• ESA ने जारी की आश्चर्यजनक तस्वीर: मंगल की जमीन पर काली मकड़‍ियां

    यूरोपियन स्पेस एजेंसी (ESA) ने मंगल ग्रह की सतह से एक नया फोटो जारी किया हैं। पहली नजर में देखने पर ऐसा लगता हैं, कि काली मकड़‍ियों ने लाल ग्रह पर बस्तियां बना ली हों। दुनियाभर के वैज्ञानिक मंगल ग्रह पर जीवन की संभावनाएं तलाश कर रहे हैं। यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ESA) भी उनमें से एक हैं। ESA ने लाल ग्रह की सतह का एक ऐसा फोटो लिया हैं जिसे देखने वाले भी दंग रह गए हैं। पहली बार इस तस्वीर को देखने पर ऐसा लगता हैं, की मानों हजारों काली मकड़‍ियां जमीन पर मौजूद हों। यह तस्वीर मंगल ग्रह...

  • Current affairs: भारत रत्न अवॉर्ड पाने वालों में दो पूर्व प्रधानमंत्री भी, हिंद महासागर संस्करण सम्मेलन में शामिल होगा भारत

    Current affairs of 10 February 2024।  भारत के इतिहास में 10 फरवरी का दिन खास है क्योंकि इस दिन कई ऐसी घटनाएं हुई थी जिन्होंने भारतीय इतिहास के पन्नों में एक अमिट छाप छोड़ दी। [caption id="attachment_446276" align="aligncenter" width="500"] History of the Day 10th February[/caption] 1-10 फरवरी 1952 (10 February History) का दिन भारतीय लोकतंत्र का एक ऐतिहासिक दिन था इस दिन आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस ने लोकसभा (Lok Sabha Elections) की 489 में से 249 सीटें जीतकर बहुमत हासिल किया। इन चुनावों को भारत में लोकतंत्र (Democracy) की स्थापना की...

  • प्रिगोझिनः पुतिन का भस्मासुर?

    दुनिया में कयास है कि व्लादिमीर पुतिन की सत्ता पर पकड़ कमजोर हो रही है। काश यह सच हो जाए और जल्द से जल्द। और इसकी वजह का जिम्मेवार शख्श कौन?  नाम है येवगेनी प्रिगोझिन।इसे पुतिन ने ही बनाया। लेकिन दुनिया यह जाने हुए नहीं थी। इसको दुनिया ने 24 घंटे में जाना। लोगों में अभी भी कौतुहल है कि यह  व्यक्ति पुतिन का भस्मासुर तो साबित नहीं होगा! तो कौन है येवगेनी प्रिगोझिन? एक दुस्साहसी वह व्यक्ति जो अपने निर्माता के खिलाफ ही खड़ा हो गया - ठीक भस्मासुर की तरह। प्रिगोझिन के जन्म के समय सोवियत संघ अस्तित्व...

  • अब किताबें और लेखक भी साफ्ट टारगेट!

    ‘ईट, प्ले, लव’ –यह एक किताब का नाम है और यदि इसे आपने नहीं सुना है तो शायद आप किसी सुदूर द्वीप में अकेले रहते हैं या फिर आप उस पीढ़ी से हैं जिसने अपनी जिंदगी के सारे मसले सुलझा लिए हैं और अब दुनिया में क्या हो रहा है उससे कोई लेना-देना नहीं है। परंतु वाय और जेड पीढ़ी के कई लोगों को लगता है कि यह पुस्तक उन्हें ही संबोधित करती है।उनके लिए है।  अमरीकी लेखिका एलीजाबेथ गिल्बर्ट की यह संस्मरणात्मक किताब, तलाक के बाद की जिंदगी पर लिखी गई है। इसमें भावुकता है और मनोरंजन भी। इसमें...

  • टाईटन का फितूरी रोमांच!

    टाईटेनिक विचित्र जुनून का नाम है। 111 साल पहले समुद्र में डुबे टाइटैनिकके प्रति कौतुकता जुनून की हद तक है।इसके एक सदी से भी ज्यादा समय से पड़े अवशेषों में लोगों की इतनी रूचि, उत्सुकता और आकर्षण है कि मुझे तो समझ नहीं आता कि ऐसा क्यों है? सवाल है क्या हमें जिंदगी और मौत के बीच झूलते हुए सन् 1912 में हुई एक त्रासदी के अवशेषों की झलक केवल इसलिए देखनी चाहिए क्योंकि हमें खतरों से खेलना है, क्योंकि हमें रोमांच चाहिए? इसी जुनून ने पिछले हफ्ते पांच लोगों की जान ले ली। इस दुर्घटना के बाद ‘सपनों के...

