नई लड़ाई का कारण युद्ध के परिणाम पर अमेरिका और ईरान के अलग-अलग आकलन हैं। अमेरिका युद्धविराम को ईरान के प्रति रियायत मानता है, जबकि ईरान की राय है कि वह अधिक प्रभावशाली होकर उभरा है।
ईरान और अमेरिका के बीच लड़ाई फिर छिड़ गई है। दोनों पक्षों ने एलान कर दिया है कि शांति का सहमति-पत्र (एमओयू) अब मृत हो चुका है। इसका अर्थ है कि दोनों देश आठ अप्रैल (जिस रोज युद्धविराम हुआ) से पहले की स्थिति में चले गए हैं। दोनों तरफ से हो रहे भीषण हमले इसी बात की मिसाल हैं। इसके साथ ही युद्धविराम से वैश्विक ऊर्जा एवं आर्थिक से संकट मिली राहत का दौर खत्म हो गया है। अब सूरत यह है कि ये संकट और गंभीर हो सकता है, क्योंकि ईरान ने होरमुज जलडमरूमध्य के साथ-साथ बाब-ए-मंदाब (लाल सागर स्थित जल मार्ग) को भी बंद करने के संकेत दिए हैँ।
दरअसल, होरमुज ही वो विवाद है, जिस कारण एमओयू नाकाम हुआ। इस विवाद की वजह फरवरी-अप्रैल में 39 दिन तक चली लड़ाई के परिणाम पर अमेरिका और ईरान के अलग-अलग आकलन हैं। अमेरिका की राय है कि 28 फरवरी (जिस रोज उसने इजराइल के साथ मिलकर पहला हमला किया) से पहले की स्थिति बहाल करने पर उसका राजी होना ईरान के प्रति रियायत है। जबकि ईरान की राय है कि मौजूदा युद्ध ने पश्चिम एशिया के समीकरण बदल दिए हैं, जिसमें वह अधिक प्रभावशाली होकर उभरा है। इस हकीकत की झलक उस क्षेत्र की भू-राजनीतिक स्थिति में मिलेगी। होरमुज पर अपनी संप्रभुता जताना ईरान की इसी समझ का परिणाम है।
मगर यह स्वीकार करना ना सिर्फ इस युद्ध में अमेरिका के लिए अपनी हार मान लेना होगा, बल्कि यह लगभग 300 वर्षों से समुद्री जल मार्गों से ‘मुक्त नौवहन’ का गारंटर होने की पश्चिम की हैसियत की समाप्ति का सबूत भी बन जाएगा। नतीजतन, इस मुद्दे को तय करने का प्रश्न फिर से शक्ति-परीक्षण के मैदान में पहुंच गया है। इससे पहले ईरान ने चेतावनी दी थी कि अमेरिका ने फिर हमला किया, तो वह परमाणु अप्रसार संधि से निकल कर अपने परमाणु अस्त्र सिद्धांत को आमूल रूप से बदल देगा। मतलब वह परमाणु बम बनाने की ओर बढ़ेगा। ऐसा हुआ, तो पश्चिम एशिया का सामरिक समीकरण भी बदल जाएगा। ताजा घटनाओं ने दुनिया को इन संभावनाओं के सामने पहुंचा दिया है।


