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बढ़ने लगी है बेचैनी

शेयर बाजारों में गिरावट सिर्फ किसी फौरी या भावनात्मक झटके का नतीजा नहीं है, बल्कि इसके कारण ढांचागत हैं। इसमें टिकाऊ सुधार तभी संभव है, अगर कंपनियों की वास्तविक आय और उत्पादकता में पर्याप्त वृद्धि हो।

शेयर सूचकांकों में गिरावट के बढ़ते रुख के कारण भारतीय निवेशकों में बेचैनी बढ़ रही है। पूरे सितंबर में शेयर बाजार का माहौल तनाव भरा रहा। सोमवार को सेंसेक्स 1,124 अंक और निफ्टी लगभग 1.6 प्रतिशत गिरा, जिस कारण बाजार पूंजीकरण में करीब आठ लाख करोड़ रुपये की कमी आई। हालांकि इसका प्रमुख कारण पश्चिम एशिया में लंबा खिचते युद्ध और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की महंगाई को बताया गया है, लेकिन विदेशी निवेशकों की जारी बिकवाली की वजह सिर्फ ये नहीं हैं। घरेलू कंपनियों के राजस्व पर बढ़ते दबाव और वास्तविकता से उनके अधिक ऊंचे मूल्यांकन की धारणा ने भी निवेशकों को हतोत्साहित किया है।

अगस्त में विदेशी निवेशकों ने लगभग 3.1 बिलियन डॉलर भारतीय शेयरों में लगाए थे, लेकिन सितंबर में उन्होंने फिर बड़े पैमाने पर बिकवाली शुरू कर दी। सितंबर में 27 तारीख तक विदेशी संस्थागत निवेशकों ने 18,531 करोड़ रुपये की शुद्ध बिक्री की। इस दौरान घरेलू संस्थागत निवेशकों ने साढ़े 52 हजार करोड़ रुपये लगाए, लेकिन विदेशी निवेशकों की बिकवाली के असर को वे सीमित नहीं रख पाए। तो संभवतः निवेशकों के घटते भरोसे का बड़ा कारण मूल्यांकन और वास्तविक कमाई के बीच फर्क ही है। हालिया गिरावटों के बावजूद ये धारणा बनी हुई है कि भारतीय इक्विटी का मूल्यांकन कई उभरते बाजारों से ऊंचा बना हुआ है।

इसका अर्थ है कि फिलहाल जारी गिरावट सिर्फ किसी फौरी या भावनात्मक झटके का नतीजा नहीं है, बल्कि इसके कारण ढांचागत हैं। इसमें टिकाऊ सुधार तभी संभव है, अगर कंपनियों की वास्तविक आय और उत्पादकता में पर्याप्त वृद्धि हो। फौरी वजहों में कच्चे तेल की महंगाई और रुपये की कीमत पर लगातार बना दबाव शामिल हैं। इसके अलावा अमेरिकी बॉन्ड पर मिलने वाले ब्याज दर में इजाफा, वैश्विक ब्याज दरें और भू-राजनीतिक तनाव के परिणाम भी सघन रूप लेते गए हैं। ऐसे में जीडीपी की ऊंची वृद्धि दर तथा अन्य सरकारी आंकड़े निवेशकों को आकर्षित करने में नाकाम रहे हैं। यह बड़ी चुनौती है, क्योंकि गुजरे वर्षों में भारतीय अर्थव्यवस्था का एकमात्र चमकता पक्ष शेयर सूचकांक ही रहे हैं। अब ये चमक रोज मद्धम पड़ती जा रही है।

By NI Editorial

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