  • विपक्ष के ब्लैक शीप

    पटना बैठक से यह साफ हो गया कि विपक्ष का कोई समानार्थी शब्द नहीं है। ना ही यह तब तक सार्थक होगा, जब तक नीतिगत विकल्प के साथ भाजपा विरोधी पार्टियां एकजुट होंगी। फिलहाल, सब कुछ ऐड-हॉक है, जिसमें केजरीवाल जैसे जोखिम अंतर्निहित होंगे।  अरविंद केजरीवाल की विपक्ष की पटना बैठक का माहौल बिगाड़ने के मकसद से वहां गए थे। इसका संकेत उनकी पार्टी पहले से ही दे रही थी। पटना बैठक से एक दिन पहले तो उसने दिल्ली अध्यादेश के मुद्दे पर ना सिर्फ कांग्रेस पर भाजपा के साथ मिलीभगत करने का सार्वजनिक आरोप लगाया, बल्कि यह साफ कर...

  • कटिंग-एज तो नहीं

    रणनीतिक क्षेत्र में भारत में अमेरिकी नौसैनिक बेड़ों को “मरम्मत की सुविधा” देने पर बनी सहमति को एक अहम घटना समझा जाएगा। इसका अर्थ है कि भारत ने अमेरिकी सेना के अभियानों में अपनी जमीन का इस्तेमाल करने की इजाजत देने की शुरुआत कर दी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमेरिका दौरे का प्रतीकात्मक या मोदी के लिए राजनीतिक महत्त्व चाहे जो हो, लेकिन इससे भारत को तकनीक या आर्थिक क्षेत्र में कोई लाभ हुआ, यह कहने का कोई ठोस आधार नहीं है। रणनीतिक क्षेत्र में भारत में अमेरिकी नौसैनिक बेड़ों को “मरम्मत की सुविधा” देने पर सहमति बनी, उसे...

  • 2024 में ब्रिटेन की भी परीक्षा!

    क्या बोरिस जॉनसन का अब भी कोई राजनैतिक भविष्य है? क्या इंग्लैंड के इस पूर्व प्रधानमंत्री की कभी सत्ता में वापसी होगी? क्या किस्मत उनका वैसे ही साथ देगी जैसा तमाम आरोपों और कानूनी मामलों में उलझे हुए उनके राजनैतिक जुड़वां डोनाल्ड ट्रंप का दे रही है? पार्टीगेट कांड से बोरिस जॉनसन को गहरा धक्का लगा है। इस हद तक कि ऐसा लग रहा है मानों वे अपने होशोहवास खो चुके हैं। हालात यह है कि जो भी जॉनसन को समझदार कहेंगा तो ब्रिटिश मीडिया भड़क जाएगा! विशेषाधिकार समिति की रिपोर्ट आने के बाद जॉनसन ने हाउस ऑफ़ कॉमन्स से...

  • आजादी की हसरत लिए डुबते लोग!

    दूर के ढोल के अलावा, दूर की घास भी अक्सर ज्यादा सुहावनी लगती है, खासकर तब जब आप पश्चिम की ओर देख रहे हों। वह चमकदार लगती है। वह खुशनुमा लगती है और लगता है मानों वो आपको बुला रही हो। उस तरफ का घास का मैदान बड़ा और खुला-खुला सा लगता है। जाहिर है इस खुलेपन में आज़ादी शामिल होती है।‘आज़ादी’ – वाह, सोचे, इस शब्द पर। कितनी तरह के मतलब हैं?‘आजादी’ का शब्द उम्मीद जगाता है, मोहित करता है।तानाशाही, शैतानी सरकारों से आजादी, कठोर कानूनों से आजादी, असुरक्षा से आजादी, डर से आजादी तथा खुलकर सांस लेने की...

  • अमेरिका क्या चीन को देगा बराबरी का दर्जा?

    अमरीकी विदेश मंत्री एंटोनी ब्लिंकन चीन की यात्रा पर हैं और पूरी दुनिया की इस पर निगाह है। पिछले पांच सालों में चीन की यात्रा करने वाले वे पहले अमेरिकी विदेश मंत्री हैं। उनकी यात्रा चीनी जासूसी गुब्बारों के विवाद के छह महीने बाद हो रही है। गुब्बारों के चलते उनकी यात्रा अचानक स्थगित हो गई थी।इससे पहले से ही चले आ रहे तनावपूर्ण रिश्ते और खराब हो गए थे।दोनों देशों में व्यापार, टेक्नोलॉजी, क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे कई मसले हैंजिनको लेकर दोनों सुपर अर्थव्यवस्थाओं के बीच खटपट है। बीजिंग और वाशिंगटन में बैठे ज्ञानी इस यात्रा से किसी बड़ी सफलता...

