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बड़ा खतरा बन सकता है एआई

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई को लेकर गजब का यूफोरिया मचा है। हर जगह एआई की चर्चा है। मीडिया में एआई के जरिए कामकाज होने की खबरें हैं तो लीगल सर्किल में एआई की चुनौतियों की चर्चा है। कॉरपोरेट हाउसेज और इंड्रस्ट्रीज में इस बात पर मंथन चल रहा है कि एआई का इस्तेमाल करके कैसे ज्यादा से ज्यादा उत्पादन और मुनाफा हो। यहां तक कि राजनीतिक दलों के कार्यालयों में एआई की सबसे ज्यादा चर्चा है। सब अपने अपने हिसाब से एआई का इस्तेमाल कर रहे हैं। जो इस्तेमाल नहीं कर रहा है वह भी इसकी चर्चा कर रहा है। कोई भी वेबसाइट या यूट्यूब चैनल या सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म खोलिए तो सबसे पहले एआई के विज्ञापन आ रहे हैं। विज्ञापन में या तो एआई बता रहा होता है कि वह आपके लिए क्या क्या कर सकता है या कोई व्यक्ति यह बता रहा होता है कि आप कैसे एआई का इस्तेमाल करें तो आपका जीवन बदल जाएगा।

इन सबके बीच कुछ जानकार और कुछ नेता, जिनको कतई अंदाजा नहीं है कि एआई क्या है, आपको बता रहे हैं कि एआई से घबराने की जरुरत नहीं है। वे समझाते हैं कि इससे कोई नौकरी नहीं जा रही है और अगर कुछ नौकरियां जाएंगी तो नई नौकरियों के अवसर बनेंगे। अपनी बात को प्रमाणित करने के लिए वे पहले हुई औद्योगिक क्रांति और संचार आदि की मिसाल देकर बताते हैं कि इनसे भी नौकरी और रोजगार जाने की आशंका थी लेकिन कुछ नहीं हुआ। वे एआई की वजह से किसी किस्म के खतरे की आशंका को भी निराधार बता रहे हैं। हकीकत यह है कि अगले कुछ वर्षों में दुनिया की आधी आबादी अप्रासंगिक होने वाली है। बाकी खतरों को छोड़िए अभी अमेरिका और यूरोप का एक ताजा शोध है कि जहां भी एआई के डाटा सेंटर बन रहे हैं उसके आसपास के इलाकों में औसत तापमान दो डिग्री तक बढ़ जा रहा है। पानी की कमी हो रही है वह अलग है।

बहरहाल, सबसे पहले तो यह समझने की जरुरत है कि 19वीं सदी में हुई औद्योगिक क्रांति या 20वीं सदी में हुई संचार क्रांति की कोई तुलना आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के जरिए होने वाली संज्ञानात्मक क्रांति यानी कॉग्निटिव रिवोल्यूशन से नहीं की जा सकती है। इससे पहले जितनी भी क्रांति हुई है और उन क्रांतियों में जितने भी उपकरण बनाए गए वे ऐसे टूल्स थे, जिनका इस्तेमाल करना इंसान के हाथ में था। किसी भी टूल में या किसी भी उपकरण में यह क्षमता नहीं थी कि वह अपना इस्तेमाल खुद कर सके। सबसे आधुनिक तकनीक की भी बात करें तो कोई स्मार्ट फोन खुद तय नहीं कर सकता है कि उसे किसको फोन लगाना है या किसको मैसेज करना है। इसके लिए कमांड देने की जरुरत होती है।

कोई उपकरण या तकनीक कितनी भी खतरनाक हो वह अपने आप मानवता के लिए खतरा नहीं बन सकती है। अल्फ्रेड नोबल ने डायनामाइट का निर्माण किया तो डायनामाइट तय नहीं कर सकता है कि कब और कहां फटना है। इसी तरह परमाणु बम कहां और कब गिराना है यह फैसला परमाणु बम को नहीं, बल्कि किसी इंसान को करना होता है। परंतु आर्टिफिशयल इंटेलिजेंस के साथ ऐसा नहीं है। वह अपने फैसले खुद कर सकता है। अगर फैसले करने की प्रक्रिया में एआई का इस्तेमाल होता है तो बिना किसी इंसानी कमांड के वह परमाणु बम गिराने का फैसला भी कर सकता है।

यह खतरा सिर्फ एक कल्पना की बात नहीं है, बल्कि वास्तविक संभावना है, जिसने दुनिया की सबसे बड़ी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की कंपनियों की चिंता बढ़ाई हुई है। तभी सबसे पहली कंपनी ओपन एआई और उसको चुनौती देने वाली सबसे बड़ी कंपनी एंथ्रोपिक ने इस तरह के खतरे से बचने के उपायों पर विचार शुरू कर दिया है। असल में ईरान में चल रही जंग में अमेरिका और इजराइल दोनों एआई टूल्स का इस्तेमाल कर रहे हैं। हमले के लिए टारगेट चुनने से लेकर सटीक हमला करने के लिए एआई का इस्तेमाल हो रहा है। तभी ओपन एआई और एंथ्रोपिक ऐसे विशेषज्ञों की भर्ती कर रहे हैं, जो उनके सॉफ्टवेयरों के इस्तेमाल की स्थिति में उसके दुरुपयोग को रोकने के उपाय कर सकें।

