले के तीन सबसे ज्यादा राजस्व संग्रह के आंकड़े से कम था, जबकि वह अक्टूबर के त्योहार वाले महीने का संग्रह था। उससे पहले जून से सितंबर की तिमाही का आंकड़ा सबसे सामने...

  • भारतीय मध्य वर्ग का ऐसे ढहना!

    भारत का शहरी मध्य वर्ग मुसीबत में है।  आम घरों का बजट बिगड़ गया है। गुजरी आधी सदी में इतनी खराब हालत पहले कभी नहीं हुई। पिछले चार साल में रोजमर्रा के उपयोग वाली लगभग हर जरूरी चीज की कीमत कम-से-कम एक चौथाई बढ़ चुकी है।।।। यह परिघटना पूरी भारतीय अर्थव्यवस्था को चपेट में ले रही है। और इसी कारण है कि अभी कॉरपोरेट्स के दायरे में हाय-तौबा मची हुई है। भारत में मध्य वर्ग सिकुड़ रहा है, ये तथ्य अब देश की मार्केट एजेंसियां और कॉरपोरेट सेक्टर भी बताने लगा है। सिर्फ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, उनकी सरकार और उनकी...

  • देश की सेहत और शेयर बाजार!

    Economy crisis, नरेंद्र मोदी के राज में मध्यवर्ग की संख्या और शेयर बाजार की तेजी का मामला पहेली जैसा है। एक संस्था (The People Research on India's Consumer Economy- PRICE) ने मध्यवर्ग की ऐसी परिभाषा दी है कि वह मध्यवर्ग समझ ही नहीं आएगा। प्रतिमाह नौ हजार रुपए का वेतनभोगी भी मध्य वर्ग में तो 54 हजार रुपए प्रतिमाह की कमाई वाला भी मध्यवर्ग में! सोचें, नौ हजार बनाम 54 हजार रुपए प्रतिमाह के फर्क पर। ऐसे ही 17 डॉलर से 100 डॉलर (1428 रुपए बनाम 84 सौ) प्रतिदिन की कमाई के लोगों के मध्यवर्ग की परिभाषा है। कोई तुक...

  • रिपोर्ट अनेक, संकेत एक

    Economy crisis: देहाती इलाकों में कर्ज के बोझ तले दबे परिवारों की संख्या में साढ़े चार प्रतिशत इजाफा हुआ है। 2016-17 के सर्वे के दौरान ऐसे परिवारों की संख्या 47.40 प्रतिशत थी, जो ताजा सर्वे के समय 52 फीसदी हो चुकी थी। also read: KKR की बागडोर अब श्रेयस अय्यर की जगह इस खिलाड़ी के हाथ में…नहीं होगा यकीन श्रमिक वर्ग की बढ़ती रही दुर्दशा एक और सरकारी संस्था की रिपोर्ट ने श्रमिक वर्ग की बढ़ती रही दुर्दशा पर रोशनी डाली है। राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण बैंक (नाबार्ड) के अखिल भारतीय ग्रामीण वित्तीय समावेशन सर्वे (एनएएफआईएस) 2021-22 के दौरान पाया गया...

  • चमक पर ग्रहण क्यों?

    वित्तीय बाजारों की चमक ही एकमात्र पहलू है, जिस पर भारत के आर्थिक उदय का सारा कथानक टिका हुआ है। वरना, निवेश-उत्पादन-वितरण की वास्तविक अर्थव्यवस्था किसी कोण से चमकती नजर नहीं आती। अब वित्तीय बाजारों पर भी ग्रहण के संकेत हैं। अक्टूबर में विदेशी पोर्टपोलियो निवेशकों (एफपीआईज) ने भारतीय बाजारों से लगभग 94,000 करोड़ रुपये निकाल लिए। यह अभूतपूर्व है। इसके पहले किसी एक महीने में एफपीआईज ने इतनी बड़ी निकासी नहीं की थी। कोरोना महामारी ने जब दस्तक दी थी, तब मार्च 2020 में इन निवेशकों ने 61,973 करोड़ रुपये निकाले थे, जो अब तक का रिकॉर्ड था। ताजा...