  • गलवान के तीन साल

    अनेक जानकार मानते हैं कि चीन के मामले में नेहरू सरकार की कुछ अस्थिर नीतियां 1962 में भारत को बहुत महंगी पड़ी थीं। गलवान कांड के तीन साल बाद अगर वैसी ही आशंका मंडरा रही है, तो वह बेवजह नहीं है।  गलवान घाटी की दुर्भाग्यपूर्ण और दुखद घटना की तीसरी बरसी एक उचित अवसर है, जब चीन के मामले में भारत की नीति का एक ठोस आकलन किया जाए। भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच हुई उस हिंसक झड़प के तीन साल गुरुवार को पूरे हुए। इस बीच दोनों देशों के संबंध में तनाव बना रहा है और कई बार...

  • डाटा लीक की हकीकत क्या है?

    आज के डिजिटल जमाने में डाटा लीक होना, सुरक्षित से सुरक्षित सर्वर का हैक हो जाना या पोर्टल में घुसपैठ होना कोई नई या बड़ी बात नहीं है। दुनिया के सबसे विकसित डिजिटल सुरक्षा वाले देशों में भी ऐसा होता रहा है। यह हकीकत है कि सुरक्षा प्रबंधन का काम देखने वाले तकनीकी विशेषज्ञ और हैकर्स में तू डाल डाल, मैं पात पात वाला खेल चल रहा है। सुरक्षा के विशेषज्ञ एक फायरवाल तैयार करते हैं और हैकर्स उसमें सेंध लगाने के रास्ते तलाशते हैं। यह सतत चलने वाली प्रक्रिया है। इसमें कुछ भी स्थायी नहीं है। अगर कोई सरकार...

  • मणिपुर की चिंता करनी चाहिए

    पूर्वोत्तर के राज्यों की खबरें राष्ट्रीय मीडिया में तभी आती हैं, जब वहां कोई हिंसा होती है, अलगाववादी आंदोलन जोर पकड़ता है या चुनाव होते हैं। इसके अलावा मुख्यधारा का मीडिया पूर्वोत्तर के घटनाक्रम से तटस्थ बना रहता है। पिछले एक महीने में कई बार मणिपुर मुख्यधारा की राष्ट्रीय मीडिया में सुर्खियों में रहा तो उसका कारण यह था कि वहां हिंसा भड़की थी। कुकी और मैती समुदाय के बीच जातीय हिंसा चल रही है, जिसमें अब तक एक सौ से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं। यह हैरान करने वाली बात है कि तीन मई को हिंसा भड़कने के...

  • कांग्रेस की गारंटियां हो रही लागू! क्या जवाब है?

    कर्नाटक में सरकार बनते ही पहली कैबिनेट बैठक में कांग्रेस की सरकार ने चुनाव में किए गए पांच वादों को पूरा करने का फैसला किया। दूसरी कैबिनेट में इस पर अमल की तारीखें तय हुईं। कांग्रेस ने चुनाव के समय जो पांच गारंटियां दी थीं उनको कानून बनाने का ऐलान कर दिया गया है। कर्नाटक में दी गई गारंटियों की तर्ज पर कांग्रेस ने अभी से हरियाणा और मध्य प्रदेश में मुफ्त की वस्तुएं और सेवाएं देने की घोषणा शुरू कर दी है। राजस्थान में जहां उसकी सरकार है वहां इन गारंटियों पर अमल किया जा रहा है। इसी तरह...

  • हर विरोध को मोदी सरकार क्यों प्रतिष्ठा का सवाल बनाती?

    लोकतंत्र हर पांच साल पर मतदान करने का नाम नहीं है और कोई भी देश सिर्फ इस आधार पर लोकतांत्रिक नहीं बनता है कि वहां चुनी हुई सरकार चल रही है। कई देशों में चुनी हुई सरकारों की तानाशाही चलती है तो कई देशों में तानाशाह भी चुनाव लड़ कर जीतते हैं। कई लोकतांत्रिक देश भारत की तरह गणतंत्र नहीं हैं लेकिन राजशाही के बावजूद उन देशों में शानदार लोकतंत्र काम करता है। यह जरूर है कि लोकतंत्र स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव के सहारे बनता है लेकिन उसके साथ साथ संवैधानिक संस्थाओं और सरकारी एजेंसियों की स्वतंत्रता व निष्पक्षता सुनिश्चित...

