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संघीय टकराव के मोर्चे

परंपरा यही है कि अभिभाषण निर्वाचित सरकार तैयार करती है। राष्ट्रपति/ राज्यपाल सरकार के प्रतीकात्मक प्रमुख के तौर पर उसे पढ़ते भर हैं। लेकिन वर्तमान में लोकतंत्र और संघीय व्यवस्था के तहत ऐसे स्थापित कायदे तार-तार किए जा रहे हैं।

तमिलनाडु और केरल में मंगलवार को परोक्ष रूप से केंद्र और प्रत्यक्ष रूप से राज्य सरकार के बीच टकराव नए मुकाम पर पहुंचा। तमिलनाडु के राज्यपाल एन.आर. रवि ने विधानसभा के बजट सत्र की शुरुआत के मौके पर लगातार चौथी बार राज्य सरकार की तरफ से तैयार अभिभाषण को पढ़ने से इनकार कर दिया। तब मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने अभिभाषण को पढ़ा गया घोषित करने के लिए सदन में प्रस्ताव पारित कराया। उसके बाद एलान किया कि अभिभाषण पढ़ने की परंपरा खत्म कराने के लिए संविधान संशोधन कराना उनका अगला एजेंडा होगा। रवि ने आरोप लगाया कि राज्य सरकार ने अभिभाषण में बिना “साक्ष्य दिए और गुमराह करने वाले” कई दावे शामिल कर दिए हैं।

उधर केरल के राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर एक कदम और आगे गए। राज्य सरकार ने जो अभिभाषण तैयार किया था, उसके तीन पैराग्राफों में खुद से बदलाव कर दिया। इस तरह उन्होंने जो पढ़ा और सदन में अभिभाषण की जो प्रतियां बाटीं गईं, वो अलग-अलग थीं। तो मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने स्पीकर से उस प्रति को अनुमोदित करने कहा, जिसे कैबिनेट ने मंजूरी दी थी। परंपरा यही है कि अभिभाषण निर्वाचित सरकार तैयार करती है। राष्ट्रपति/ राज्यपाल सरकार के प्रतीकात्मक प्रमुख के तौर पर उसे पढ़ते भर हैं। लेकिन वर्तमान में लोकतंत्र और संघीय व्यवस्था के तहत ऐसे स्थापित कायदे तार-तार किए जा रहे हैं।

राज्यपाल संवैधानिक पद है। इसलिए राज्यपालों से सहज अपेक्षा होती है कि वे संवैधानिक भावना के अनुरूप कार्य करें। लेकिन गैर-भाजपा शासित राज्यों में उन्हें राज्य सरकारों पर नकेल कसे रहने का माध्यम बना दिया गया है। वे ना सिर्फ केंद्र के प्रतिनिधि की संवैधानिक भूमिका निभाते हैं, बल्कि अक्सर केंद्र की राजनीतिक मंशाओं को भी पूरा करते नजर आते हैं। इसका नतीजा संघीय व्यवस्था में बढ़ता हुआ तनाव है। दूसरा परिणाम राज्यपाल जैसे सम्मानित पद की खुली तौहीन के रूप में सामने आता है। अभिभाषण की परंपरा को खत्म कराने के मिशन में जुटने का तमिलनाडु के मुख्यमंत्री का एलान इसकी नई मिसाल है। ये प्रवृत्तियां चिंताजनक हैं। इन वजहों से संवैधानिक व्यवस्था के भविष्य को लेकर आशंकाएं गहराती जा रही हैं।

By NI Editorial

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