  • आंकड़ों के आईने में

    कृषि पर रोजगार की निर्भरता घटना विकास की आम प्रक्रिया का हिस्सा है। उच्च शिक्षा में ऊंची भागीदारी और कंप्यूटर का अधिक उपयोग आज विकास के मूलभूत स्तंभ हैं। इन तीनों पैमानों पर कमजोर सूरत के साथ भारत आखिर कहां पहुंच सकता है? हाल में जारी आवधिक श्रम शक्ति सर्वेक्षण (पीएलएफएस) रिपोर्ट से यह चिंताजनक आंकड़ा सामने आया कि भारत में श्रमिकों का विपरीत विस्थापन हो रहा है। यानी बड़ी संख्या में मजदूर गैर-कृषि क्षेत्रों से वापस कृषि क्षेत्र में चले गए हैं। भारत सरकार की इस सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक 2018-19 में देश में 42.5 प्रतिशत श्रमिक कृषि क्षेत्र...

  • वित्तीयकृत अर्थव्यवस्था में

    शेयर बाजारों में गिरावट है। उस समय, जब लिस्टेड इक्विटी मार्केट में कुल निवेश के बीच घरेलू सेक्टर का हिस्सा 21.5 प्रतिशत तक पहुंच गया है। यह बड़े बाजारों के बीच अमेरिका के बाद घरेलू सेक्टर की सबसे ऊंची हिस्सेदारी है। पिछला हफ्ता भारत के शेयर बाजारों में भारी गिरावट का रहा। वजह पश्चिम एशिया में युद्ध के गंभीर होते हालात और चीन में दिए गए प्रोत्साहन पैकेज को बताया गया है। आकलनों के मुताबिक चीन में ज्यादा मुनाफे की संभावना देखते हुए विदेशी निवेशक वहां लगाने के लिए भारतीय बाजारों से पैसा निकाल रहे हैं। चूंकि उपरोक्त दोनों वजहें...

  • सच बोलने की चुनौती

    अब आवश्यकता देश की बहुसंख्यक जनता की वास्तविक स्थिति पर सार्वजनिक बहस की है, ताकि एक खुशहाल समाज बनाने की तरफ बढ़ा जा सके। वरना, वे हालात और गंभीर होंगे, जिनकी एक झलक चुनाव अभियान के दौरान देखने को मिली है। पिछले दस साल में भारत के लोगों की बढ़ी मुसीबत का प्रमुख कारण उनसे बोला गया झूठ या अर्धसत्य है। खासकर ऐसा आर्थिक मामलों में हुआ है। आर्थिक आंकड़ों को उनके पूरे संदर्भ में पेश करने के बजाय उनके भीतर से चमकती सूचनाओं को चुन कर इस तरह बताया गया है, मानों सबकी जिंदगी बेहतर हो रही हो। अभी...

  • बढ़ रही है बदहाली

    अधिकांश लोगों के लिए उपभोग और आय के अनुपात में अपेक्षित सुधार नहीं हो रहा है। कोरोना काल की तुलना में सिर्फ सबसे ऊपरी दस फीसदी आबादी के मामले में यह अनुपात उल्लेखनीय रूप से बेहतर हुआ है। सरकार के ताजा आर्थिक आंकड़ों से सामने आई मुख्य सूचना यह है कि खाद्य पदार्थों के दाम अप्रैल में तेजी से बढ़े। लेकिन सरकारी बयान में ये बात कहीं नीचे बताई गई, यह बताने के बाद कि बीते महीने खुदरा महंगाई दर में गिरावट दर्ज हुई। मार्च में खुदरा महंगाई दर 4.85 फीसदी थी, जो अप्रैल में 4.83 प्रतिशत पर आ गई।...

  • विषमता की ऐसी खाई

    भारत में घरेलू कर्ज जीडीपी के 40 प्रतिशत से भी ज्यादा हो गया है। यह नया रिकॉर्ड है। साथ ही यह अनुमान लगाया गया है कि आम घरों की बचत का स्तर जीडीपी के पांच प्रतिशत से भी नीचे चला गया है। भारत के शेयर बाजार का मूल्य सोमवार को चार लाख करोड़ रुपए को पार कर गया। यह नया रिकॉर्ड है। मंगलवार सुबह अखबारों में यह खबर प्रमुखता से छपी। और उसी रोज यह खबर भी आई कि भारत में घरेलू कर्ज जीडीपी के 40 प्रतिशत से भी ज्यादा हो गया है। यह भी नया रिकॉर्ड है। साथ ही...