  • कांग्रेस लौटी धर्मनिरपेक्षता के एजेंडे में!

    कांग्रेस पार्टी धर्मनिरपेक्षता के मसले पर दुविधा में थी। आजादी के बाद से वह जिस किस्म की धर्मनिरपेक्षता की प्रैक्टिस कर रही थी उसे लेकर वह संशय में थी। 2014 के लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद उसका विश्लेषण करने के लिए एके एंटनी की अध्यक्षता में जो कमेटी बनी थी उसकी रिपोर्ट ने कांग्रेस को बदलने का रास्ता दिखाया था। एंटनी कमेटी ने कहा था कि कांग्रेस का मुस्लिमपरस्त दिखना या उस रूप में ब्रांड होना पार्टी के लिए घातक हो गया। उसके बाद ही राहुल को मोदी और कांग्रेस को भाजपा बनाने का अभियान शुरू हुआ था।...

  • हादसों से सबक नहीं लेतीं सरकारें

    ओडिशा के बालासोर में भयंकर ट्रेन हादसे के बाद घनघोर शोक और निराशा के समय में भी एक समूह ऐसा है, जो यह समझाने में लगा है कि ट्रेन हादसे पहले भी होते थे और अब प्रति लाख किलोमीटर की यात्रा में हादसों की संख्या पहले से बहुत कम हो गई है। इस तरह के किसी भी आंकड़े पर संशय नहीं किया जा सकता है। लेकिन क्या इससे ऐसा नहीं लगता है कि यह जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने का एक मजबूत आधार तैयार करने की कोशिश है? यह भी सही है कि किसी का इस्तीफा लेने से मरने वालों का...

  • मोदी को वोट के मूड का आधार क्या?

    केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के नौ साल पूरे होने के मौके पर कई तरह के सर्वेक्षण हुए, जिनसे मोदी सरकार की लोकप्रियता बरकरार रहने का निष्कर्ष जाहिर हुआ। यह भी बताया गया कि प्रधानमंत्री के लिए मोदी सबसे ज्यादा लोगों की पसंद हैं और अगर आज चुनाव हो तो उनको पिछली बार से कुछ ज्यादा वोट मिलेंगे। ध्यान रहे मोदी का लगातार दूसरा कार्यकाल पूरा होने वाला है। उससे पहले यदि देश में यह राय है तो यह सरकार की बड़ी सफलता है। हालांकि इन सर्वेक्षणों की गुणवत्ता और वस्तुनिष्ठता को लेकर उठने वाले सवाल अपनी जगह हैं। यह...

  • एमपी, एमएलए की ऐसे सदस्यता जाने लगी तो आगे क्या?

    समाजवादी पार्टी के दिग्गज नेता आजम खान की हेट स्पीच मामले में रिहाई ने विधायकों, सांसदों की आनन-फानन में सदस्यता समाप्त करने, उनकी सीटों को खाली घोषित करने और उपचुनाव कराने की जल्दी पर बड़ा सवाल खड़ा किया है। इस बारे में विधानमंडल और संसद के दोनों सदनों के पीठासीन अधिकारियों के साथ साथ चुनाव आयोग को भी गंभीरता से विचार करना चाहिए। निश्चित रूप से देश की सर्वोच्च अदालत को भी अपने 2013 के फैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए। क्योंकि इस पर अमल करने से ऐसी गलतियां होने की संभावना है, जिनका सुधार संभव ही नहीं है। आजम खान...

  • एकता दिखाने की नहीं बनाने की जरूरत

    जदयू के नेता और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के विपक्षी पार्टियों को एकजुट करने के प्रयास के तहत 12 जून को पटना में एक बड़ी बैठक होने वाली है। इसमें डेढ़ दर्जन विपक्षी पार्टियों के नेता जुटेंगे। दिन भर की बैठक होनी है, जिसमें अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव की तैयारियों पर चर्चा होगी। सवाल है कि इस कवायद से क्या हासिल होगा? खुद नीतीश कुमार की पार्टी का बिहार के बाहर कहीं अस्तित्व नहीं है और बिहार से बाहर किसी दूसरे राज्य में उनके लोकसभा चुनाव लड़ने की स्थिति नहीं है। वे जिन पार्टियों को बैठक के...

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