मिसाल के तौर पर एंथ्रोपिक ने रासायनिक हथियार और परमाणु बम के जानकारों को अपने यहां नियुक्त करने का फैसला किया है, जो अपने सॉफ्टवेयर के ‘प्रलंयकर दुरुपयोग’ यानी ‘कैटेस्ट्रोपिक मिसयूज’ को रोकने में मदद कर सकें। ओपन एआई ने बायोलॉजिकल और केमिकल जोखिम के जानकारों को भर्ती करने की प्रक्रिया शुरू की है। ऐसा करने की जरुरत इसलिए पड़ी है क्योंकि अब आधुनिक युद्धों में युद्ध की नीति बनाने, जंग का मैदान चुनने और उसका आकलन करके सटीक हमले की योजना बनाने में एआई का खुलेआम इस्तेमाल होने लगा है। अमेरिका ने ईरान के साथ चल रही जंग में एंथ्रोपिक के एआई मॉडल क्लौड का इस्तेमाल किया है। अमेरिका में खुफिया सूचनाओं के विश्लेषण से लेकर ऑपरेशनल प्लानिंग और साइबर ऑपरेशन तक में क्लौड का इस्तेमाल किया जा रहा है।

अब सोचें जिन दो कंपनियों ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को इस मुकाम तक पहुंचाया है उनको इस बात की चिंता है कि उनके एआई मॉडल का दुरुपयोग परमाणु बम या रासायनिक बम छोड़ने में किया जा सकता है, जिससे लाखों नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों का जीवन संकट में पड़ सकता है। ओपन एआई के सैम ऑल्टमैन और एंथ्रोपिक के डारियो आमोदेई भले अपने मुंह से खतरे की भयावहता नहीं बता रहे हैं लेकिन उनकी कंपनी जिस दिशा में सोच रही है और काम कर रही है उससे तो लग रहा है कि एआई सिर्फ नौकरी, रोजगार, पानी या पर्यावरण के लिए खतरा नहीं है, बल्कि पूरी मानवता के लिए खतरा है। वैसे एआई के बिल्कुल शुरुआती दिनों में कोई दो सौ जानकारों से इस बारे में उनकी राय लिखवाई गई थी, जिनमें से 10 फीसदी ने कहा था कि एआई मानवता के समाप्त होने (एक्सटिंक्ट) होने का कारण बन सकता है। हो सकता है कि यह पैरानॉयड निष्कर्ष हो लेकिन इसकी संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है।

इसका कारण यह है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पहले के दूसरे तकनीकी उपकरणों या टूल्स की तरह नहीं है। यह अपने फैसले खुद करने में सक्षम है। ध्यान रहे भाषा और शब्द ऐसी दो चीजें हैं, जो सिर्फ इंसानों के पास हैं। किसी जानवर या पेड़, पौधों के पास भाषा या शब्द नहीं हैं और न किसी मशीन के पास भाषा और शब्द हैं। भाषा और शब्द ने मनुष्य का संज्ञानात्मक विकास किया, जिससे वह बाकी जानकारों, पेड़ पौधों और मशीनों से अलग हुआ। इंसान और एआई के बीच यह भेद नहीं है। एआई के पास भाषा और शब्द की ताकत है। वह सोचने, लिखने और बोलने में सक्षम है। वह एक शब्द से नए नए वाक्य बना सकता है। वह एक वाक्य से कई तरह के अर्थ निकाल सकता है। और सबसे बड़ी बात है कि ऐसा करने के लिए उसे किसी कमांड की जरुरत नहीं है। वह स्वंय भी ऐसा कर सकता है।

जिसने भी एआई का कोई बेसिक मॉडल भी इस्तेमाल किया है उसको इस बारे में पता है। जब आप उससे कोई सवाल पूछते हैं तो उसका जवाब देने के साथ ही वह कुछ नए सवाल अपनी ओर से प्रस्तावित करता है और आपसे पूछता है कि आप कहें तो इनके भी जवाब तैयार करके दे। क्या इससे पहले किसी मशीन को इस तरह आचरण करते देखा है? क्या एक गोली चलाने के बाद पिस्तौल पूछती है कि आप कहें तो दूसरी गोली भी चला दें? तभी एंथ्रोपिक और ओपन एआई को ऐसे लोगों की भरती करने की जरुरत पड़ रही है, जो युद्ध के समय कमांड अपने हाथ में रख सकें और मशीन को मनमानी करने से रोक सकें। सोचें, जब दुनिया सोशल मीडिया को नहीं संभाल पा रही है, बच्चों और किशोरों को उससे बचाने के लिए उस पर पाबंदी लगाने की जरुरत पड़ रही है तब कोई कहे कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से कोई खतरा नहीं है तो उसकी समझ को क्या कहा जा सकता है!

By अजीत द्विवेदी

संवाददाता/स्तंभकार/ वरिष्ठ संपादक जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से पत्रकारिता शुरू करके अजीत द्विवेदी भास्कर, हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ में सहायक संपादक और टीवी चैनल को लॉंच करने वाली टीम में अंहम दायित्व संभाले। संपादक हरिशंकर व्यास के संसर्ग में पत्रकारिता में उनके हर प्रयोग में शामिल और साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और फिर लगातार ‘नया इंडिया’ नियमित राजनैतिक कॉलम और रिपोर्टिंग-लेखन व संपादन की बहुआयामी भूमिका।

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