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आर-पार की लड़ाई

संभवतः पाकिस्तान ने इस सोच के साथ मध्यस्थ बनना स्वीकार किया था कि अमेरिका की शर्तें ही वार्ता का आधार बनेंगी, जिन पर ले-देकर सहमति बन जाएगी। लेकिन ईरान के इरादे अलग हैं। वह आर-पार की लड़ाई के मूड में है।

पश्चिम एशिया में युद्ध खत्म कराने के लिए पाकिस्तान की मध्यस्थता किसी नतीजे पर पहुंचती नहीं दिखती। अमेरिका की शर्तें उसने ईरान को बताईं, मगर ईरान ने उसे ठुकराते हुए अपनी जवाबी मांग पाकिस्तान को बता दी। पाकिस्तान उस पर अमेरिका से बातचीत करने की हैसियत में है या नहीं, यह नहीं मालूम। मगर इस बीच उसने अपने यहां तीन अन्य देशों (सऊदी अरब, मिस्र और तुर्किये) के विदेश मंत्रियों की बैठक आयोजित की। समझा जाता है कि उसके नतीजों को लेकर पाकिस्तान के विदेश मंत्री इसहाक डार बीजिंग गए। लेकिन वहां जारी साझा बयान से नहीं लगता कि चीन ने उसमें दिलचस्पी दिखाई है।

साझा बयान में सामान्य भाषा का इस्तेमाल किया गया है। समझा जाता है कि पाकिस्तान ने चीन से आगे ईरान पर हमला ना होने की गारंटी करने की जिम्मेदारी लेने का अनुरोध किया। मगर फिलहाल चीन ने इस ठुकरा दिया है। दरअसल, पश्चिम एशिया में अमेरिकी अड्डे स्थायी रूप से हटाने, नुकसान का मुआवजा देने, और होरमुज जलडमरूमध्य पर ईरानी संप्रभुता को मान्यता देने की ईरान की मांगों पर कोई रजामंदी जब तक नहीं होती, आगे हमला ना होने की गारंटी कोई नहीं कर सकता। इन मांगों पर बातचीत से सहमति बनेगी, इसकी संभावना न्यूनतम है। अतः लड़ाई तुरंत खत्म होने की कोई सूरत नहीं है।

बेशक, अमेरिका में बढ़ती चुनौतियों के मद्देनजर डॉनल्ड ट्रंप युद्ध से निकलने का रास्ता ढूंढ रहे हैं, मगर लड़ाई में इजराइल भी शामिल है। ईरान की जीत की धारणा को पुष्ट करते हुए वह युद्ध खत्म करने को शायद ही तैयार होगा। दरअसल, ऐसा हुआ तो इजराइल का अस्तित्व खतरे में पड़ता दिखेगा, जिसे अभी चार तरफ से (ईरान, हिज्बुल्लाह, हूती और इराक स्थित पीएमएफ) हमलों को झेलना पड़ रहा है। इसलिए, मध्यस्थता प्रयासों के फिलहाल सफल होने की संभावना कम है। चीन की कूटनीतिक प्रतिक्रिया इसी आकलन का संकेत देती है। संभवतः पाकिस्तान ने इस सोच के साथ मध्यस्थ बनना स्वीकार किया कि अमेरिका की शर्तें ही वार्ता का आधार बनेंगी, जिन पर ले-देकर सहमति बन जाएगी। लेकिन ईरान के इरादे अलग हैं। वह आर-पार की लड़ाई के मूड में है।

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By NI Editorial

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