जब हर व्यक्ति की नागरिकता को लेकर अनिश्चय खड़ा कर दिया गया है, सुप्रीम कोर्ट की ये व्यवस्था बेहद अहम है कि नागरिकता निर्धारण की प्रक्रिया अनिवार्य रूप से “उचित, विधि-सम्मत और विवेकपूर्ण” होनी चाहिए।
जिस समय नरेंद्र मोदी सरकार ने हर भारतीय की नागरिकता को सवालों के घेरे में डाल दिया है, असम के एक मामले में सुप्रीम कोर्ट का निर्णय राहत बन कर आया है। ताजा संदर्भ में कोर्ट की ये टिप्पणी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है कि ‘सरकार की कोई मनमानी कार्रवाई सिर्फ इसलिए (न्यायिक) संरक्षण पाने का दावा नहीं कर सकती कि उसे वैधानिक जामा पहना दिया गया है।’ कोर्ट की ये व्यवस्था भी बेहद अहम है कि संविधान के अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 21 के तहत मिला संरक्षण सिर्फ भारतीय नागरिकों तक सीमित नहीं है। यानी भारत भूमि पर यह संरक्षण अ-नागरिकों को भी हासिल है।
अनुच्छेद 14 के तहत राज्य किसी व्यक्ति को कानून के समक्ष समानता एवं कानून के समान संरक्षण से वंचित नहीं कर सकता। अनुच्छेद 21 के तहत बिना उचित कानूनी प्रक्रिया अपनाए किसी व्यक्ति को जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रताओं से वंचित नहीं किया जा सकता। यह बड़ा नजरिया अपनाते हुए न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की खंडपीठ ने 27 व्यक्तियों की नागरिकता रद्द करने के ट्रिब्यूनल के फैसले को रद्द कर दिया, जिस पर गुवाहाटी हाई कोर्ट ने भी मुहर लगा दी थी। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि नागरिकता निर्धारण की प्रक्रिया अनिवार्य रूप से “उचित, विधि-सम्मत और विवेकपूर्ण” होनी चाहिए।
ट्रिब्यूनलों को यह अवश्य सुनिश्चित करना होगा कि संबंधित व्यक्ति को अपना पक्ष रखने का पूरा मौका मिले। उसे यह बताना अनिवार्य है कि उसकी नागरिकता को किस आधार पर चुनौती दी गई है, क्या उसके खिलाफ ठोस साक्ष्य मौजूद हैं, और क्या निष्कर्ष उपलब्ध सामग्रियों के आधार पर निकाला गया है? सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नागरिकता साबित करने का दायित्व संबंधित व्यक्ति पर होने का प्रावधान मौजूद होने के बावजूद ‘उचित प्रक्रिया’ की बलि नहीं चढ़ाई जा सकती। स्पष्टतः ये व्यवस्थाएं कानून के शासन के सिद्धांत का प्राण हैं। भारत संविधान इस सिद्धांत को स्थापित करता है, तो किसी रूप में उचित प्रक्रिया अपनाए बिना किसी की नागरिकता रद्द नहीं की जानी चाहिए। उचित होगा कि केंद्र इस न्यायिक व्यवस्था का संदेश समझे और सबकी नागरिकता को लेकर अनिश्चय खड़ा करने से बाज आए।
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