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इंडिया गठबंधन का विखंडन

कई जगहों पर डीएमके कार्यकर्ताओं ने जिस तरह कांग्रेस कार्यकर्ताओं पर हमले किए, उससे भी विपक्षी खेमे को लेकर धारणा बिगड़ी है। इसका खराब असर आने वाले चुनावों में विपक्षी सहयोग पर पड़ सकता है।

संसद में तालमेल के अलावा इंडिया गठबंधन वैसे भी निरर्थक हो चुका था, मगर तमिलनाडु में कांग्रेस के पाला-बदल के बाद फ्लोर कॉर्डिनेशन से सामूहिक प्रभाव पैदा कर पाना भी उसके लिए कठिन हो जाएगा। चुनाव परिणाम आने के तुरंत बाद कांग्रेस का एकतरफा तौर पर डीएमके का साथ छोड़कर टीवीके से गांठ जोड़ लेने से पैदा हुई कड़वाहट का ही नतीजा है कि डीएमके ने लोकसभा स्पीकर से अपने सदस्यों की सीटिंग व्यवस्था बदलने की गुजारिश कर दी है। उधर तमिलनाडु में कई जगहों पर डीएमके कार्यकर्ताओं ने जिस तरह कांग्रेस कार्यकर्ताओं पर हमले किए, उससे भी विपक्षी खेमे को लेकर धारणाएं बिगड़ी हैं। इसका खराब असर आने वाले चुनावों के दौरान अन्य दलों से कांग्रेस के सहयोग पर पड़ सकता है।

अगला एक प्रमुख चुनाव मैदान उत्तर प्रदेश है, जहां सपा नेता अखिलेश यादव पहले से ही कांग्रेस से कुछ हिसाब चुकता करने के अपने मूड का संकेत देते रहे हैं। महाराष्ट्र में पहले ही गठबंधन के घटक अपनी राह अलग कर चुके हैं। वहां भी कांग्रेस का रुख विवाद के केंद्र में रहा। तमिलनाडु के मामले से क्षेत्रीय दलों में यह शिकायत और गहराएगी कि परजीवी होती गई कांग्रेस अपने अतीत की थाती के आधार पर सहयोगी दलों से अधिकतम कीमत वसूलने और इस प्रयास में चुनाव से ठीक पहले माहौल बिगाड़ने की हद तक चली जाती है।

जहां उसका मुकाबला किसी गैर-भाजपा दल से होता है (मसलन, दिल्ली में ‘आप’, पश्चिम बंगाल में टीएमसी, केरल में लेफ्ट फ्रंट), वहां इल्जाम लगाने में वह कोई संयम नहीं दिखाती। ऊपर से आम अनुभव के विपरीत कांग्रेस नेता राहुल गांधी का यह बड़बोलापन है कि भाजपा को सिर्फ कांग्रेस ही हरा सकती है। विपक्षी नजरिए से यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है। जिस समय गैर-भाजपा दलों में सबसे ज्यादा सहयोग और भाजपा का मुकाबला करने के एकजुट संकल्प की जरूरत है, इन दलों में समन्वय का रहा-सहा मंच भी बिखरता नजर आ रहा है। भाजपा का नीतिगत विकल्प देने के मोर्चे पर तो ये दल वैसे ही नाकाम थे, अब उनमें व्यावहारिक और चुनावी गणित आधारित सहयोग की भावना भी ओझल हो रही है।

By NI Editorial

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