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“उचित समय” कब आएगा?

केंद्र ने स्पष्ट नहीं किया है कि सही समयसे उसका तात्पर्य क्या है और उसकी राय में इसके कब तक आने की संभावना है? उचित होगा कि जम्मू-कश्मीर का पूर्ण राज्य का दर्जा वापसी से संबंधित इस भ्रम को वह दूर करे।

उमर अब्दुल्ला की व्यग्रता समझी जा सकती है। वे पूर्ण बहुमत से निर्वाचित पार्टी के विधायक दल का नेता होने के नाते मुख्यमंत्री हैं, लेकिन जम्मू-कश्मीर के सामान्य प्रशासन में उनकी ज्यादा नहीं चलती। नरेंद्र मोदी सरकार ने केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर की स्थिति राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की सरकार जैसी बना रखी है, जहां सारे प्रमुख अधिकार उप-राज्यपाल के पास हैं। बहरहाल, अंतर यह है कि जम्मू-कश्मीर का पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने का केंद्र ने वादा कर रखा है, जबकि दिल्ली के साथ ऐसी बात नहीं है।

धारा 370 को हटाने की संवैधानिकता पर सुनवाई के दौरान केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि “उचित समय” आने पर जम्मू-कश्मीर को फिर से पूर्ण राज्य बनाया जाएगा। तब उसने कहा कि जम्मू-कश्मीर को केंद्र शासित प्रदेश बनाने का कदम अस्थायी है। दिसंबर 2023 में धारा 370 पर फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र के उस बयान को स्वीकार कर लिया। लेकिन उसने निर्देश दिया था कि जम्मू-कश्मीर में 30 सितंबर 2024 तक विधानसभा चुनाव करा लिए जाएं। केंद्र ने इस आदेश का पालन किया। लेकिन उसके लगभग दो साल बाद तक उसने यह स्पष्ट नहीं किया है कि “उचित समय” से उसका तात्पर्य क्या है और उसकी राय में इसके कब तक आने की संभावना है? इस संबंध में केंद्र और जम्मू-कश्मीर सरकारों के बीच संवाद रहता, तो उमर अब्दुल्ला को आंदोलन की राह पकड़ने की जरूरत नहीं पड़ती।

राज्य में रैलियां आयोजित करने के बाद अब अब्दुल्ला ने दिल्ली में जंतर-मंतर पर आकर विरोध प्रदर्शन करने का इरादा जताया है। बेहतर होगा, केंद्रीय नेतृत्व इस प्रश्न को दलगत हितों से उठ कर देखे और एक निर्वाचित सरकार के मुख्यमंत्री को भरोसे में ले। उसे यह भी याद करना चाहिए कि जम्मू-कश्मीर का दर्जा गिराए सात साल गुजर चुके हैं। आखिर “अस्थायी” उपाय की कोई तो तार्किक समय-सीमा होनी चाहिए। वैसे भी किसी पूर्ण राज्य को केंद्र शासित प्रदेश बनाना विचित्र और सामान्य समझ से लोकतांत्रिक भावना के खिलाफ कदम था। उससे पैदा हुई विसंगतियों को दूर करने के लिए अब वो कदम वापस लिए जाने की आवश्यकता है।

By NI Editorial

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