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बेतुकेपन से हटा परदा

एसआईआर शुरू होने के पहले निर्वाचन आयुक्त ही अपने कागजात ठीक नहीं करवा पाए, तो आम नागरिक से ऐसी अपेक्षा का क्या तर्क हो सकता है? बहरहाल, बात सिर्फ एस.एस. संधू की नहीं है।

तमाम आपत्तियों और विपक्ष के सवालों को ताक पर कर जो निर्वाचन आयोग मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) करवा रहा है, उसके ही आयुक्त (एस.एस. संधू) को विसंगति का नोटिस मिलना जाहिर कर देता है कि इस पूरी प्रक्रिया की योजना कितने बेतुके ढंग से बनाई गई। एसआईआर शुरू होने के पहले निर्वाचन आयुक्त अपने कागजात ठीक नहीं करवा पाए, तो आम नागरिक से ऐसी अपेक्षा का क्या तर्क हो सकता है? बहरहाल, बात सिर्फ संधू की नहीं है। ऐसे ही नोटिस विदेश मंत्री और विदेश सचिव, पूर्व उप-राष्ट्रपति, पूर्व उप प्रधानमंत्री, दिल्ली की मौजूदा और पूर्व मुख्यमंत्री, कई मशहूर वकीलों, सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश, पूर्व सेनाध्यक्ष आदि जैसी अनगिनत शख्सियतों को भी मिले हैं। और यह सिर्फ राष्ट्रीय राजधानी की बात है, जहां 33 लाख से ज्यादा मतदाताओं को ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ (नाम, उम्र के मेल ना खाने) या ‘नो मैपिंग’ (2002 की पुरानी एसआईआर मतदाता सूची में नाम ना होने) के आधार पर नोटिस भेजे गए हैं।

बाकी राज्यों पर गौर करें, तो यह सूची लंबी ही होती जाती है! जब तक बात आम मतदाताओं की थी, तो ऐसे नोटिसों के बेतुकेपन पर चर्चा सुर्खियों में नहीं आई। लेकिन जब बात उच्च पदस्थ, मशहूर, और रसूखदार लोगों तक पहुंची है, तो निर्वाचन आयोग को सवालों से घेरा जाने लगा है। तब निर्वाचन आयोग भी स्पष्टीकरण जारी करने के लिए मजबूर हो रहा है। उसने कहा है कि ऑटो-जनरेटेड नोटिस का मतलब यह नहीं है कि मतदाता का नाम काट दिया गया है। उसके मुताबिक यह सॉफ्टवेयर संचालित प्रक्रिया है, जिसका मकसद डेटा अपडेट और 2002 के रिकॉर्ड से मौजूदा सूचनाओं को जोड़ना है। संबंधित मतदाता अपने आवश्यक दस्तावेज ब्लॉक स्तरीय अधिकारी को देकर अपना विवरण सही करवा सकते हैं। मगर, मतदाताओं पर यह बोझ डालना कैसे उचित है? क्या अधिकतम मतदाताओं को मतदान प्रक्रिया का हिस्सा बनाना आयोग का कर्त्तव्य नहीं है? रसूखदार लोगों के पास दस्तावेजी काम कराने का सहायक तंत्र होता है। उनकी बात तुरंत सुनी भी जाती है। लेकिन जिन करोड़ों मतदाताओं के नाम प्रक्रिया के बेतुकेपन के कारण कटे, उन्हें उनकी मानसिक परेशानियों से कौन निकालेगा?

By NI Editorial

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