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एक धार्मिक समुदाय की पहचान पर आधारित प्रीमियर लीग शुरू होने जा रही है, तो अन्य मजहबी या जातीय समुदाय भी ऐसा करने को प्रेरित हो सकते हैँ। फिर महजबी/ जातीय टीमों के बीच मुकाबले की भी शुरुआत हो सकती है! 

जैन समुदाय ने क्रिकेट की अपनी प्रीमियर लीग की शुरुआत की है। जैन इंटरनेशनल ट्रेड ऑर्गनाइजेशन (जीटो) ने 12 टीमों की फ्रेंचाइजी बेचने के लिए नीलामी आयोजित की, जिसमें 50 खरीदार आए। मुंबई सोबो स्टार टीम की फ्रेंचाइजी सबसे महंगी यानी 3.7 करोड़ रुपये में बिकी। अब टीमें खिलाड़ी खरीदेंगी। उसके बाद टूर्नामेंट शुरू होगा। जॉन्टी रोड्स, रॉस टेलर, सनत जयसूर्या, शिखर धवन, सुरेश रैना और मुनाफ पटेल जैसे बड़े नामों को कोच के रूप में जोड़ा जा रहा है। आईपीएल की तर्ज पर टीमें विज्ञापन और ब्रांड एंडोर्समेंट जुटाएंगी। जैन समुदाय की ऊंची आर्थिक हैसियत को देखते हुए अनुमान है कि टूर्नामेंट का ऊंचा ब्रांड वैल्यू बन सकता है।

मगर समस्या यह है कि इससे औपचारिक रूप से क्रिकेट फिर से सामुदायिक/ सांप्रदायिक दायरे में सिकुड़ने जा रहा है। बीकानेर, सांगली, अजमेर, गांधीग्राम जैसे कुछ शहरों में जैन समुदाय के अपने टूर्नामेंट होने की सूचना पहले आई थी। मगर अब मजहब आधारित ब्रांड वैल्यू के बड़े टूर्नामेंट की शुरुआत होने जा रही है। यहां याद कर लेना चाहिए कि भारत में अंग्रेजों ने जब क्रिकेट की शुरुआत की, तो आरंभिक दिनों में समुदाय आधारित टीमों के बीच ही मुकाबला होता था। पारसी समुदाय ने सबसे पहले अपनी टीम बनाई। बाद में मुंबई में क्वाड्रैंगुलर टूर्नामेंट शुरू हुआ, जिसमें यूरोपियन्स, हिंदू, पारसी और मुस्लिम टीमें भाग लेती थीँ।

जब यहूदी टीम शामिल हुई, तो टूर्नामेंट का नाम पेंटागुलर हो गया। लेकिन, महात्मा गांधी सहित राष्ट्रीय आंदोलन के नेताओं ने प्रतियोगिता के इस स्वरूप का कड़ा विरोध किया। तर्क था कि ऐसी टीमों में मुकाबले से सांप्रदायिक भावनाएं उभारती हैं। नतीजतन, 1946 में महजबी पहचान वाली टीमों पर आधारित टूर्नामेंट को बंद कर दिया गया। स्वतंत्रता के बाद टीमें क्षेत्रीय या पेशेवर पहचान पर बनीं। प्रतियोगिताएं सभी जन समूहों एवं समुदायों के लिए खुली रखी गईं। मगर अब दौर पलटता दिख रहा है। एक धार्मिक समुदाय की पहचान पर आधारित प्रीमियर लीग शुरू होने जा रही है, तो अन्य मजहबी या जातीय समुदाय भी ऐसा करने को प्रेरित हो सकते हैँ। फिर महजबी या जातीय टीमों के बीच मुकाबले की भी शुरुआत हो सकती है!

By NI Editorial

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