राज्य-शहर ई पेपर व्यूज़- विचार

ये हाल कैसे हुआ?

क्या चीन से संबंध सुधारने की प्रक्रिया इस पराजयवादी मानसिकता के तहत चल रही है कि चीन का मुकाबला करना संभव नहीं रह गया है? सरकार को इस पर तुरंत देश को भरोसे में लेना चाहिए।

भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) के निदेशक शत्रुजित कपूर के सनसनीखेज भाषण के बाद भारतीय विदेश मंत्रालय ने पुष्टि की है कि अरुणाचल प्रदेश में चीनी फौज के गश्ती के तय रास्ते से “भटकने” के कारण अक्सर भारतीय बलों के साथ उसका टकराव हो जाता है। उसके एक दिन पहले कपूर ने कहा था कि ‘पिछले कुछ दिनों में ऐसे हालात बने, जब अरुणाचल प्रदेश में कई जगहों पर दोनों देशों के सुरक्षा बलों का आमना-सामना हुआ और यह अभी भी जारी है।’ इस बयान ने यह साफ किया कि भारत और चीन के बीच हाल की सीमा वार्ताओं में बनी सहमतियां जमीनी स्तर पर टकराव टालने में कामयाब नहीं हुई हैं।

इससे उचित ही चीन के साथ संबंध के बारे में भारत सरकार की नीति पर सवाल खड़े हुए। बहरहाल, उससे भी कहीं ज्यादा अहम कपूर की दूसरी टिप्पणी है, जिसमें उन्होंने कहा कि अब पारपंरिक तरीकों से चीन का मुकाबला करना संभव नहीं है, क्योंकि उसने हथियार और इन्फ्रास्ट्रक्चर के आधुनिकीकरण में भारी निवेश किया है। ऐसे में कपूर ने भारत को ड्रोन्स पर भरोसा करने की सलाह दी। इस बात का जिक्र करते हुए कि यूक्रेन ने ड्रोन्स के जरिए रूस जैसी महाशक्ति को चुनौती दी है, कपूर ने कहा- ‘ड्रोन ऐसा माध्यम हैं, जिनके जरिए एक छोटा देश भी बड़े देश को चुनौती दे सकता है।’

हैरतअंगेज है कि जिस बल पर चीन से लगी भारतीय सीमा की रक्षा की जिम्मेदारी है, उसके प्रमुख अब चीन के बरक्स को भारत को छोटी ताकत बता रहे हैं! कपूर ने कहा कि आईटीबीपी 50 साल पुराना बल है, जिसके आधुनिकीकरण की जरूरत है। तो सवाल उठता है कि क्या गलवान घाटी जैसी घटना के बावजूद इस दिशा में कदम नहीं उठाए गए? और क्या अभी चीन से संबंध सुधारने की जारी प्रक्रिया इसी पराजयवादी मानसिकता के तहत चल रही है कि चीन का मुकाबला करना संभव नहीं रह गया है? नरेंद्र मोदी सरकार को इस पर तुरंत सारे देश को भरोसे में लेना चाहिए। वरना, ऐसी टिप्पणियों का देशवासियों के मनोबल पर स्थायी और दूरगामी नकारात्मक असर पड़ सकता है।

Tags :

By NI Editorial

The Nayaindia editorial desk offers a platform for thought-provoking opinions, featuring news and articles rooted in the unique perspectives of its authors.

Leave a comment