अमेरिकी बाजार में अपना हिस्सा गंवाने की आशंका से चिंतित हर देश नए बाजारों की तलाश में है। भारत और ब्रिटेन के मुक्त व्यापार समझौते का महत्त्व इस बड़े परिदृश्य में ही समझा जाना चाहिए।
जब डॉनल्ड ट्रंप के ट्रेड वॉर से विश्व व्यापार का संतुलन गड़बड़ाया हुआ है, भारत और ब्रिटेन के बीच मुक्त व्यापार समझौते का संपन्न होना, राहत की खबर है। 1995 में जब विश्व व्यापार संगठन (डब्लूटीओ) अस्तित्व में आया, तब समझा गया था कि अब द्विपक्षीय व्यापार समझौतों की जरूरत नहीं होगी। कुछ समय तक ऐसे समझौतों का महत्त्व पृष्ठभूमि में रहा भी। मगर अमेरिकी राष्ट्रपति के रूप में डॉनल्ड ट्रंप के पहले कार्यकाल में स्थितियां बदलने लगीं और अब तो बहुपक्षीय व्यापार के नियम बेमतलब हो चुके हैं। ऐसे में द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझौते फिर से अहम हो गए हैँ। हालांकि गुजरे वर्षों में अन्य कई देशों से भी भारत के ऐसे समझौते हुए हैं, फिर भी ब्रिटेन के साथ इसका संपन्न होना खास महत्त्व रखता है।
ब्रिटेन को भारत बड़ी मात्रा में वस्तुओं और सेवाओं का निर्यात करता है और वहां से अनेक ऐसी चीजों का आयात भी होता है। अब चूंकि भारत से निर्यात होने वाली 99 फीसदी सामग्रियों पर ब्रिटेन में कोई शुल्क नहीं लगेगा, तो जाहिर है, भारतीय निर्यातकों की वहां के बाजार में पैठ आसान हो जाएगी। दूसरी तरफ भारत ब्रिटेन से होने वाले 92 फीसदी आयात को शुल्क मुक्त करेगा। इसी तरह के लाभ सेवा क्षेत्र को भी मिलेंगे। दरअसल, भारत और ब्रिटेन के बीच सेवा क्षेत्र का व्यापार कारखाना उत्पादों के आयात- निर्यात से अधिक है। इसमें भारत अधिक फायदे में है।
2024 में भारत ने 19.90 बिलियन डॉलर की सेवाओं का निर्यात ब्रिटेन को किया। बहरहाल, इन आंकड़ों से अधिक महत्त्वपूर्ण इस समझौते से एक मॉडल का सामने आना है, जिसकी मिसाल अन्य देशों या यूरोपियन यूनियन जैसे देश-समूहों के साथ चल रही व्यापार वार्ताओं में सामने रखी जा सकेगी। जब अमेरिका ने विश्व व्यापार में अपनी खास हैसियत का इस्तेमाल करते हुए विश्व व्यापार में उथल-पुथल मचा रखी है, उस समय ऐसी तमाम वार्ताएं अधिक महत्त्वपूर्ण हो गई हैँ। अमेरिकी बाजार में अपना हिस्सा गंवाने की आशंका से चिंतित हर देश नए बाजारों की तलाश में है। भारत और ब्रिटेन के मुक्त व्यापार समझौते का महत्त्व इस बड़े परिदृश्य में ही समझा जाना चाहिए।