  • मुश्किल में एमएमसीजी क्षेत्र

    हिंदुस्तान लीवर से लेकर आईटीसी, मेरिको, बजाज कंज्यूमर केयर और ज्योति लैब्स तक को अगले सितंबर तक बिक्री बढ़ने की संभावना नजर नहीं आ रही है। इस वित्त वर्ष की तीसरी तिमाही के नतीजों ने इन कंपनियों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। Economy crisis यह भी पढ़ें: भाजपा के दक्कन अभियान की चुनौतियां आम उपभोग के सामान बनाने वाली (एफएमसीजी) लगभग सभी कंपनियां इस निष्कर्ष पर हैं कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था की बदहाली के कारण फिलहाल उनके कारोबार की संभावनाएं मद्धम हैं। हिंदुस्तान लीवर से लेकर आईटीसी, मेरिको, बजाज कंज्यूमर केयर और ज्योति लैब्स तक को अगले सितंबर तक...

  • सरकारी दावों के विपरीत

    अगर आम जन की वास्तविक आय नहीं बढ़ती है, तो उनका उपभोग घटता है, जिसका असर बाजार में मांग पर पड़ता है और अंततः यह स्थिति कारोबार जगत को प्रभावित करती है। अब ऐसा होने के साफ संकेत मिल रहे हैं। भारत में आर्थिक वृद्धि दर के लाभ आम जन तक नहीं पहुंच रहे हैं, इस बारे में तो पहले से पर्याप्त आंकड़े मौजूद रहे हैं। लेकिन अब व्यापार जगत का कारोबार भी मद्धम हो चला है, यह रोज-ब-रोज जाहिर हो रहा है। वैसे देखा जाए, तो इन दोनों परिघटनाओं में सीधा संबंध है। अगर आम जन की वास्तविक आय...

  • तमाम शोर के बावजूद

    ऐसे आंकड़े सामने आए हैं, जो सवाल उठाते हैं कि जिस तीव्रतम गति से आगे बढ़ रही अर्थव्यवस्था का शोर है, उसका संबंध भारतीय आबादी के किस और कितने बड़े हिस्से से है? और जो बाकी आबादी है, उसका इस अर्थव्यवस्था में कितना दांव है? शोर यह है कि भारत विश्व अर्थव्यवस्था का अगला हॉट स्पॉट है। चीन के गिरने और भारत के उठने की कहानियों से मीडिया पटा हुआ है। जबकि उसी समय हर कुछ दिन पर ऐसी सच्चाइयां सामने आती हैं, तो हमारा सामना सिक्के के दूसरे पहलू से करा जाती हैं। ऐसे आंकड़े सामने आते हैं, जो...

  • अर्थव्यवस्था की असल कहानी

    अर्थव्यवस्था की गुलाबी तस्वीर पेश करने की तमाम कोशिशों के बावजूद अखबारी सुर्खियां लगभग रोज ही असल कहानी बता रही हैं। बिगड़ते हालात का कारण हैः अनिश्चित आर्थिक माहौल, ऊंची महंगाई, बढ़ती बेरोजगारी, औसत वेतन में कम बढ़ोतरी और अर्थव्यवस्था की (अंग्रेजी के) के अक्षर जैसी रिकवरी। भारतीय अर्थव्यवस्था की खुशहाल कहानी प्रचारित करने की कोशिशें अपनी जगह हैं, लेकिन इनके बीच ही देश के आम जन का असली हाल का इजहार मुख्यधारा मीडिया की सुर्खियों से भी हो जाता है। कोई ऐसा दिन नहीं जाता, जब अखबारों में ऐसी कोई खबर देखने को ना मिले, जिनसे देश में घटती...

  • ब्रिटेन की ये बदहाली

    आखिर ब्रिटेन में सरकारों ने ऐसी क्या नीतियां या रास्ते अपनाए, जिससे वहां हड़तालों का अटूट दौर चलने और अधिक से अधिक लोगों के फूड बैंकों पर निर्भर होने की नौबत आई, यह विचारणीय प्रश्न है। यह सुनना आश्चर्यजनक लगता है कि जिस देश के साम्राज्य में कभी सूरज नहीं डूबता था, वहां के लोग आज दाने-दाने के लिए मोहताज हो रहे हैँ। आखिर ब्रिटेन में सरकारों ने ऐसी क्या नीतियां या रास्ते अपनाए, जिससे वहां हड़तालों का अटूट दौर चलने और अधिक से अधिक लोगों के फूड बैंकों पर निर्भर होने की नौबत आई, यह विचारणीय प्रश्न है। दरअसल,...

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