चुनाव बहिष्कार एक पेचीदा सवाल है, जिस पर बहस तो ठीक है, लेकिन जल्दबादी में फैसला उचित नहीं होगा। चुनाव बहिष्कार जैसे चरम कदम पर सोचने के पहले तमाम संभव विकल्पों को आजमाना सही रास्ता होगा।
कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजित दीपके के विपक्ष से चुनाव बहिष्कार के आह्वान ने बहुत से लोगों के मन में चल रही इस बात को उनकी ज़ुबान पर ला दिया है। दीपके का तर्क है कि जिस तरह से देश में चुनाव कराए जा रहे हैं, उसमें विपक्ष के लिए वैसे भी कोई गुंजाइश नहीं बची है। उनके मुताबिक जब खुद विपक्षी नेता अनेक चुनावों के बारे में मानते हैं कि उन्हें “चुरा” लिया गया, तो आगे “चोरी की संभावना” वाले चुनावों में भाग लेने का क्या मतलब है? क्या ऐसा करके विपक्ष “पहले से तय परिणाम” को वैधता प्रदान नहीं कर रहा है?
इस समय जो माहौल है, उसमें जनमत के बहुत बड़े हिस्से को इन बातों में दम नजर आता है। लेकिन एक दूसरी, उतनी ही मजबूत राय है कि देश में इतनी अधिक संख्या में पार्टियां हैं कि सबको बायकॉट के लिए राजी करना कठिन होगा। अगर इंडिया एलायंस सहमत हो भी जाता है, तो संभव है कि अनेक छोटे दल ‘विपक्ष का रोल’ अदा करने के लिए मैदान में बने रहें। बहिष्कार का एक और परिणाम होगा भाजपा की एकतरफा जीत सुनिश्चित होना, जिससे वह “मनमाने” विधायी पहल या संविधान संशोधन में सक्षम हो जाएगी। चूंकि जनता से लगातार जुड़ाव, उनके बीच पैठ, और उनकी गोलबंदी की सियासत खासकर विपक्षी दलों ने बहुत पहले से छोड़ रखी है, इसलिए बहिष्कार को तुरंत जन आंदोलन में तब्दील करने की उनकी क्षमता संदिग्ध है।
ऐसे में वैधता का सवाल कभी जन मुद्दा बना भी, तो उसमें काफी देर हो सकती है। फिर बांग्लादेश जैसे जिन देशों में प्रमुख विपक्षी दलों ने बहिष्कार का रास्ता चुना, वहां जो बाद में हुआ, वह कोई चमकती हुई मिसाल नहीं है। ऐसे में फिलहाल जनता के बीच जाकर दीर्घकालिक नजरिए से बुनियादी मुद्दों पर जागरूकता लाना एवं संगठन तैयार करना कहीं बेहतर रास्ता हो सकता है। कुल मिलाकर बहिष्कार एक पेचीदा सवाल है, जिस पर बहस तो ठीक है, लेकिन जल्दबादी में फैसला उचित नहीं होगा। चुनाव बहिष्कार जैसे चरम कदम पर सोचने के पहले तमाम संभव विकल्पों को आजमाना सही रास्ता होगा।
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