प्रधानमंत्री के साथ अर्थशास्त्रियों की बजट पूर्व बैठक में अर्थव्यवस्था की मुश्किलें खुल कर सामने आईं। अर्थशास्त्रियों ने ब्याज चुकाने की बढ़ी देनदारी, कमजोर होती घरेलू बचत, और सरकार के बढ़े पूंजीगत निवेश से आई दिक्कतों का जिक्र किया।
प्रधानमंत्री के साथ बजट पूर्व बैठक में उपस्थित अर्थशास्त्रियों ने अर्थव्यवस्था में पैदा हुई मुश्किलों का उल्लेख किया। उन्होंने ब्याज (और ऋण का मूलधन भी) चुकाने की बढ़ती देनदारी, कमजोर होती घरेलू बचत, और सरकार के बढ़े पूंजीगत निवेश के कारण निजी निवेश के सामने आई दिक्कतों का जिक्र किया। कहा कि पूंजीगत निवेश के लिए सरकार अधिक ऋण लेती है, तो निजी निवेशकों के लिए कर्ज महंगा हो जाता है। यह स्वस्थ स्थिति नहीं है। इस क्रम में सरकार पर कर्ज संबंधी देनदारी बढ़ती है। हाल यह है कि केंद्रीय बजट का एक चौथाई से ज्यादा हिस्सा ऋण एवं ब्याज चुकाने पर खर्च हो रहा है। बहरहाल, अर्थशास्त्रियों की बात मान कर सरकार पूंजीगत निवेश घटा दे, तो मौजूदा आर्थिक वृद्धि दर को बनाए रखना फिलहाल कठिन हो जाएगा।
निजी निवेश सिर्फ इसलिए नहीं कमजोर पड़ा है कि ऋण महंगा है। बल्कि बाजार में मांग ना होने के कारण निजी क्षेत्र अपनी मौजूदा क्षमता का भी उपयोग नहीं कर पा रहा, तो वह नया निवेश कहां करेगा? खुद अर्थशास्त्रियों ने उल्लेख किया कि घरेलू बचत गिरते हुए जीडीपी के लगभग सात प्रतिशत के बराबर पहुंच गई है। उन्होंने इसकी चर्चा विदेशी पूंजी निवेश को लेकर बढ़े अनिश्चय के संदर्भ में की। कहा कि इस बीच घरेलू बचत भी इतना घट गया है कि वह चालू खाते के दो फीसदी घाटे को पाटने में भी सक्षम नहीं है। मगर घरेलू बचत गिरने का एक दूसरा पहलू भी है।
यह संकेत है कि आम परिवारों का बजट दबाव में है। ऐसे में उपभोग एवं मांग में कैसे बढ़ोतरी होगी? यह नहीं हुआ, तो निजी निवेश की स्थितियां कैसे बनेंगी? तो कुल संकेत यह है कि अर्थव्यवस्था एक दुश्चक्र में फंस गई है। इसके बीच सरकार के लिए के लिए पूंजी निवेश घटाना एक जोखिम भरा कदम होगा। सामान्य स्थितियों में अर्थशास्त्रियों की ऋण एवं राजकोषीय घाटे के बीच संतुलन बनाने की सलाह उचित मानी जाती, मगर सवाल है कि मौजूदा हाल में क्या इस पर अमल करना व्यावहारिक होगा? वैसे सरकार ने इस चर्चा से क्या ग्रहण किया, यह तो अगले बजट से ही पता चलेगा।
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